
पश्चिम बंगाल में जीती BJP तो UP भाग आया कानपुर GST घोटाले का जालसाज!
उत्तर प्रदेश के कानपुर से 1600 करोड़ के जीएसटी घोटाले का खुलासा हुआ। पुलिस के डर से मुख्य आरोपी पश्चिम बंगाल भाग गया। लेकिन अब बीजेपी की जीत के बाद डरकर लौटा...
उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने एक ऐसे फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है, जिसने न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED), आयकर विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी हैरत में डाल दिया है। यह पूरा मामला किसी फिल्मी पटकथा जैसा लग सकता है, जहां एक साधारण लूट की घटना ने धीरे-धीरे अरबों रुपये के हवाला कारोबार, जीएसटी चोरी और फर्जी कंपनियों के एक अंतरराष्ट्रीय मकड़जाल का खुलासा कर दिया। कबाड़ के काम और बूचड़खाने की गतिविधियों की आड़ में छिपे इस सिंडिकेट ने देश की अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुँचाने की कोशिश की है।
लूट की एक वारदात से खुला अरबों का राज
इस विशाल फर्जीवाड़े की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब 16 फरवरी को कानपुर के श्याम नगर चौकी के पास 24 लाख रुपये की एक सनसनीखेज लूट की घटना हुई। इस मामले में पीड़ित वासिद और अरशद नामक व्यक्ति थे, जो जाजमऊ निवासी महफूज आलम उर्फ 'पप्पू छुरी' के लिए काम करते थे। जब पुलिस ने इस लूट की जांच के दौरान पैसों के स्रोत और संदिग्ध कैश ट्रांजेक्शन का पीछा करना शुरू किया तो वे महफूज आलम के बैंक खातों तक जा पहुंचे। शुरुआती छानबीन में ही पुलिस को ढाई साल के भीतर इन खातों के जरिए करीब 1600 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन का पता चला, जिसने जांच की दिशा ही बदल दी।
मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी और कोलकाता कनेक्शन
इस पूरे गिरोह का मुख्य आरोपी महफूज अली उर्फ पप्पू छुरी पुलिस की रडार पर आते ही शहर छोड़कर फरार हो गया था। फरारी के दौरान उसने कोलकाता में अपनी ससुराल में शरण ली, जहाँ वह एक स्थानीय राजनीतिक प्रभाव के संरक्षण में छिपा हुआ था। हालांकि, पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरणों के बदलने के बाद जब उसे अपनी सुरक्षा का खतरा महसूस हुआ तो उसने वापस कानपुर आने का फैसला किया। पुलिस ने सक्रिय मुखबिरों के जाल की मदद से उसे घेराबंदी कर जाजमऊ इलाके से गिरफ्तार कर लिया। महफूज के साथ-साथ उसके साले महताब आलम और उसके बेटे को भी पुलिस ने दबोच लिया है।
धोखाधड़ी का शातिर तरीका: बेगुनाहों का इस्तेमाल
महफूज आलम और उसके सिंडिकेट की कार्यप्रणाली जितनी सरल थी, उतनी ही घातक भी। यह गिरोह समाज के सबसे गरीब और कम पढ़े-लिखे वर्ग, जैसे मजदूरों, पेंटरों और कबाड़ बीनने वालों को निशाना बनाता था। इन लोगों को मामूली आर्थिक मदद या नौकरी का लालच देकर उनके आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान पत्र ले लिए जाते थे। इन असली दस्तावेजों का उपयोग करके फर्जी कंपनियां और जीएसटी फर्में तैयार की जाती थीं, जिनका वास्तविक वजूद सिर्फ कागजों पर होता था। इन फर्मों के जरिए भारी मात्रा में फर्जी बिलिंग और लेनदेन दिखाया जाता था ताकि काले धन को सफेद किया जा सके।
बेरोजगारों के नाम पर करोड़ों का फर्जी ट्रांजेक्शन
जांच के दौरान पुलिस को ऐसे कई उदाहरण मिले जहाँ गरीब लोग अनजाने में इस सिंडिकेट का हिस्सा बन गए। जाजमऊ की रहने वाली आरती, जो मजदूरी कर जीवन यापन करती हैं, उनके नाम पर 'आरती इंटरप्राइजेज' बनाकर 100 करोड़ रुपये का ट्रांजेक्शन किया गया। इसी तरह, शहनवाज के नाम पर 'राजा इंटरप्राइजेज' के जरिए 64.44 करोड़, और काशिफ व अल्फिशा के नाम पर बनाई गई कंपनियों से क्रमशः 68.25 करोड़ और 133 करोड़ रुपये घुमाए गए। एक कबाड़ी अजय शुक्ला के नाम पर 'मां विध्यवासिनी इंटरप्राइजेज' के जरिए 21 करोड़ और पेंटर निखिल के नाम पर 7.75 करोड़ का लेनदेन हुआ। इन सभी पीड़ितों को भनक तक नहीं थी कि उनके नाम पर अरबों का खेल चल रहा है।
कानूनी दिमाग और तकनीकी जाल
इस सिंडिकेट के पीछे फिरोज खान नाम के एक वकील का दिमाग बताया जा रहा है। फिरोज खान कानूनी और तकनीकी बारीकियों का जानकार था और वही इन फर्जी जीएसटी फर्मों को कानूनी रूप से 'वैध' दिखाने का ढांचा तैयार करता था। आरोपियों ने पूरी प्लानिंग के साथ अलग-अलग राज्यों में बैंक अकाउंट खुलवाए थे। अब तक की जांच में 16 बैंकों के 100 से ज्यादा खातों का पता चला है, जिनके माध्यम से कुल 3200 करोड़ रुपये से अधिक का लेनदेन सामने आया है। यह नेटवर्क कानपुर से लेकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ था।
हवाला, टेरर फंडिंग और केंद्रीय एजेंसियों की जांच
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के अनुसार, यह गिरोह अवैध कैश को वैध दिखाने के लिए हवाला नेटवर्क का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा था। चूंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है। इसलिए अब इसमें टेरर फंडिंग के एंगल की भी जांच की जा रही है। आयकर विभाग और ईडी अब इस बात की तहकीकात कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी रकम का असली स्रोत क्या था और इसे किन जगहों पर इस्तेमाल किया गया। संदिग्ध खातों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी खंगाली जा रही है और आने वाले समय में कई बैंकिंग अधिकारियों पर भी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।
इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कैसे पहचान पत्रों का दुरुपयोग कर एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी की जा सकती है। कानपुर पुलिस को उम्मीद है कि मास्टरमाइंड से पूछताछ के बाद इस सिंडिकेट के कई और बड़े चेहरों के नाम सामने आएंगे।

