सतीशन की जीत, राहुल की हार? कांग्रेस ने सही करके भी कर दी गलती
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फाइल फोटो।

सतीशन की जीत, राहुल की हार? कांग्रेस ने 'सही' करके भी कर दी 'गलती'

राहुल गांधी का प्रभाव कम हुआ और वीडी सतीशन की जीत हुई। फिर 10 दिनों की सार्वजनिक कलह ने कांग्रेस के भीतर की दरारों को किया उजागर कर दिया।


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अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव (संगठन) और राहुल गांधी के प्रमुख सहयोगी केसी वेणुगोपाल की उम्मीदों को झटका देते हुए, कांग्रेस आलाकमान ने आखिरकार वीडी सतीशन को केरल का अगला मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर मुहर लगा दी है। हालांकि गुरुवार (14 मई) को लिया गया यह निर्णय 10 दिनों के गहन विचार-विमर्श और सार्वजनिक रूप से उजागर हुए विभाजनों के बाद आया है, जिसने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की कमजोरियों को सबके सामने रख दिया है।

चर्चाओं में शामिल कांग्रेस नेताओं का स्वीकार करना है कि वेणुगोपाल के पक्ष में आम सहमति बनाने के लिए "गंभीर प्रयास" किए गए थे। लेकिन सतीशन के पक्ष में पलड़ा भारी करने वाले कारकों का राहुल गांधी को अंततः अहसास हुआ और वे उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सके। फिर 4 मई को केरल विधानसभा की 140 सीटों में से 102 सीटें जीतकर कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) के एक दशक पुराने शासन को समाप्त किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री पद के लिए तीन नाम प्रमुखता से उभरे थे।

चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर त्रिकोणीय मुकाबला

केसी वेणुगोपाल, जिन्होंने मौजूदा सांसदों को विधानसभा चुनाव न लड़ने के पार्टी के निर्देश के कारण चुनाव नहीं लड़ा था, उन्हें व्यापक रूप से राहुल गांधी की पसंद माना जा रहा था। दूसरी ओर, पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे वीडी सतीशन को उस व्यक्ति के रूप में देखा गया, जिन्होंने पिछले पांच वर्षों में पार्टी संगठन और चुनावी विमर्श दोनों को नए सिरे से खड़ा किया। उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ-साथ केरल के नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त था।

तीसरे दावेदार अनुभवी नेता रमेश चेन्निथला थे, जिनका दावा काफी हद तक उनकी वरिष्ठता और पार्टी के प्रति वफादारी पर टिका था। यह भी माना जा रहा था कि यदि सतीशन और वेणुगोपाल के बीच मुकाबला बहुत कड़वा हो जाता है तो वे एक समझौते वाले विकल्प के रूप में उभर सकते हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि चुनाव न लड़ने के बावजूद वेणुगोपाल का नाम दावेदारों में शामिल होना यह दर्शाता है कि आलाकमान, विशेष रूप से राहुल गांधी, उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए कितने उत्सुक थे।

वेणुगोपाल का दबदबा और विधायकों का समर्थन

सात वर्षों तक पार्टी के संगठनात्मक महासचिव के रूप में, वेणुगोपाल ने उन कुछ नेताओं में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, जो न केवल राहुल गांधी के करीबी हैं। बल्कि पार्टी के केंद्रीय सत्ता ढांचे तक पहुंच को भी नियंत्रित करते हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि इसी कद के कारण केरल में उम्मीदवारों के चयन और अभियान के संसाधनों को जुटाने में वेणुगोपाल की भूमिका बहुत अधिक रही।

राहुल गांधी के लिए उनकी अपरिहार्यता और उन्हें सीएम देखने की नेतृत्व की इच्छा के कारण ही कांग्रेस के 63 नवनिर्वाचित विधायकों में से 40 से अधिक ने वेणुगोपाल का समर्थन किया। यह समर्थन तब सामने आया जब एआईसीसी पर्यवेक्षकों मुकुल वासनिक और अजय माकन ने 7 मई को विधायकों की पसंद जानने के लिए उनसे मुलाकात की थी। कांग्रेस विधायक दल (CLP) में बहुमत मिलने के बाद, नेतृत्व को शुरू में लगा कि वेणुगोपाल के लिए मुख्यमंत्री आवास 'क्लिफ हाउस' तक का रास्ता आसान होगा।

