ईरान-यूएई बाजार में गिरावट, असम का चाय कारोबार दबाव में
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ईरान-यूएई बाजार में गिरावट, असम का चाय कारोबार दबाव में

पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज़ मार्ग बाधित होने से भारतीय चाय निर्यात प्रभावित है। असम और बंगाल के चाय कारोबार पर गंभीर असर पड़ा है।


भारत के चाय उद्योग ने 2025 में 280.40 मिलियन किलोग्राम चाय का रिकॉर्ड निर्यात कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की थी, लेकिन अब पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट के कारण यह क्षेत्र गंभीर दबाव में आ गया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में भारी बाधा और ईरान के खरीदारों के साथ संचार व्यवस्था प्रभावित होने से असम और पश्चिम बंगाल जैसे चाय उत्पादक क्षेत्रों में चिंता बढ़ गई है।

भू-राजनीतिक तनाव के कारण पिछले वर्ष मिली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त तेजी से खत्म होने का खतरा पैदा हो गया है। भारतीय निर्यातकों को अब माल भेजने में देरी, बढ़ती मालभाड़ा लागत और प्रीमियम बाजारों में मांग घटने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अनुमान है कि पूरे वर्ष के दौरान चाय निर्यात में कम से कम 20 प्रतिशत की गिरावट हो सकती है। जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में भारत ने पिछले वर्ष की तुलना में 21.01 मिलियन किलोग्राम कम चाय निर्यात की, जो साल-दर-साल 17 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है।

निर्यात में गिरावट

निर्यातकों का कहना है कि 2025 में बेहतर प्रदर्शन का मुख्य कारण भारतीय चाय, विशेषकर असम चाय की वैश्विक मांग में लगातार वृद्धि थी। हालांकि ईरान को निर्यात अभी भी जारी है, लेकिन व्यापारियों के अनुसार इसकी मात्रा में भारी कमी आई है। ईरान के लिए भेजी जाने वाली अधिकांश चाय अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के माध्यम से भेजी जा रही है।

2024 के जनवरी-दिसंबर आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल चाय निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा चार पश्चिम एशियाई देशों—यूएई, ईरान, सऊदी अरब और इराक—को भेजा गया था। नॉर्थ ईस्टर्न टी एसोसिएशन (NETA) के सलाहकार बिद्यानंद बरकाकोटी ने कहा कि ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारतीय चाय उद्योग के लिए पश्चिम एशिया कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता सीधे भारतीय चाय निर्यात को प्रभावित कर सकती है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे समुद्री मार्गों की स्थिरता निर्यातकों के लिए बेहद आवश्यक है।

केप ऑफ गुड होप मार्ग से बढ़ी मुश्किलें

असम का ऑर्थोडॉक्स चाय उद्योग अभी भी ईरान, इराक, यूएई और सऊदी अरब के खरीदारों पर काफी हद तक निर्भर है। इन देशों को भेजी जाने वाली बड़ी मात्रा में चाय दुबई के माध्यम से जाती है, जो व्यापार और पुनः-निर्यात का प्रमुख केंद्र है।लेकिन खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास की बाधाओं ने माल ढुलाई को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। कई शिपिंग कंपनियां अब इस मार्ग से बच रही हैं और जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेज रही हैं, जिससे 10 से 20 दिनों तक की अतिरिक्त देरी हो रही है। निर्यातकों के अनुसार पिछले कुछ सप्ताहों में मालभाड़ा शुल्क में भारी वृद्धि हुई है। संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से गुजरने वाले माल पर बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया है, जिससे निर्यात लागत और बढ़ गई है।

गुवाहाटी और कोलकाता के चाय व्यापारियों का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका के कारण खरीदार अब अधिक सतर्क हो गए हैं। खाड़ी देशों के लिए भेजे जाने वाले कंटेनरों में बंदरगाहों पर देरी और भीड़ बढ़ रही है। इसके साथ ही प्रतिबंधों और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण भुगतान को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ गई है।

