
हार से ऐतिहासिक जीत तक, कैसे बदले वी डी सतीशन के सियासी दिन
वी डी सतीशन ने संघर्ष, संगठन और आक्रामक विपक्षी राजनीति के दम पर कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत दिलाकर केरल की सत्ता तक पहुंचाया।
7 अप्रैल 2021 को, केरल में मतदान होने से महज़ 36 घंटे पहले, मैं उस समय के विपक्ष के नेता V D Satheesan से उनके परवूर स्थित विधायक कार्यालय में मिला था। कमरा पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से भरा हुआ था, लेकिन उन्होंने थोड़ी देर की वीडियो बातचीत के लिए समय निकाला।मैंने सीधे सवाल से शुरुआत की — क्या मैं केरल के अगले मुख्यमंत्री से बात कर रहा हूँ? सतीशन का जवाब तुरंत और साफ़ था। उन्होंने कहा, “नहीं। यह हमारी पार्टी की परंपरा नहीं है। कांग्रेस पहले से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं करती।”
चुनाव परिणाम को लेकर उनका आत्मविश्वास बिल्कुल अलग स्तर का था। उनका कहना था कि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) निर्णायक जीत की ओर बढ़ रहा है। सिर्फ जीत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जीत। उन्होंने दावा किया कि 90 सीटें तो तय हैं और संख्या 102 तक जा सकती है। वैकोम जैसी सीटों का ज़िक्र वे ऐसे कर रहे थे मानो जीत पहले ही पक्की हो चुकी हो।
चुनाव प्रचार के दौरान सतीशन ने भावुक होकर कहा था कि अगर UDF हार गया तो वे राजनीतिक संन्यास ले लेंगे। मैंने जब यह मुद्दा उठाया तो उन्होंने इसे अपने विश्वास की अभिव्यक्ति बताया। लेकिन जब मैंने पूछा कि अगर सचमुच ऐसी स्थिति आ गई तो वे क्या करेंगे, तो वे कुछ पल रुके, मुस्कुराए और बोले — “यह अच्छा सवाल है। इसका जवाब मेरे पास है। मैंने इस बारे में सोचा भी है और योजना भी बनाई है। अगर ऐसी स्थिति आई तो अपनी आख़िरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताऊँगा।” हालाँकि वह स्थिति कभी आई ही नहीं।
UDF ने रिकॉर्ड 102 सीटें जीतकर दस साल पुराने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) शासन का अंत कर दिया। इस जीत में सतीशन की लगातार संगठनात्मक मेहनत, गुटों को साथ लाने की क्षमता और अनुशासित राजनीतिक संदेश की बड़ी भूमिका थी। विधानसभा में भी उन्होंने खुद को एक गंभीर और तैयारी के साथ बोलने वाले नेता के रूप में स्थापित किया।
आज जब वे केरल के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाल रहे हैं, तब परवूर की वह बातचीत सिर्फ आत्मविश्वास नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक सूझबूझ का प्रमाण लगती है।
शुरुआती जीवन
वी डी सतीशन का जन्म एर्नाकुलम जिले के नेट्टूर में हुआ था, न कि परवूर में, जहाँ बाद में उनका राजनीतिक करियर मजबूत हुआ। अपनी पीढ़ी के कई कांग्रेस नेताओं की तरह उनकी शुरुआती राजनीतिक ट्रेनिंग छात्र राजनीति से हुई।वे केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) और यूथ कांग्रेस के जरिए आगे बढ़े, लेकिन यह सफर आसान नहीं था। कई बार वे महत्वपूर्ण पदों के बेहद करीब पहुँचे, लेकिन अंतिम समय में मौका हाथ से निकल गया। KSU और राज्य यूथ कांग्रेस दोनों में शीर्ष पद उनसे छूट गए। इन अनुभवों ने उनकी छवि ऐसे नेता की बनाई जो सत्ता के करीब तो आता है, लेकिन इंतजार करना पड़ता है।
चुनावी सफर
उनकी चुनावी यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। 1996 में, 32 साल की उम्र में, यूथ कांग्रेस नेता के तौर पर उन्होंने पहली बार परवूर से चुनाव लड़ा और हार गए। यह हार किसी युवा नेता के करियर को रोक सकती थी।लेकिन पाँच साल बाद, 2001 में UDF की लहर के दौरान, उन्होंने CPI के वरिष्ठ नेता पी राजू को हराकर बड़ी जीत दर्ज की। यही जीत उनके लंबे विधायी करियर की शुरुआत बनी।
विधानसभा में पहचान
