
तमिलनाडु में विजय युग की शुरुआत? बदली द्रविड़ राजनीति की दिशा
तमिलनाडु में विजय और TVK की जीत को द्रविड़ राजनीति के अंत नहीं, बल्कि उसके नए रूप और नेतृत्व परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है।
तमिलनाडु की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। अभिनेता से नेता बने सी जोसेफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज कराया है। उनकी पार्टी टीवीके (तमिलगा वेत्री कड़गम) की शानदार चुनावी जीत ने सभी को चौंका दिया। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह द्रविड़ राजनीति का अंत नहीं, बल्कि उसका नया रूप है।
राजनीतिक समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने “करिश्माई नेतृत्व” को उस दौर के रूप में परिभाषित किया था, जब लोग संस्थाओं पर भरोसा खोकर किसी ऐसे नेता में उम्मीद देखने लगते हैं जो व्यवस्था से बड़ा दिखाई देता है। तमिलनाडु में विजय का उदय कुछ ऐसा ही माना जा रहा है।
द्रविड़ राजनीति का नया अध्याय?
विजय की रैलियों में भारी भीड़, भावनात्मक भाषण और सिनेमाई अंदाज ने लोगों को सीएन अन्नादुरै, एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और जयललिता जैसे द्रविड़ नेताओं की याद दिलाई। अब सवाल उठ रहा है कि क्या तमिलनाडु एक बार फिर द्रविड़ राजनीति के नए संस्करण को देख रहा है?
इस बदलाव को समझने के लिए 19वीं सदी के अंत के तमिल समाज को देखना जरूरी है। उस समय जातिगत असमानता गहरी थी और प्रशासनिक पदों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व था। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1886 में मद्रास प्रेसीडेंसी की आबादी में केवल 3 प्रतिशत ब्राह्मण थे, लेकिन सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी 42 प्रतिशत थी। उच्च प्रशासनिक और न्यायिक पदों में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
यहीं से द्रविड़ आंदोलन की नींव पड़ी। शुरुआत में यह सामाजिक सुधार आंदोलन था, जो बाद में तमिलनाडु की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गया। पी सुंदरम पिल्लई, वी कनकसभाई और मराइमलाई अडिगल जैसे गैर-ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने तमिल भाषा और पहचान को मजबूत किया। हालांकि आलोचकों का कहना था कि शुरुआती आंदोलन में दलितों, मजदूरों और महिलाओं के मुद्दों को पर्याप्त जगह नहीं मिली।
पेरियार ने बदली राजनीति की दिशा
ईवी रामासामी “पेरियार” के आने के बाद आंदोलन ने नया रूप लिया। पेरियार ने जातिवाद, पितृसत्ता और धार्मिक रूढ़िवाद को खुलकर चुनौती दी। उनका मानना था कि जाति व्यवस्था तमिल परंपरा का हिस्सा नहीं है और महिलाओं का दमन सामाजिक ढांचे की देन है।पेरियार के वैचारिक उत्तराधिकारी सीएन अन्नादुरै ने इन विचारों को राजनीतिक ताकत में बदला और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की स्थापना की। 1967 में DMK ने कांग्रेस को सत्ता से हटाकर तमिलनाडु में नया राजनीतिक इतिहास रच दिया। इस जीत को सामाजिक क्रांति माना गया, क्योंकि पहली बार मजदूर, किसान और आम लोग सत्ता के केंद्र तक पहुंचे।
कल्याणकारी मॉडल बना पहचान
इसके बाद DMK और AIADMK ने अलग-अलग सरकारें चलाईं, लेकिन दोनों की राजनीति का आधार द्रविड़ विचारधारा ही रही। सामाजिक न्याय, आरक्षण, तमिल पहचान और कल्याणकारी योजनाएं तमिलनाडु की राजनीति की मुख्य धुरी बन गईं।इन नीतियों ने राज्य में पिछड़े वर्गों का मजबूत मध्यम वर्ग तैयार किया और उद्योगों को भी गति दी। चेन्नई का ऑटोमोबाइल उद्योग, तिरुप्पुर का टेक्सटाइल सेक्टर और अंबूर का लेदर उद्योग इसी मॉडल की सफलता माने जाते हैं। 2024-25 तक तमिलनाडु देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते राज्यों में शामिल हो गया।लेकिन 2016 में जयललिता और 2018 में करुणानिधि के निधन के बाद राज्य में नेतृत्व का बड़ा खालीपन पैदा हो गया।
विजय फैक्टर और नई राजनीति
जब विजय ने टीवीके बनाकर बिना किसी गठबंधन के सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तब कई विश्लेषकों ने इसे अभिनेता-आधारित राजनीति का एक और असफल प्रयोग बताया। विजयकांत और कमल हासन के उदाहरण दिए गए, जो तमिलनाडु की दो-दलीय राजनीति को नहीं तोड़ पाए थे।विश्लेषकों का कहना था कि “फैन फॉलोइंग वोट में नहीं बदलती” और “सिनेमा राजनीति नहीं है।” लेकिन चुनाव परिणामों ने इन धारणाओं को गलत साबित कर दिया।
विजय ने खुद को द्रविड़ राजनीति के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि उसके नए वारिस के रूप में पेश किया। उनकी पहली बड़ी रैली में पेरियार, बीआर आंबेडकर, के कामराज, वेलु नचियार और अंजलाई अम्माल की तस्वीरें लगाई गईं। इससे साफ संदेश गया कि टीवीके भी सामाजिक न्याय, तर्कवाद और कल्याणकारी राजनीति की उसी परंपरा को आगे बढ़ाना चाहती है।
द्रविड़ राजनीति खत्म नहीं, बदल रही है
टीवीके के घोषणा पत्र में महिलाओं के लिए मासिक आर्थिक सहायता, मुफ्त बस यात्रा, सब्सिडी वाली योजनाएं और सामाजिक न्याय जैसे वादे शामिल थे। यह वही मॉडल है जिसे अन्नादुरै, करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता ने अलग-अलग दौर में मजबूत किया था।फर्क सिर्फ इतना है कि अब तमिलनाडु की राजनीति में “गेटकीपिंग” टूटती दिख रही है। पहले राजनीतिक वैधता DMK या AIADMK के जरिए ही मिलती थी। जो भी नई ताकत उभरी, वह या तो खत्म हो गई या किसी बड़े दल की सहयोगी बन गई। विजय फिलहाल इस व्यवस्था को चुनौती देने में सफल दिख रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि विजय का उदय उन युवाओं और मतदाताओं की नाराजगी को दर्शाता है जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से दूरी महसूस कर रहे थे, लेकिन सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राजनीति के मूल विचारों से अब भी जुड़े हुए हैं।द्रविड़ विचारधारा खत्म नहीं हो रही, बल्कि नए नेताओं के जरिए खुद को नए रूप में ढाल रही है। पेरियार ने इसे सामाजिक आंदोलन बनाया, अन्नादुरै ने राजनीतिक ताकत में बदला, एमजीआर ने इसे सिनेमा के जरिए गांव-गांव पहुंचाया, जयललिता ने इसे शासन की पहचान बनाया और अब विजय उसी विरासत को नए तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