कमजोर पड़ती मांग

गुवाहाटी टी ऑक्शन बायर्स एसोसिएशन (GTABA) के सचिव दिनेश बिहानी ने कहा कि भारतीय निर्यातक इस समय कई तरह के दबावों से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रमुख शिपिंग मार्गों में व्यवधान और बढ़ती मालभाड़ा व बीमा लागत ने भारतीय चाय निर्यातकों के सामने गंभीर लॉजिस्टिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इससे ईरान, इराक और यूएई जैसे बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर हो रही है।

बिहानी ने आगे कहा कि पश्चिम एशियाई देशों में आर्थिक अनिश्चितता के कारण मांग भी कमजोर पड़ गई है, खासकर थोक और मध्यम श्रेणी की चाय के बाजार में। ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में खपत के पैटर्न पर पड़ रहा है। व्यावसायिक मांग पर विशेष दबाव देखा जा रहा है।

उद्योग सूत्रों के अनुसार, विदेशी खरीदारों द्वारा खरीदारी धीमी करने के कारण नीलामी केंद्रों पर बिना बिके स्टॉक का दबाव बढ़ने लगा है। हालांकि घरेलू स्तर पर परिवारों में चाय की खपत अभी स्थिर बनी हुई है, लेकिन रेस्तरां, सड़क किनारे चाय की दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में मांग बढ़ती परिचालन लागत के कारण प्रभावित हो रही है।

असम की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर

2025 में पश्चिम एशियाई देशों ने भारत से कुल 122.49 मिलियन किलोग्राम चाय आयात की थी, जो देश के कुल चाय निर्यात का लगभग आधा हिस्सा था। सीटीसी (क्रश, टियर, कर्ल) चाय की तुलना में ऑर्थोडॉक्स चाय विदेशी बाजारों पर कहीं अधिक निर्भर रहती है और उसका घरेलू बाजार सीमित है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो इसका सीधा असर नीलामी कीमतों और निर्यात मात्रा पर पड़ेगा।

यह चिंता विशेष रूप से असम की चाय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर है, क्योंकि इस उद्योग पर लाखों श्रमिकों और हजारों छोटे चाय उत्पादकों की आजीविका निर्भर करती है। 2026 का चाय तोड़ाई सीजन पहले ही शुरू हो चुका है और निर्यातकों को डर है कि यदि संकट लंबा चला, तो पिछले वर्ष बनी सकारात्मक गति पूरी तरह थम सकती है।

इसके साथ ही कुछ चुनिंदा देशों पर अत्यधिक निर्भरता की कमजोरियां भी अब सामने आने लगी हैं। 6 फरवरी को संसद में टीएमसी सांसद सुष्मिता देव के प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने स्वीकार किया कि ईरान को भारत का चाय निर्यात पहले से ही गिरावट की ओर था। यह 2020 में 36 मिलियन किलोग्राम से घटकर 2025 में (नवंबर तक) 13.38 मिलियन किलोग्राम रह गया। वर्तमान शिपिंग संकट ने इस व्यापार को और अधिक प्रभावित करने का खतरा पैदा कर दिया है।

निर्यात विविधीकरण की मांग तेज

NETA के सलाहकार बरकाकोटी ने कहा कि इस संकट का असर अब जमीनी स्तर पर भी स्पष्ट दिखने लगा है। उन्होंने कहा कि शिपमेंट में देरी के कारण पश्चिम एशिया को चाय निर्यात पर बड़ा असर पड़ सकता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर चिंताओं के चलते मध्य पूर्व को निर्यात काफी धीमा पड़ गया है और कई मामलों में माल 40 दिनों से अधिक की देरी से पहुंच रहा है।

स्थिति को देखते हुए टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया सहित कई उद्योग संगठनों ने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। हितधारक सरकार से ऑर्थोडॉक्स चाय उत्पादन के लिए मिलने वाली प्रोत्साहन योजनाओं को जारी रखने की मांग भी कर रहे हैं, विशेष रूप से असम में, जहां प्रीमियम चाय विदेशी बाजारों की अस्थिरता पर अत्यधिक निर्भर है।

हालांकि निर्यातकों को चीन, रूस और अमेरिका जैसे देशों में भविष्य की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन उनका कहना है कि दशकों से स्थापित खाड़ी देशों के बाजारों की भरपाई करना आसान नहीं होगा, क्योंकि चाय व्यापार नेटवर्क और उपभोक्ताओं की पसंद लंबे समय में विकसित हुई है।

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