दिल्ली की चर्चा और राहुल गांधी की नाराजगी

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से सलाह लेने वाले एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के अनुसार, एकमात्र बाधा सतीशन और चेन्निथला को आलाकमान के फैसले के लिए राजी करना था। लेकिन जैसे ही चर्चा तिरुवनंतपुरम से नई दिल्ली स्थानांतरित हुई, वेणुगोपाल की राह मुश्किल हो गई। फिर 9 मई को दिल्ली में खड़गे और राहुल द्वारा तीनों दावेदारों से मुलाकात करने से पहले ही केरल में सतीशन के लिए कार्यकर्ताओं का भारी समर्थन दिखने लगा था, जबकि अधिकांश विधायक वेणुगोपाल के साथ थे।

चर्चा के दौरान समर्थकों के बीच जारी सार्वजनिक खींचतान से नाराज होकर राहुल गांधी ने बैठक को बीच में ही समाप्त कर दिया। उन्होंने तीनों नेताओं से पहले अपने समर्थकों के बीच जारी विवाद को खत्म करने को कहा। क्योंकि उनके अनुसार यह विवाद यूडीएफ की शानदार जीत पर भारी पड़ रहा था।

फैसले में देरी और बढ़ता जनाक्रोश

राहुल गांधी के निर्देश का खास असर नहीं हुआ। निर्णय लेने में आलाकमान ने जितनी देरी की, सतीशन के पक्ष में आवाज उतनी ही बुलंद होती गई। समय के साथ यह समर्थन गुस्से में बदल गया। यहां तक कि कांग्रेस की प्रमुख सहयोगी पार्टी 'इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग' (IUML), जिसने सार्वजनिक रूप से सतीशन का समर्थन किया था, ने भी इस अनिश्चितता पर नाराजगी जताई।

13 मई तक वायनाड (जो अब प्रियंका गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है और पहले राहुल गांधी का चुनावी सहारा रहा है) में ऐसे पोस्टर लग गए थे, जिनमें वेणुगोपाल को सतीशन पर तरजीह देने की स्थिति में गांधी भाई-बहनों को राजनीतिक परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। इन्ही परिस्थितियों के दबाव में अंततः वीडी सतीशन के नाम पर अंतिम मुहर लगाई गई।

वेणुगोपाल के पक्ष में राहुल की पैरवी और पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं का अलग रुख; 'सार्वजनिक भावना' बनाम 'निजी वफादारी' की जंग

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता, जिनसे राहुल गांधी ने 13 मई को परामर्श किया था, उनके अनुसार राहुल गांधी वीडी सतीशन की "कड़ी पैरवी की रणनीति" और "अनुशासनहीनता" पर काफी क्रोधित थे। सूत्रों का कहना है कि शायद "वेणुगोपाल खेमे ने राहुल को यह विश्वास दिला दिया था कि सतीशन के पक्ष में दिख रही सार्वजनिक भावना स्वाभाविक नहीं बल्कि प्रायोजित (Manufactured) थी।" लोकसभा में विपक्ष के नेता (राहुल गांधी) के लिए स्थितियां तब और कठिन हो गईं, जब मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री ए.के. एंटनी और केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कम से कम दो पूर्व अध्यक्षों ने उस फैसले की वकालत की, जो "जनभावना का सम्मान" करता हो, न कि केवल विधायक दल (CLP) के बहुमत को प्राथमिकता देता हो। यह स्पष्ट रूप से सतीशन के लिए एक परोक्ष समर्थन था।

'आलाकमान के भीतर अलग-थलग पड़े राहुल'

कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, "शायद पहली बार इतने महत्वपूर्ण मामले पर राहुल गांधी आलाकमान के भीतर ही अलग-थलग दिखाई दिए। सतीशन ने आक्रामक लॉबिंग करके शायद अपनी सीमाएं लांघी होंगी, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं की भावना के साथ-साथ IUML के समर्थन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। प्रियंका गांधी और खड़गे दोनों ही इस बात को समझ गए थे।" पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पिछले 10 दिनों की तीखी बहस ने राहुल और कांग्रेस आलाकमान को पूरी तरह से "एक्सपोज" (उजागर) कर दिया है और इस आलोचना के प्रति संवेदनशील बना दिया है कि नेतृत्व जनसमर्थन से ऊपर व्यक्तिगत वफादारी को थोपने की कोशिश कर रहा था।

सोनिया गांधी के दौर से तुलना और वफादारी का सवाल

कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के एक वरिष्ठ सदस्य ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "हर कोई जानता है कि केसी (वेणुगोपाल) राहुल के करीबी व्यक्ति हैं। यही उनकी एकमात्र राजनीतिक पहचान है। भले ही यह मान लिया जाए कि विधायक किसी योग्यता या व्यक्तिगत वफादारी के कारण केसी का समर्थन कर रहे थे। लेकिन जनता में यही धारणा बनी कि राहुल उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। सोनिया गांधी ने कभी भी खुद को ऐसी स्थिति में नहीं आने दिया होता जहां उन पर इस तरह के सवाल उठें।"

सही फैसला लेकिन भारी कीमत पर?

