
विजय के साथ AIADMK का बागी गुट, शिवसेना की राह पर तमिलनाडु की राजनीति!
विजय की फ्लोर टेस्ट में जीत तो हो गई। लेकिन क्या AIADMK भी शिवसेना की राह पर चल पड़ी है? विश्वास मत ने बढ़ाई पलानीस्वामी की मुश्किलें, पार्टी में दोफाड़...
तमिलनाडु की चार दिन पुरानी टीवीके (TVK) सरकार ने बुधवार (13 मई) को एक बड़ी बाधा पार कर ली है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार ने अन्नाद्रमुक के 25 बागी विधायकों के समर्थन से विश्वास मत जीत लिया। हालांकि विपक्षी दल द्रमुक (DMK) ने खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) के गंभीर आरोप लगाए। लेकिन मुख्यमंत्री विजय ने इन्हें सिरे से खारिज कर दिया। अन्नाद्रमुक के ये 25 बागी विधायक सी.वी. षणमुगम और एस.पी. वेलुमणि खेमे के बताए जा रहे हैं, जिन्होंने अपने पार्टी प्रमुख एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) के खिलाफ जाकर विजय सरकार का समर्थन किया। हालांकि विजय के पास पहले से पर्याप्त संख्या बल था। लेकिन इस समर्थन ने अन्नाद्रमुक के भीतर की गहरी दरार को दुनिया के सामने ला दिया है।
अन्नाद्रमुक का भविष्य और राजनीतिक पतन की शुरुआत
'द फेडरल' के प्रधान संपादक एस. श्रीनिवासन के अनुसार, यह फ्लोर टेस्ट केवल विजय की सत्ता बचाने का जरिया नहीं था। बल्कि इसने अन्नाद्रमुक को एक बहुत ही कठिन स्थिति में खड़ा कर दिया है। उन्होंने इसे अन्नाद्रमुक के राजनीतिक अंत की शुरुआत करार दिया है। सदन के भीतर अन्नाद्रमुक अब स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बटी नजर आ रही है। एक तरफ ईपीएस ने एग्री कृष्णमूर्ति को पार्टी व्हिप नियुक्त करने के लिए पत्र दिया तो दूसरी तरफ बागी गुट ने एस.पी. वेलुमणि को अपना व्हिप बताया। सदन के बाहर भी दोनों पक्षों ने अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस की। दिलचस्प बात यह है कि बागी गुट खुलेआम पार्टी तोड़ने की बात नहीं कर रहा। बल्कि वे टी.टी.वी. दिनकरण, वी.के. शशिकला और अन्य धड़ों को साथ लाकर पार्टी को "एकजुट" करने का दावा कर रहे हैं, जिसका असली मकसद ईपीएस को नेतृत्व से हटाना प्रतीत होता है।
पर्दे के पीछे का खेल और गठबंधन की नाकाम कोशिशें
विश्वास मत से पहले राजनीतिक गलियारों में कई चौंकाने वाली चर्चाएं हुईं। बागी विधायकों का दावा है कि ईपीएस के नेतृत्व में द्रमुक (DMK) के समर्थन से अन्नाद्रमुक सरकार बनाने की गंभीर कोशिश की गई थी। बागियों का कहना है कि उन्होंने इसका विरोध किया क्योंकि अन्नाद्रमुक अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के साथ नहीं जा सकती थी। यह भी खुलासा हुआ कि दिल्ली में भाजपा नेतृत्व के आशीर्वाद से वीसीके (VCK) नेता थोल थिरुमावलवन को मुख्यमंत्री बनाने और अन्नाद्रमुक-द्रमुक द्वारा उन्हें समर्थन देने का प्रस्ताव भी आया था। हालांकि, ईपीएस ने इस शर्त पर अड़ियल रुख अपनाया कि यदि अन्नाद्रमुक से कोई मुख्यमंत्री बनेगा तो वह केवल वही होंगे अन्यथा वे विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। इसी असहमति के बाद बागियों ने विजय को समर्थन देने का फैसला किया।
विजय के सामने चुनौतियां और विचारधारा का संकट
विजय के लिए यह जीत जितनी बड़ी है, चुनौतियां भी उतनी ही जटिल हैं। कांग्रेस नेताओं ने उन्हें याद दिलाया है कि उनकी सरकार को धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखनी होगी। अब संकट यह है कि भाजपा और पीएमके जैसे एनडीए सहयोगियों ने वोटिंग के दौरान तटस्थ रहकर एक तरह से विजय की मदद ही की है। विजय हमेशा भाजपा को अपना वैचारिक दुश्मन बताते आए हैं, ऐसे में एनडीए समर्थित बागियों को सरकार में शामिल करना उनके लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल होगा। इसके अलावा, बागी नेताओं में से कुछ पर भ्रष्टाचार के मामले और सीबीआई जांच चल रही है। चूंकि विजय ने 'साफ-सुथरी राजनीति' का वादा किया है। इसलिए दागी नेताओं को कैबिनेट में जगह देना उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या तमिलनाडु में फिर से होंगे चुनाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि अन्नाद्रमुक का यह संकट अब अदालती लड़ाई की ओर बढ़ेगा, जैसा महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन (उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे) के दौरान हुआ था। वहां भी असली पार्टी और चुनाव चिह्न को लेकर लंबी जंग चली थी। तमिलनाडु की राजनीति में यह पहली बार है, जब जनादेश इतना खंडित मिला है। टीवीके के भीतर इस बात पर चर्चा चल रही है कि क्या विधानसभा भंग करके नए सिरे से चुनाव में जाना बेहतर होगा ताकि एक स्थिर बहुमत वाली सरकार बनाई जा सके। हालांकि, अधिकांश विधायक और द्रमुक अभी चुनाव के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। फिलहाल, तमिलनाडु की राजनीति एक ऐसे दौर में है जहां अस्थिरता लंबे समय तक बनी रह सकती है।

