
यूपी पंचायत चुनाव टालना असंवैधानिक, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगी टाइमलाइन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले को गलत बताया। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के साथ मांगी चुनाव की टाइमलाइन।
UP Panchayat Chunav 2026: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों (UP Panchayat Chunav 2026) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने आज एक बेहद कड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा पंचायत चुनाव टालने की प्रक्रिया को सीधे तौर पर 'असंवैधानिक' करार दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि मौजूदा ग्राम प्रधानों को कार्यकाल खत्म होने के बाद 'प्रशासक' (Administrator) के रूप में पद पर बने रहने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती।
सहारनपुर के याचिकाकर्ता अरविंद राठौर की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की सिंगल बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस अंतरिम आदेश को कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में माना है, जिसमें प्रधानों को ही वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां सौंप दी गई थीं। हालांकि, अदालत ने अभी सरकार के फैसले पर किसी तरह की कोई 'अंतरिम रोक' (Interim Stay) नहीं लगाई है, लेकिन सरकार से बेहद सख्त लहजे में पूरी टाइमलाइन मांग ली है।
"प्रशासक नियुक्त करना कोर्ट की अवमानना" हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश शासन के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत के इस आदेश के तीन सबसे बड़े कानूनी बिंदु निम्नलिखित हैं:
डिवीजन बेंच के आदेश का उल्लंघन: हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करना पूर्व में आए डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के आदेशों का सीधा उल्लंघन है, जो कानूनी रूप से अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।
ओबीसी रिपोर्ट पर अंतिम अवसर: अदालत ने राज्य सरकार को 'अंतिम अवसर' देते हुए निर्देश दिया है कि वह पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC Commission) की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाने के लिए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करे।
चुनाव की स्पष्ट टाइमलाइन की मांग: कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि सरकार ने ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए कोई आयोग गठित किया है, तो उसकी प्रगति रिपोर्ट और अन्य विवरण अदालत में प्रस्तुत किए जाएं। इसके साथ ही हलफनामे में यह स्पष्ट रूप से लिखित होना चाहिए कि राज्य में पंचायत चुनाव किस निश्चित समय सीमा के भीतर संपन्न करा लिए जाएंगे।
इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई अब 13 जुलाई 2026 को दोपहर 2:00 बजे मुकर्रर की गई है।
क्या है पूरा विवाद? 26 मई को खत्म हो चुका है कार्यकाल
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का वैधानिक कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका है। चुनाव समय पर न करा पाने की स्थिति को देखते हुए योगी सरकार ने 25 मई 2026 को एक विवादास्पद आदेश जारी कर मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही अगले आदेश तक प्रशासक नियुक्त कर दिया था, ताकि गांवों के विकास कार्य न रुकें।
याचिकाकर्ता अरविंद राठौर ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए मांग की है कि इन गैर-कानूनी प्रशासकों को तुरंत हटाया जाए और राज्य में जल्द से जल्द लोकतांत्रिक तरीके से त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराए जाएं।
वोटर लिस्ट तो आ गई, लेकिन 'ओबीसी कमीशन' के फेर में फंसा पेंच
दरअसल, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव मई 2026 में ही निर्धारित थे, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की देरी के कारण पूरा गणित उलझ गया:
देरी से आई वोटर लिस्ट: यूपी में पंचायत चुनाव की फाइनल मतदाता सूची का प्रकाशन ही समय पर नहीं हो सका और यह 12 जून 2026 को जिला स्तर पर जारी हो पाई (इस नई सूची में करीब 40 लाख नए युवा वोटरों के नाम जुड़े हैं)।
6 महीने का वक्त और मार्च 2027 का डर: सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले के तहत ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन तो किया, लेकिन उसे हर जिले में पिछड़ों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए 6 महीने का लंबा समय दे दिया गया।
अगर पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी रिपोर्ट नवंबर या दिसंबर 2026 तक सौंपता है, तो उसके बाद वार्डों का आरक्षण तय करने और अधिसूचना जारी करने में समय लगेगा। ऐसी स्थिति में मार्च 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पंचायत चुनाव कराना निर्वाचन आयोग और प्रशासन के लिए लगभग असंभव हो जाएगा। हाईकोर्ट ने इसी बिंदु को पकड़ते हुए नवंबर-दिसंबर तक के समय को बहुत ज्यादा (अत्यधिक) बताया है और सरकार से तुरंत एक्शन प्लान मांगा है। 13 जुलाई की सुनवाई तय करेगी कि यूपी के गांवों की सरकार का भविष्य क्या होगा।
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