एक अन्य पार्टी नेता, जो पहले एआईसीसी पर्यवेक्षक रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने "अंततः सतीशन को चुनकर सही काम किया होगा," लेकिन उन्होंने समझाया कि इस लंबी देरी, मीडिया और सोशल मीडिया पर 'वेणुगोपाल बनाम सतीशन' की 24 घंटे चली बहस और यह धारणा कि वेणुगोपाल केवल राहुल के कारण रेस में थे, ने आलाकमान की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

उन्होंने आगे कहा, "जिसे आलाकमान द्वारा लिया गया एक तार्किक और सही निर्णय माना जाना चाहिए था, वह अब ऐसा लग रहा है जैसे नेतृत्व को सतीशन और उनके समर्थकों के दबाव में आकर यह फैसला लेना पड़ा। यह नेतृत्व को कमजोर दिखाता है, जैसे कि उन्हें जनभावना की परवाह नहीं है या वे उसे समझ पाने में असमर्थ हैं।" उक्त नेता ने यह भी जोड़ा कि यदि राहुल का वेणुगोपाल की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से कोई लेना-देना नहीं था। तो उन्हें केंद्रीय पर्यवेक्षकों और केरल के नेताओं को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए था कि मुख्यमंत्री नवनिर्वाचित विधायकों में से ही चुना जाएगा। वेणुगोपाल का नाम रेस में होना ही पूरी प्रक्रिया को दूषित कर गया और ऐसा लगा जैसे राहुल अपने एक वफादार को पुरस्कृत करने की कोशिश कर रहे हैं।

यद्यपि वीडी सतीशन के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का रास्ता अब पूरी तरह साफ हो गया है। लेकिन पार्टी के भीतर एक धड़ा ऐसा भी है, जिसका मानना है कि जिस तरह से आलाकमान ने "एक पक्ष लेते हुए खुद को दिखने दिया", वह भविष्य में नेतृत्व के लिए मुश्किलें पैदा करेगा। पार्टी सूत्रों का कहना है कि भविष्य में जब भी सतीशन और केसी वेणुगोपाल के बीच किसी मुद्दे पर असहमति होगी तो आलाकमान की इसी भूमिका पर उंगलियां उठेंगी।

मंत्रिमंडल का गठन: सतीशन की पहली बड़ी चुनौती

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने संकेत दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में सतीशन की सबसे पहली और बड़ी चुनौती अपने मंत्रिपरिषद (मंत्रिमंडल) को अंतिम रूप देना होगा। नेता के अनुसार, "चूँकि अधिकांश विधायकों ने वेणुगोपाल का समर्थन किया था। इसलिए वेणुगोपाल स्वाभाविक रूप से अपने समर्थक विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने का प्रयास करेंगे। वहीं दूसरी ओर, सतीशन चाहेंगे कि उनके वफादार नेताओं को कैबिनेट में जगह मिले। यह खींचतान सतीशन के लिए पहली परीक्षा साबित हो सकती है।"

वरिष्ठ नेताओं को साधना और वेणुगोपाल का संभावित हस्तक्षेप

सतीशन के लिए एक और बड़ी चुनौती रमेश चेन्निथला का विश्वास जीतना होगा। चेन्निथला, जिन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे छोड़ दिया गया है, उनके मन में इस फैसले को लेकर स्वाभाविक रूप से असंतोष होगा। हालांकि, सतीशन के लिए इससे भी बड़ी चुनौती सरकार के कामकाज शुरू होने के बाद आ सकती है। पार्टी नेता का मानना है कि वेणुगोपाल किसी न किसी रूप में सरकारी निर्णयों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर सकते हैं।

आलाकमान की छवि पर असर

नेता ने अंत में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "जब भी वेणुगोपाल की ओर से हस्तक्षेप की स्थिति बनेगी, हर बार कांग्रेस आलाकमान पर सवाल खड़े किए जाएंगे। हमने इस पूरी स्थिति को बहुत ही खराब तरीके से संभाला है।" पार्टी के भीतर यह आम चर्चा है कि निर्णय लेने में हुई देरी और सार्वजनिक रूप से उभरे मतभेदों ने नेतृत्व की निर्णय क्षमता और जनभावना को समझने की उसकी कुशलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

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