सत्ता बदली विचारधारा नहीं, तमिलनाडु में कैसे कायम है द्रविड़ राजनीति?
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सत्ता बदली विचारधारा नहीं, तमिलनाडु में कैसे कायम है द्रविड़ राजनीति?

तमिलनाडु में विजय की TVK सरकार बनने के बाद द्रविड़ राजनीति पर नई बहस शुरू हो गई है। नई पार्टी के बावजूद उनकी राजनीति में पुरानी द्रविड़ सोच साफ दिखती है।


जब अभिनेता विजय की पार्टी TVK ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में पहली ही बार में 108 सीटें जीतकर छह दशक पुराने द्रविड़ राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ दिया, तब दक्षिणपंथी राजनीति के एक हिस्से में उत्साह साफ दिखाई दिया। 1967 में सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके की सत्ता में आने के बाद यह पहली बार हुआ कि राज्य में ऐसी पार्टी सरकार बना रही है जिसके नाम में “द्रविड़” शब्द नहीं है।

विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान डीएमके को “थीया शक्ति” यानी अंधेरी ताकत बताया और जनता ने उन्हें सत्ता तक पहुंचा दिया। लेकिन सिर्फ इसलिए उन्हें “एंटी-द्रविड़” मान लेना जल्दबाजी होगी।

नई शक्ल, लेकिन राजनीति वही

अगर विजय की राजनीति को समझना है तो उनके चुनावी वादों को देखना जरूरी है। यहीं पर एमजीआर और जयललिता की राजनीति की झलक सबसे साफ नजर आती है।एमजीआर की राजनीति का मूल विचार था — गरीबों की सुरक्षा करने वाला राज्य। जयललिता ने इसे और आगे बढ़ाया। गरीब परिवारों की बेटियों को शादी के लिए सोना, मिक्सर-ग्राइंडर, लैपटॉप और अम्मा कैंटीन जैसी योजनाएं उसी सोच का हिस्सा थीं।

विजय का घोषणापत्र

परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2500 रुपये

साल में छह मुफ्त LPG सिलेंडर

मुफ्त बिजली

गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह के लिए 8 ग्राम सोना और रेशमी साड़ी

हर नवजात को सोने की अंगूठी

कामराज के नाम पर 100 रेजिडेंशियल स्कूल

यह कोई नई राजनीति नहीं है। यही पुरानी द्रविड़ राजनीति है, बस चेहरा नया है, भाषा नई है, लेकिन सिस्टम वही है जिसे करुणानिधि, जयललिता और स्टालिन जैसे नेताओं ने मजबूत किया। TVK को 108 सीटें मिलीं, लेकिन बहुमत से वह कुछ दूर रह गई। ऐसे में कांग्रेस, वीसीके, CPI, CPI(M) और IUML जैसी पार्टियों ने उसका समर्थन किया। AIADMK का एक बड़ा वर्ग भी अब समर्थन देने को तैयार दिख रहा है। यह समर्थन विजय की राजनीति के बावजूद नहीं, बल्कि उसी वजह से मिल रहा है।

शपथ ग्रहण के बाद विजय ने साफ कहा कि उनकी सरकार “धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी” होगी। उनके छोटे से भाषण में यही दो शब्द सबसे ज्यादा राजनीतिक महत्व रखते थे और अगर द्रविड़ राजनीति के मूल तत्व देखें — सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और महिला सशक्तिकरण — तो ये सभी बातें TVK के एजेंडे में साफ दिखाई देती हैं।

दक्षिणपंथी क्यों खुश हैं?

दक्षिणपंथी खेमे की खुशी का बड़ा कारण शायद यह है कि विजय ने अपने भाषणों में खुलकर ब्राह्मण विरोधी राजनीति नहीं की। मायलापुर के पी. वेंकटरमणन की नियुक्ति को भी इसी नजर से देखा गया।लेकिन यह भूलना आसान नहीं होना चाहिए कि द्रविड़ राजनीति की जमीन पर खड़ी AIADMK की नेता जयललिता खुद ब्राह्मण थीं। यानी “गैर-पारंपरिक” द्रविड़ नेता तमिल राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। विजय ने अपनी पार्टी के नाम में “द्रविड़” शब्द जरूर नहीं रखा, लेकिन उनकी राजनीति में द्रविड़ विचारधारा साफ मौजूद है।TVK के दस्तावेजों में पेरियार, अंबेडकर और कामराज का जिक्र है। विजय ने भाजपा को सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि “वैचारिक दुश्मन” कहा।

पेरियार थिडल की राजनीति

सितंबर 2024 में, चुनाव से पहले विजय पेरियार की 146वीं जयंती पर पेरियार थिडल पहुंचे। उन्होंने चप्पल उतारी, पेरियार की प्रतिमा पर माला चढ़ाई और तपती दोपहर में वहां खड़े होकर सम्मान जताया।दिलचस्प बात यह है कि पेरियार खुद ऐसे किसी सम्मान को विडंबना मानते। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 10 मई 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद विजय का पहला कदम प्रेस कॉन्फ्रेंस या सरकारी घोषणा नहीं था। वे सीधे फिर पेरियार थिडल पहुंचे।

इतिहास रचने के बाद भी उन्होंने अपनी पहली राजनीतिक तस्वीर एक ऐसे तर्कवादी नेता के सामने खड़े होकर बनवाई, जिसने जीवनभर धार्मिक कर्मकांडों का विरोध किया।यह सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति नहीं थी। यह तमिलनाडु की राजनीतिक भाषा को गहराई से समझने वाले नेता की चाल थी।

तर्कवाद भी यहां एक परंपरा

तमिलनाडु में पेरियार थिडल जाना किसी धर्म के खिलाफ खड़ा होना नहीं माना जाता। यहां यह “धर्मनिरपेक्ष द्रविड़ आस्था” का हिस्सा है। लगभग हर बड़ा मुख्यमंत्री किसी न किसी रूप में वहां जाकर सम्मान जताता रहा है।यही तमिल राजनीति की सबसे दिलचस्प विडंबना भी है। पेरियार ने मूर्ति पूजा का विरोध किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मूर्तियां तोड़ीं। भगवान को कल्पना बताया और धर्म को दमन का औजार कहा। लेकिन आज वही पेरियार तमिल राजनीति में लगभग पूजनीय प्रतीक बन चुके हैं।

तर्कवादी खुद एक तरह के 'आइकन' बने

तमिलनाडु की राजनीति विरोधाभासों के साथ चलती है। तमिलनाडु लंबे समय से अपने विरोधाभासों को साथ लेकर चलता आया है। यहां लोग एक साथ तर्कवादी भी हो सकते हैं और धार्मिक भी। जाति विरोधी राजनीति का समर्थन करते हुए मंदिर भी जा सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में वोट डालते हुए आशीर्वाद भी ले सकते हैं।विजय ने यह संतुलन नहीं बनाया। उन्होंने सिर्फ उस जगह को पहचाना, जो तमिल राजनीति में हमेशा से मौजूद थी।यही वजह है कि उन्हें सिर्फ “एंटी-द्रविड़” कह देना तमिलनाडु की राजनीति को बहुत सतही तरीके से समझना होगा।

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