शिवसेना (यूबीटी) में फिर सेंध, सचिन अहीर ने थामा शिंदे का दामन
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शिवसेना (यूबीटी) में फिर सेंध, सचिन अहीर ने थामा शिंदे का दामन

शिवसेना (यूबीटी) के एमएलसी सचिन अहीर ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना जॉइन कर ली। इसके साथ ही उन्होंने विधान परिषद उपसभापति पद के लिए महायुति उम्मीदवार के रूप में नामांकन भी दाखिल किया।


महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मंगलवार को पार्टी को एक और बड़ा झटका तब लगा, जब विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) सचिन अहीर ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया।

महायुति उम्मीदवार के रूप में दाखिल किया नामांकन

शिंदे गुट में शामिल होने के तुरंत बाद सचिन अहीर ने महाराष्ट्र विधान परिषद के उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) पद के लिए महायुति के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया। इसे शिंदे गुट की राजनीतिक मजबूती और उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है।

लोकसभा में भी उद्धव गुट को लग चुका है बड़ा झटका

विधान परिषद से पहले लोकसभा में भी शिवसेना (यूबीटी) को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। हाल ही में पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए। इस घटनाक्रम ने संसद में उद्धव ठाकरे गुट की ताकत को काफी कमजोर कर दिया।

शिंदे गुट में शामिल होने वाले सांसदों में शामिल हैं—

संजय हरिभाऊ जाधव

संजय दीना पाटिल

भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे

संजय उत्तमराव देशमुख

नागेश पाटिल अष्टीकर

ओमराजे निंबालकर

अब संसद में दोनों गुटों की स्थिति

इन छह सांसदों के जाने के बाद लोकसभा में उद्धव ठाकरे गुट के पास अब केवल 3 सांसद रह गए हैं। वहीं, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यह उद्धव गुट में पहली बड़ी संसदीय टूट मानी जा रही है।

दल-बदल कानून के तहत क्यों सुरक्षित हैं सांसद?

इस राजनीतिक घटनाक्रम में दल-बदल विरोधी कानून की अहम भूमिका है। उद्धव गुट छोड़ने वाले छह सांसद पार्टी के कुल 9 सांसदों का दो-तिहाई हिस्सा हैं। दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार, यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं, तो उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती। इसी प्रावधान के कारण इन सांसदों को अयोग्य घोषित किए बिना शिंदे गुट में शामिल होने की कानूनी मान्यता मिल गई।

2022 से जारी है शिवसेना की सियासी लड़ाई

शिवसेना के भीतर सत्ता संघर्ष की शुरुआत जून 2022 में हुई थी, जब एकनाथ शिंदे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी। इसके बाद महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई और राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया।इसके बाद फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए पार्टी का पारंपरिक 'तीर-कमान' चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया। वहीं, उद्धव ठाकरे के गुट को 'शिवसेना (यूबीटी)' नाम दिया गया।

तब से दोनों गुटों के बीच शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक और वैचारिक विरासत को लेकर संघर्ष लगातार जारी है। अब सचिन अहीर के शिंदे गुट में शामिल होने और पहले छह सांसदों की बगावत ने इस राजनीतिक मुकाबले को और तेज कर दिया है।

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