बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा, मुर्शिदाबाद में बम धमाका,  BJP उम्मीदवार शुभेंदु सरकार को पीटा
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बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा, मुर्शिदाबाद में बम धमाका, BJP उम्मीदवार शुभेंदु सरकार को पीटा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में 152 सीटों पर भारी सुरक्षा के बीच 90% मतदान हुआ। हालांकि, चुनाव आयोग द्वारा 2 लाख केंद्रीय जवानों की तैनाती के बावजूद मुर्शिदाबाद और दक्षिण दिनाजपुरम में हमले की घटनाएं हुईं।


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए गुरुवार, 23 अप्रैल को 152 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ। चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा के ऐसे इंतजाम किए थे जिसे 'अभूतपूर्व' कहा जा रहा था, लेकिन धरातल पर नजारा बंगाल के पुराने चुनावी इतिहास जैसा ही रहा। मुर्शिदाबाद में बम धमाके, बीरभूम में पथराव और दक्षिण दिनाजपुर में उम्मीदवारों पर हमले, इन घटनाओं ने एक बार फिर बंगाल के चुनावी लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

धमाकों और झड़पों से दहल उठे जिले

मुर्शिदाबाद जिले के नौदा इलाके में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई जब मतदान के दौरान एक कच्चा बम (Crude Bomb) फट गया। इस धमाके में कई लोग घायल हो गए, जिससे मतदाताओं में दहशत फैल गई। वहीं, बीरभूम जिले के दुबराजपुर में ईवीएम (EVM) खराब होने की शिकायतों के बाद गुस्साए मतदाताओं ने सुरक्षा बलों पर पथराव कर दिया, जिसमें कम से कम तीन जवान घायल हो गए।

हिंसा केवल आम मतदाताओं तक सीमित नहीं रही। दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु सरकार को खेतों में दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। आसनसोल में भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल और बेलडांगा में आम जनता उन्नयन पार्टी के उम्मीदवार हुमायूं कबीर के वाहनों में तोड़फोड़ की गई।

धांधली और प्रॉक्सी वोटिंग के गंभीर आरोप

मुर्शिदाबाद के भरतपुर में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि उनके पोलिंग एजेंटों को बूथों के भीतर जाने ही नहीं दिया गया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दावा है कि एजेंटों की अनुपस्थिति में कई बूथ लावारिस छोड़ दिए गए, जिससे सत्ता पक्ष को मनमानी करने का मौका मिला। सिलीगुड़ी के कुछ इलाकों में तो मतदाता तब हैरान रह गए जब उन्हें पोलिंग बूथ पर बताया गया कि उनका वोट 'पहले ही डाला जा चुका है'।

बहरामपुर में भी ईवीएम की खराबी और एजेंटों को डराने-धमकाने की खबरें आईं। कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए कई बूथों पर पुनर्मतदान (Repolling) की मांग की है।

2 लाख जवान, 2000 कंपनियां: आखिर चूक कहां हुई?

चुनाव आयोग ने इस बार बंगाल चुनाव को एक 'सैन्य अभियान' की तरह संचालित करने की कोशिश की थी। पूरे राज्य में केंद्रीय सशस्त्र बलों की 2,000 से अधिक कंपनियां (लगभग 2 लाख जवान) तैनात की गई थीं। मुख्य सचिव और गृह सचिव सहित 400 से अधिक अधिकारियों का तबादला किया गया ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि यह सारी तैयारी केवल कागजों और रूट मार्च तक सीमित रह गई। राजनीतिक विश्लेषक अमल सरकार ने तीखी आलोचना करते हुए कहा, "चुनाव आयोग अपनी बातों पर खरा उतरने में विफल रहा। पूरा राज्य एक तरह से घेराबंदी (Siege) में था, पूरी मशीनरी आयोग के हाथ में थी, फिर भी वह हिंसा मुक्त मतदान सुनिश्चित नहीं कर सका।"

सीपीआई (एम) नेता सायंदीप मित्रा ने चुटकी लेते हुए कहा, "बादल जितना गरजा, उतना बरसा नहीं।" उनका इशारा सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी और उनकी निष्क्रियता की ओर था। जमीन पर देखा गया कि जहाँ हिंसा हो रही थी, वहाँ या तो सुरक्षा बल नदारद थे या मूकदर्शक बने हुए थे।

90% मतदान और विपरीत परिस्थितियां

इन तमाम अप्रिय घटनाओं और बूथ स्तर पर वर्चस्व की जंग के बावजूद, बंगाल की जनता में मतदान को लेकर भारी उत्साह देखा गया। ताजा रुझानों के अनुसार, पहले चरण में लगभग 90 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है। हालांकि, यह उत्साह दुखद खबरों के साथ भी आया; भीषण गर्मी और हीटस्ट्रोक के कारण कतारों में लगे चार मतदाताओं की मौत संदिग्ध कार्डियक अरेस्ट से हो गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी रैली में दावा किया कि बंगाल में पिछले 50 वर्षों में इससे अधिक शांतिपूर्ण चुनाव नहीं हुआ। लेकिन विपक्ष और जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं के लिए यह दावा सच्चाई से कोसों दूर नजर आता है। विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के कारण कई वास्तविक मतदाताओं का नाम कट जाना भी इस लोकतांत्रिक उत्सव के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ।

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