
TVK सरकार का एक महीना; चुनावी वादे पूरे करना विजय के लिए बड़ी चुनौती
गठबंधन सरकार के 30 दिन पूरे होने पर राजनीतिक विश्लेषक टी. रामकृष्णन का बड़ा विश्लेषण। बहुमत का जुगाड़, सोशल मीडिया का क्रेज और खाली खजाने पर खुलकर की बात।
TVK Vijay's One Month as CM: अभिनेता से राजनेता बने सी. जोसेफ विजय की अगुवाई वाली 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) सरकार को तमिलनाडु की सत्ता संभाले एक महीना पूरा हो चुका है. राज्य के इतिहास में साल 1967 के बाद पहली बार किसी गैर-द्रविड़ दल ने सत्ता की चाबी हासिल कर इतिहास रचा है, जिसने द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के दशकों पुराने द्विध्रुवीय एकाधिकार को मटियामेट कर दिया.
सरकार के इस पहले महीने के कामकाज, चुनौतियों और भविष्य के रोडमैप का मूल्यांकन करने के लिए 'द फेडरल' ने वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक टी. रामकृष्णन से विशेष बातचीत की. रामकृष्णन के अनुसार, विजय ने गठबंधन को शुरुआती दौर में बेहद सुचारू और सहज तरीके से आगे बढ़ाया है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की नाजुक वित्तीय स्थिति के बीच जनता से किए गए भारी-भरकम और खर्चीले चुनावी वादों को पूरा करने की है.
पहली परीक्षा: विधानसभा में बहुमत का गणित और AIADMK में टूट का पेंच
विश्लेषक टी. रामकृष्णन के मुताबिक, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के सामने सरकार गठन के वक्त सबसे पहला और बड़ा संकट जादुई आंकड़े (118 सीटें) को छूने का था, क्योंकि टीवीके को विधानसभा चुनाव में महज 107 सीटें (बाद में एक सीट छोड़ने से 107) हासिल हुई थीं, जो पूर्ण बहुमत से कम थीं.
गठबंधन का सहारा: इस संकट से निपटने के लिए कांग्रेस (5 सीटें), वामपंथी दल (CPI, CPM), आईयूएमएल (IUML) और वीसीके (VCK) जैसे दल उनके साथ आए.
अन्नाद्रमुक में विभाजन: सबसे बड़ा सियासी मोड़ तब आया जब विपक्षी दल अन्नाद्रमुक (AIADMK) के करीब 25 विधायकों ने बगावत कर दी. विजय खुद राजा अन्नामलाईपुरम स्थित उनके कार्यालय पहुंचे और उनसे मुलाकात की, जिसके बाद विधानसभा में फ्लोर टेस्ट आसानी से पास हो गया. रामकृष्णन इसे राजनीति की व्यावहारिक मजबूरी मानते हैं.
सहज बदलाव: कर्नाटक जैसे राज्यों के विपरीत, जहां सरकार बनते ही विभागों को लेकर सिरफुटव्वल शुरू हो जाती है, तमिलनाडु में टीवीके के सहयोगियों ने बेहद परिपक्व व्यवहार किया है. फिलहाल यह गठबंधन सरकार न लगकर एकल-पार्टी सरकार की तरह सुचारू रूप से चल रही है, जो एक सुखद आश्चर्य है.
सबसे बड़ा संकट: वैश्विक मंदी और खाली खजाना; कैसे पूरे होंगे 2 लाख करोड़ के वादे?
रामकृष्णन ने दोटूक शब्दों में चेतावनी दी है कि टीवीके के लोककल्याणकारी वादों और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर (सीधे नकद सहायता) की घोषणाओं को जमीन पर उतारना वित्तीय रूप से लगभग असंभव नजर आ रहा है.
