
कुलदीप सेंगर को SC का झटका, सजा निलंबन पर हाईकोर्ट का आदेश पलटा!
शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट से पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा के निलंबन पर नए सिरे से विचार करने को कहा...
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई) को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत उन्नाव दुष्कर्म मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने इस मामले को वापस दिल्ली हाईकोर्ट के पास भेजते हुए इस पर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है। यह घटनाक्रम केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत की इस पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह या तो दोषसिद्धि के खिलाफ सेंगर की अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला सुनाए या फिर उसकी सजा के निलंबन की मांग करने वाली याचिका पर एक नया आदेश पारित करे।
बचाव पक्ष ने सबूतों पर उठाए सवाल
सेंगर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत के समक्ष दलील दी कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इस बात पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं कि कथित घटना के समय 'अभियोजिका' (कानूनी कार्यवाही शुरू करने वाली पीड़ित महिला) नाबालिग थी या नहीं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने तर्क दिया कि दोषसिद्धि और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत गंभीर प्रावधानों की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए इस पहलू की बारीकी से जांच की आवश्यकता है।
सीबीआई ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को दी चुनौती
सीबीआई का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बचाव पक्ष की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने कानून की बेहद संकीर्ण व्याख्या अपनाकर गंभीर भूल की है। उन्होंने अदालत को बताया कि यह निष्कर्ष कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है कि एक विधायक पॉक्सो (POCSO) ढांचे के तहत 'लोक सेवक' (Public Servant) की परिभाषा के दायरे में नहीं आता है। सॉलिसिटर जनरल ने जोर देकर कहा कि यह निष्कर्ष इस कानून के मूल उद्देश्य के पूरी तरह विपरीत है। उन्होंने आगे कहा कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि स्पष्ट रूप से अधिकार और प्रभाव के पद पर होता है।
पीठ ने कानूनी पहलुओं पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची अभियोजन पक्ष के रुख से सहमत नजर आए। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा, "हम हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए इस अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं कर रहे हैं।" इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए ही बनाया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने एक व्यावहारिक रास्ता सुझाते हुए टिप्पणी की कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लंबित रखने के बजाय दिल्ली हाईकोर्ट को इस मुद्दे पर फिर से विचार करने के लिए कहा जा सकता है। इसके बाद ही अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए उसे दोबारा फैसला करने का निर्देश जारी किया।

