
अब ‘ट्विन फ्लावर्स’ चिन्ह पर दावेदारी की लड़ाई, ममता या बागी गुट?
टीएमसी में बगावत के बाद बागी गुट ने पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा ठोका है। अब फैसला चुनाव आयोग के समक्ष संगठन और समर्थन के आधार पर होगा।
तृणमूल कांग्रेस में उभरे बड़े राजनीतिक संकट ने पार्टी के भविष्य और उसके प्रतिष्ठित चुनाव चिन्ह ‘जोड़ा घास फूल’ (जुड़वां फूल और घास) पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के भीतर बगावत अब केवल विधायकों के असंतोष तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह लड़ाई सीधे पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावे तक पहुंच गई है।
22 जून को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का दावा किया। बैठक में नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन की घोषणा की गई और पूर्व मंत्री अरूप रॉय को नया अध्यक्ष बनाया गया। इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी को भी निलंबित करने का ऐलान किया गया। बागी नेताओं का दावा है कि बैठक में करीब 60 विधायक और 70 से अधिक कोलकाता नगर निगम पार्षद शामिल हुए।
अब बागी गुट चुनाव आयोग के समक्ष खुद को असली तृणमूल कांग्रेस साबित करने की तैयारी में है। यदि मामला आयोग तक पहुंचता है तो फैसला इस आधार पर नहीं होगा कि पार्टी की स्थापना किसने की या उसका सबसे बड़ा चेहरा कौन है, बल्कि इस पर होगा कि कौन-सा गुट दस्तावेजों, संविधान, सदस्यता रिकॉर्ड, बैठकों की कार्यवाही और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन के जरिए खुद को पार्टी का वैध उत्तराधिकारी साबित कर पाता है।
चुनाव चिन्ह पर फैसला कैसे होता है?
भारतीय चुनाव आयोग को 1968 के चुनाव चिन्ह आदेश (Symbols Order) के पैरा-15 के तहत यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी राजनीतिक दल में विभाजन की स्थिति में तय करे कि असली पार्टी कौन है। आयोग दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद किसी एक गुट को पार्टी का नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह दे सकता है, या फिर विवाद सुलझने तक चुनाव चिन्ह को फ्रीज भी कर सकता है।हालांकि आयोग का फैसला केवल पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह तक सीमित होता है। पार्टी की संपत्ति, बैंक खाते या विधायकों की अयोग्यता जैसे मामलों का फैसला अदालतों और विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है।
किस आधार पर होता है फैसला?
चुनाव आयोग आमतौर पर तीन प्रमुख पहलुओं को देखता है— पार्टी संविधान का पालन, संगठनात्मक इकाइयों का समर्थन और सांसदों-विधायकों की संख्या। कई मामलों में संगठनात्मक रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं होने पर विधायकों और सांसदों की संख्या निर्णायक साबित हुई है।
कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी तक के उदाहरण
1969 में कांग्रेस के विभाजन के दौरान इंदिरा गांधी और एस. निजलिंगप्पा गुट दोनों ने पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर दावा किया था। तब चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर इंदिरा गांधी समर्थक गुट को मान्यता दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया।इसी तरह 2017 में समाजवादी पार्टी के विवाद में मुलायम सिंह यादव के मुकाबले अखिलेश यादव ने भारी संख्या में विधायकों, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों और प्रतिनिधियों का समर्थन जुटाया था। चुनाव आयोग ने अखिलेश गुट को पार्टी और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह सौंप दिया था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थापक होने से चुनाव चिन्ह पर अधिकार सुनिश्चित नहीं होता।
शिवसेना और एनसीपी से क्या संकेत मिलते हैं?
हाल के वर्षों में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मामलों में भी चुनाव आयोग ने विधायकों और सांसदों की संख्या को महत्वपूर्ण आधार माना। शिवसेना विवाद में एकनाथ शिंदे गुट और एनसीपी विवाद में अजित पवार गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह मिला।हालांकि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि केवल विधायकों की संख्या को ही अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। संगठनात्मक ढांचे और पार्टी संविधान को भी समान महत्व देना होगा।
ममता बनर्जी और बागियों के सामने चुनौतियां
बागी गुट की सबसे बड़ी ताकत उसके पास मौजूद विधायकों का समर्थन है। विधानसभा अध्यक्ष पहले ही रिताब्रत बनर्जी गुट को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे चुके हैं। यदि उनके पास वास्तव में बहुमत है तो यह चुनाव आयोग के सामने एक मजबूत दलील होगी।लेकिन दूसरी ओर उन्हें यह भी साबित करना होगा कि 22 जून की बैठक पार्टी संविधान के अनुरूप बुलाई गई थी और नई कार्यकारिणी का गठन वैध प्रक्रिया के तहत हुआ है।
वहीं ममता बनर्जी केवल पार्टी संस्थापक होने के आधार पर चुनाव चिन्ह नहीं बचा पाएंगी। उन्हें यह दिखाना होगा कि पार्टी के अधिकृत संगठनात्मक ढांचे, वैध प्रतिनिधियों और आधिकारिक समितियों का समर्थन अब भी उनके साथ है।
क्या चुनाव चिन्ह फ्रीज हो सकता है?
यदि चुनाव आयोग को दोनों पक्षों के दावों पर तत्काल स्पष्ट निष्कर्ष नहीं मिलता और चुनाव नजदीक आ जाते हैं, तो आयोग ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज भी कर सकता है। ऐसी स्थिति पहले एआईएडीएमके के मामले में देखने को मिल चुकी है।
फिलहाल बागी गुट को शुरुआती बढ़त मिलती दिख रही है क्योंकि उसके पास बड़ी संख्या में विधायक होने का दावा है। लेकिन अंतिम फैसला केवल राजनीतिक ताकत से नहीं, बल्कि दस्तावेजी साक्ष्यों, संगठनात्मक वैधता और चुनाव आयोग के समक्ष पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।
यानी तृणमूल कांग्रेस के प्रतिष्ठित ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिन्ह का भविष्य अब प्रेस कॉन्फ्रेंसों से नहीं, बल्कि पार्टी के संविधान, रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों से तय होगा।

