EPS बनाम बागी विधायक, विजय के फ्लोर टेस्ट ने बढ़ाई AIADMK की मुश्किलें
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EPS बनाम बागी विधायक, विजय के फ्लोर टेस्ट ने बढ़ाई AIADMK की मुश्किलें

तमिलनाडु में विजय सरकार ने विश्वास मत जीत लिया, लेकिन एआईएडीएमके के भीतर खुली बगावत ने पार्टी को दो गुटों में बांट दिया है।


दिन भले ही विजय का था, लेकिन सबसे ज्यादा सुर्खियां एआईएडीएमके नेता एडप्पडी के. पलानीस्वामी (EPS) ने बटोरीं। तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की सरकार ने तमिलनाडु विधानसभा में आखिरकार विश्वास मत हासिल कर लिया, लेकिन इस जीत ने एआईएडीएमके के भीतर गहरे संकट को खुलकर सामने ला दिया।

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली दो साल पुरानी पार्टी को सरकार बनाने के लिए एक हफ्ते तक सहयोगियों और विधायकों की संख्या जुटाने में संघर्ष करना पड़ा। लेकिन मंगलवार (13 मई) को सरकार ने विश्वास प्रस्ताव 144 वोटों के समर्थन से जीत लिया। 22 वोट विरोध में पड़े, जबकि पांच सदस्य अनुपस्थित रहे।

समर्थन में पड़े 144 वोटों में से 120 वोट TVK और उसके सहयोगी दलों — कांग्रेस, CPI, CPI(M), VCK और IUML — के थे। बाकी 24 वोट एआईएडीएमके के बागी विधायकों ने दिए। यही वह घटनाक्रम था जिसने पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही खींचतान को खुलकर सामने ला दिया।

एआईएडीएमके में खुलकर दिखी फूट

जहां ईपीएस और उनके समर्थक 21 विधायकों ने विश्वास मत के खिलाफ वोट दिया, वहीं 24 बागी विधायक TVK सरकार के समर्थन में चले गए।

अब विधानसभा में एआईएडीएमके दो साफ गुटों में बंटी नजर आ रही है। एक गुट वरिष्ठ नेताओं सीवी शन्मुगम और एसपी वेलुमणि के साथ है, जबकि दूसरा ईपीएस के नेतृत्व में बना हुआ है।

हालांकि दोनों गुट संगठनात्मक स्तर पर अब भी ईपीएस को पार्टी का महासचिव मानते हैं, लेकिन असली विवाद पार्टी की राजनीतिक दिशा और खासकर डीएमके के साथ संभावित समझौते को लेकर है।

शन्मुगम ने लगाए गंभीर आरोप

सीवी शन्मुगम ने बागी विधायकों के फैसले का बचाव करते हुए ईपीएस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, “यह कहना गलत है कि हमने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया। विधानसभा दल अपना नेता और व्हिप खुद चुनता है। महासचिव अकेले किसी को नियुक्त नहीं कर सकता।” यह भी सवाल उठाया कि क्या ईपीएस ने वास्तव में विधायक दल की बैठक बुलाई थी। शन्मुगम ने उनसे बैठक की कार्यवाही और प्रस्ताव सार्वजनिक करने की चुनौती दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले हफ्ते ईपीएस ने पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में ठहरे बागी विधायकों से मुलाकात की थी और उन्हें मंत्री पद का ऑफर दिया था।

“डीएमके के समर्थन से मुख्यमंत्री बनना चाहते थे ईपीएस”

शन्मुगम का दावा है कि ईपीएस ने कहा था कि उन्होंने “ऊपरी स्तर” पर बातचीत कर ली है और डीएमके तथा संभवतः बीजेपी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई जा सकती है।उन्होंने कहा, “ईपीएस ने कहा कि वे मुख्यमंत्री बनेंगे और डीएमके बाहर से समर्थन देगी। लेकिन हमने इसका विरोध किया, क्योंकि एआईएडीएमके की स्थापना ही डीएमके का मुकाबला करने के लिए हुई थी।”

वेलुमणि को विधायक दल का नेता चुना

बागी गुट का कहना है कि 8 मई को उन्होंने अलग बैठक कर एसपी वेलुमणि को एआईएडीएमके विधायक दल का नेता चुन लिया था।उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र देकर दावा किया है कि बहुमत उनके पास है और उनके पदाधिकारियों को मान्यता दी जानी चाहिए।वेलुमणि ने कहा कि पार्टी लगातार चुनाव हार रही है और अब आत्ममंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हम पार्टी तोड़ना नहीं चाहते। लेकिन लगातार हार की वजहों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।”

पुराने नेताओं की वापसी की मांग

वेलुमणि ने फिर दोहराया कि पार्टी को मजबूत करने के लिए निष्कासित नेताओं — ओ. पन्नीरसेल्वम (OPS), वीके शशिकला, टीटीवी दिनाकरन और केए सेंगोट्टैयन — को वापस लाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ईपीएस लगातार इस तरह के मेल-मिलाप के प्रयासों को खारिज करते रहे हैं।

थिरुमावलवन को CM बनाने का भी सुझाव

बागी विधायकों ने दावा किया कि उन्होंने एक वैकल्पिक फार्मूला भी सुझाया था, जिसमें वीसीके नेता थोल थिरुमावलवन को सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरा बनाया जा सकता था और एआईएडीएमके को सरकार में अच्छी हिस्सेदारी मिल सकती थी।लेकिन उनके मुताबिक ईपीएस ने इसे भी ठुकरा दिया और कहा कि या तो वे खुद मुख्यमंत्री बनेंगे या विपक्ष में बैठेंगे।

'TVK को समर्थन सिर्फ DMK को रोकने के लिए'

बागी गुट का कहना है कि उन्होंने मंत्री पद पाने के लिए नहीं, बल्कि डीएमके को रोकने के साझा मकसद से TVK सरकार को समर्थन दिया।वहीं ईपीएस ने पहले कहा था कि पार्टी का 47 सीटें जीतना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन बागी गुट ने इसे “हकीकत से आंख मूंदना” बताया। उनका कहना है कि जयललिता हार की जिम्मेदारी स्वीकार करती थीं, लेकिन ईपीएस ने कभी ऐसा नहीं किया — चाहे 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव हों या 2021 और 2026 के विधानसभा चुनाव।

जयललिता के बाद सबसे बड़ा संकट

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके में यह सबसे बड़ा सार्वजनिक संकट है।इससे पहले ईपीएस और ओपीएस के बीच नेतृत्व को लेकर लंबी लड़ाई चली थी, लेकिन इस बार मामला सिर्फ नेतृत्व नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य और राजनीतिक दिशा से जुड़ा दिखाई दे रहा है।

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