वैश्विक युद्धों का साया: विजय ने ऐसे समय में सत्ता संभाली है जब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच गहरे सैन्य टकराव से जूझ रही है. तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था निर्यात और वैश्विक उद्योगों से गहराई से जुड़ी है, इसलिए इस अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल का सीधा असर राज्य के राजस्व पर पड़ रहा है.
सीमित वित्तीय स्पेस: राज्य सरकार को सबसे पहले वेतन, पेंशन और कर्ज की अदायगी (Debt Servicing) जैसे अनिवार्य खर्चों को पूरा करना होता है, ताकि राज्य की साख बची रहे. इसके बाद नए वादों के लिए बजट बहुत कम बचता है.
खर्च का गणित: अगर महिलाओं की मासिक सहायता राशि को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये किया जाता है (करीब 1.3 करोड़ लाभार्थी), तो सालाना 40,000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी. इसके अलावा सालाना 6 मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, विवाह सहायता और शिक्षा अनुदान जैसे वादों को मिला दिया जाए, तो राज्य पर 1.5 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जबकि तमिलनाडु की कुल अनुमानित राजस्व प्राप्तियां ही करीब 2.91 लाख करोड़ रुपये हैं.
क्या है रास्ता: रामकृष्णन का सुझाव है कि सीएम विजय को जनता के सामने खुलकर और ईमानदारी से अपनी बात रखनी चाहिए कि इन वादों को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं, हालांकि मछुआरों को मिलने वाली सहायता (करीब 500 करोड़ खर्च) जैसे छोटे वादे तुरंत पूरे किए जा सकते हैं.
नीतियों पर सवाल: मुफ्त बिजली और कर्ज माफी की घोषणाएं अव्यावहारिक
सरकार के शुरुआती कुछ नीतिगत फैसलों पर भी रामकृष्णन ने सवाल उठाए हैं:
मुफ्त बिजली: दो महीने में 500 यूनिट तक खपत करने वाले परिवारों के लिए मुफ्त बिजली को 100 से बढ़ाकर 200 यूनिट करना प्राथमिकताओं में नहीं होना चाहिए था, क्योंकि आम जनता का मुख्य सरोकार मुफ्त बिजली नहीं था.
फसली कर्ज माफी: चुनाव प्रचार में किए गए वादों के उलट सरकार ने इसका बेहद कमजोर (Diluted) संस्करण पेश किया है जिससे किसान नाराज हैं. रामकृष्णन के अनुसार, सरकार को कावेरी डेल्टा जैसे समृद्ध क्षेत्रों (जहां बंपर पैदावार हुई) के बजाय केवल दक्षिण तमिलनाडु के सूखाग्रस्त या वर्षा-आधारित क्षेत्रों के संकटग्रस्त किसानों को ही लक्षित कर कर्ज माफी देनी चाहिए थी.
मंत्रियों और विधायकों को नसीहत: 'सोशल मीडिया रील्स' से बाहर निकलें, अफसरों से न उलझें
टीवीके के युवा मंत्रियों और विधायकों द्वारा सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और फील्ड विजिट के दौरान सरकारी अधिकारियों के साथ की जा रही आक्रामक नोकझोंक पर भी विश्लेषक ने गहरी चिंता जताई है.
उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था को सिर्फ 'दिखावे' या 'ऑप्टिक्स' तक सीमित नहीं किया जा सकता. सरकारी कर्मचारियों से सार्वजनिक मंचों पर शत्रुतापूर्ण तरीके से उलझने से जनता का कोई भला नहीं होने वाला. टीवीके के नए विधायकों को पहले तमिलनाडु की स्थापित नौकरशाही और प्रशासनिक व्यवस्था (Bureaucracy) के कामकाज को समझना होगा. शीर्ष नेतृत्व को तुरंत हस्तक्षेप कर अपने विधायकों के इस आक्रामक रवैये को शांत (Tone down) करने की नसीहत देनी चाहिए, ताकि प्रशासनिक समन्वय बना रहे.
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)
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