विधानसभा में सतीशन ने खुद को एक गंभीर और अध्ययनशील वक्ता के रूप में स्थापित किया। 2006 में वी एस अच्युतानंदन सरकार के दौरान उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री टी एम थॉमस आइजैक के साथ लॉटरी नीति पर खुली बहस की। यह वह क्षण था जिसने दिखाया कि वे सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर गहराई से चर्चा करने वाले नेता हैं।
लगातार संघर्ष और उभार
2011 से 2016 तक की उम्मन चांडी सरकार के दौरान उन्हें मंत्री पद नहीं मिला। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि वे अक्सर सत्ता के बेहद करीब पहुँचकर भी पीछे रह जाते हैं।फिर भी वे चुप नहीं बैठे। उन्होंने अपनी ही सरकार के फैसलों और नेतृत्व पर सवाल उठाए। इससे पार्टी के भीतर उन्हें आलोचना भी मिली और सम्मान भी।
पिनराई विजयन के पहले कार्यकाल में सतीशन की भूमिका और मजबूत हुई। वे कांग्रेस के उन युवा विधायकों के समूह के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए जिन्हें अनौपचारिक तौर पर “ग्रीन एमएलए” कहा जाता था। यह समूह पर्यावरण संरक्षण, पारदर्शिता और आधुनिक राजनीतिक संवाद जैसे मुद्दे उठा रहा था। सोशल मीडिया पर भी उनकी सक्रियता ज्यादा थी और वे कांग्रेस की छवि बदलने की कोशिश कर रहे थे।
एक तेज़तर्रार वक्ता
सतीशन की राजनीति के केंद्र में बौद्धिकता हमेशा रही है। वे मलयालम साहित्य से लेकर समकालीन वैश्विक चिंतकों, जैसे Yanis Varoufakis, तक को पढ़ने के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि उनके भाषण आमतौर पर संतुलित, व्यवस्थित और तथ्यों पर आधारित होते हैं।हाल के वर्षों में हालांकि उनकी शैली में बदलाव दिखा। वे अधिक आक्रामक विपक्षी नेता की भूमिका में नज़र आने लगे। मीडिया से बातचीत में कई बार उनका अंदाज़ टकरावपूर्ण और तीखा दिखाई दिया।
कांग्रेस के भीतर कुछ लोगों का मानना था कि वे खुद को अधिक assertive नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ हद तक उस शैली में जो Pinarayi Vijayan से जोड़ी जाती है।
आलोचना और जवाब
इसी दौर में सतीशन पर कई बार बड़े-बड़े दावे करने और तथ्यों से आगे निकल जाने के आरोप भी लगे। वामपंथी खेमे, खासकर सोशल मीडिया नेटवर्क ने, उन्हें “झूठा” साबित करने के लिए लगातार अभियान चलाया।लेकिन सतीशन ने इसे अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की। उनका कहना था कि CPI(M) कार्यकर्ता दरअसल उनकी आलोचना करके उनकी मौजूदगी और लोकप्रियता को लगातार चर्चा में बनाए रख रहे हैं। उनके मुताबिक, विरोध ने ही उन्हें राजनीतिक रूप से और ज्यादा दृश्यता दी।
नेतृत्व की दौड़
कांग्रेस के भीतर नेतृत्व की लड़ाई में सतीशन के पक्ष में सिर्फ अंदरूनी गणित नहीं था, बल्कि व्यापक जनसमर्थन भी था। नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक हिस्से ने उन्हें वाम सरकार के खिलाफ नैतिक विपक्षी चेहरे के रूप में पेश किया।सतीशन ने पार्टी ढाँचे से बाहर भी समर्थन का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया। उन्होंने सामाजिक संगठनों से संवाद बढ़ाया, मुद्दा आधारित अभियानों को आगे बढ़ाया और बाहरी समर्थन को पार्टी के अंदर अपनी राजनीतिक ताकत में बदल दिया। यह कुछ वैसा ही था जैसा 2006 में CPI(M) के दिग्गज नेता V S Achuthanandan ने किया था। यही वजह रही कि कांग्रेस नेतृत्व को सतीशन का नेतृत्व सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि राजनीतिक आवश्यकता लगने लगा।
अब मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने आक्रामक राजनीतिक स्वभाव और शासन की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। एक युवा नेता, जिसने अपना पहला चुनाव हारा…एक विधायक, जिसे बार-बार सत्ता से दूर रहना पड़ा…और फिर एक ऐसे नेता में बदलना, जिसने ऐतिहासिक जीत की अगुवाई की —
वी डी सतीशन की यात्रा लगातार संघर्ष, धैर्य और खुद को बदलते रहने की कहानी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री के रूप में उनका अगला अध्याय केरल की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

