फ्लोर टेस्ट के बाद AIADMK में टूट के संकेत, कानूनी लड़ाई तय
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फ्लोर टेस्ट के बाद AIADMK में टूट के संकेत, कानूनी लड़ाई तय

तमिलनाडु में विजय सरकार ने फ्लोर टेस्ट जीत लिया, लेकिन AIADMK में बगावत खुलकर सामने आ गई। अब पार्टी में टूट और कानूनी लड़ाई के आसार बढ़ गए हैं।


तमिलनाडु विधानसभा में 13 मई को विजय सरकार ने विश्वास मत जीतकर अपनी सरकार बचा ली, लेकिन इस फ्लोर टेस्ट ने राज्य की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए। विजय के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार को विश्वास प्रस्ताव पर 144 वोट मिले। हालांकि सरकार बच गई, लेकिन सबसे बड़ा झटका AIADMK के भीतर खुलकर सामने आई बगावत के रूप में दिखा।

दरअसल, AIADMK के 47 विधायकों में से करीब 24 विधायकों ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर विजय सरकार के समर्थन में वोट दिया। इससे पार्टी के भीतर गहरी फूट उजागर हो गई। पार्टी प्रमुख और विधानसभा में नेता विपक्ष एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) ने सरकार के खिलाफ वोट दिया, लेकिन उनके ही कई विधायक अलग रास्ते पर चले गए।

‘द फेडरल’ के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने कहा कि AIADMK में अब “वर्टिकल स्प्लिट” यानी सीधी और खुली टूट दिखाई दे रही है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि अभी इसे पूरी तरह संगठनात्मक विभाजन नहीं माना जा सकता, क्योंकि पार्टी संगठन और विधायी दल दोनों पर औपचारिक नियंत्रण अभी भी EPS के पास है। पार्टी में किसी आधिकारिक टूट के लिए दो-तिहाई कार्यकारिणी सदस्यों का समर्थन भी जरूरी होता है, जो फिलहाल नहीं दिख रहा।

इस पूरे घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की शिवसेना टूट की याद भी ताजा कर दी है। कानूनी मामलों के जानकार वी. वेंकटेशन ने कहा कि अब तमिलनाडु में भी वही सवाल उठेंगे कि असली अधिकार किसके पास है — संगठन के पास या विधायी दल के पास। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि विधायक दल और राजनीतिक दल अलग-अलग इकाइयां हैं और पार्टी व्हिप नियुक्त करने का अधिकार राजनीतिक दल को होता है, न कि विधायक दल को।

वेंकटेशन ने यह भी बताया कि 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान हुए 91वें संविधान संशोधन के बाद दल-बदल कानून में “स्प्लिट” यानी एक-तिहाई विधायकों के अलग होने की छूट खत्म कर दी गई थी। अब केवल दो-तिहाई विधायकों के विलय को ही मान्यता मिल सकती है। तमिलनाडु के मामले में स्थिति और जटिल है क्योंकि बागी विधायक किसी दूसरी पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुए हैं।

उन्होंने कहा कि फिलहाल विजय सरकार का विश्वास मत वैध माना जाएगा और सरकार पर कोई तत्काल खतरा नहीं है। लेकिन आने वाले दिनों में यह लड़ाई विधानसभा अध्यक्ष, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग तक पहुंच सकती है।

एस. श्रीनिवासन का मानना है कि अब असली लड़ाई AIADMK के चुनाव चिन्ह और पार्टी पर नियंत्रण को लेकर होगी। बागी गुट और EPS दोनों ही खुद को असली AIADMK साबित करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में चुनाव आयोग के सामने भी बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है।

विजय सरकार के लिए भी यह समर्थन राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है। चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने बीजेपी को अपना वैचारिक विरोधी बताया था, लेकिन अब उनकी सरकार को समर्थन देने वाले कुछ विधायक NDA खेमे से जुड़े माने जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर DMK अब विजय सरकार पर हमला तेज करने की तैयारी में है।

फिलहाल विजय सरकार ने पहला इम्तिहान पास कर लिया है, लेकिन इस फ्लोर टेस्ट ने AIADMK के भीतर सबसे बड़े संकट की शुरुआत कर दी है। आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति विधानसभा से लेकर अदालत और चुनाव आयोग तक गर्म रहने वाली है।

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