
बंगाल में लंबा नहीं टिकेगा कट्टर हिंदुत्व, नहीं संभली BJP तो पछताएगी!
पूर्व आईएएस अधिकारी जौहर सरकार ने भाजपा की नीतियों पर बात करते हुए कहा कि बंगाल में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति उलटा असर डालेगी। इसके कारण भी बताए...
पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो-तिहाई बहुमत वाली जीत के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य में पहली बार भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में सुवेंदु अधिकारी ने शपथ ली है। ऐसे में अब सवाल सिर्फ शासन का नहीं, बल्कि बंगाल की सामाजिक संरचना, अल्पसंख्यक समुदायों और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान पर पड़ने वाले असर का भी है।
इसी मुद्दे पर ‘ऑफ द बीटन ट्रैक’ कार्यक्रम में द फेडरल ने पूर्व आईएएस अधिकारी, प्रसार भारती बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद जौहर सरकार से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति अंततः भाजपा के लिए ही नुकसानदायक साबित हो सकती है।
जब उनसे पूछा गया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो-तिहाई बहुमत वाली जीत कितनी महत्वपूर्ण है और इसका राज्य की राजनीति तथा सामाजिक माहौल पर क्या असर पड़ेगा तो जौहर सरकार ने कहा कि फिलहाल लगभग हर वर्ग में उत्साह का माहौल है। लेकिन वामपंथी और उदारवादी तबका इस परिणाम से स्तब्ध है।
उन्होंने कहा, “वामपंथी और उदारवादी हमेशा हर मुद्दे पर एकमत नहीं होते लेकिन इस नतीजे ने दोनों को झकझोर दिया है। वहीं अल्पसंख्यक समुदाय के बीच डर का माहौल है।”
जौहर सरकार के मुताबिक, यह जनादेश बंगाल की पारंपरिक राजनीतिक संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने कहा कि बंगाल की राजनीति हमेशा किसी न किसी रूप में वामपंथी झुकाव वाली रही है।
उन्होंने याद दिलाया कि पश्चिम बंगाल में 49 वर्षों तक वामपंथी विचारधारा का प्रभाव रहा। इसमें 34 वर्षों तक वाम मोर्चा सरकार का शासन और बाकी समय जनकल्याणकारी वामपंथी नीतियों का असर देखने को मिला।
उन्होंने कहा कि भाजपा एक दोहरी नीति पर काम करती है। एक तरफ उसकी गरीब तबकों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं हैं, जो कई मामलों में सफल भी रही हैं, वहीं दूसरी ओर उसका झुकाव बड़े पूंजीपतियों की ओर भी है।
जौहर सरकार ने कहा कि बंगाल के लोग इसे एक दिलचस्प राजनीतिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि राज्य में लंबे समय से कोई बड़ा उद्योग नहीं आया है। उन्होंने कहा कि हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स के बाद बंगाल में कोई बड़ी औद्योगिक परियोजना स्थापित नहीं हुई।
उन्होंने बताया कि हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स परियोजना भी वामपंथी सरकार ने भारी संघर्ष और दृढ़ता के साथ स्थापित कराई थी। उससे पहले दुर्गापुर स्टील प्लांट राज्य की सबसे बड़ी औद्योगिक परियोजना थी।
उनके मुताबिक, बंगाल की मूल औद्योगिक संरचना धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई या बंद हो गई। ऐसे में भाजपा की बड़े उद्योगपतियों से निकटता लोगों के बीच यह उम्मीद पैदा कर रही है कि शायद वह निवेशकों को बंगाल लाने में सफल हो सके।
उन्होंने कहा कि इसी उम्मीद के कारण भाजपा के पक्ष में लगभग 6 से 6.5 प्रतिशत वोटों का झुकाव हुआ और पार्टी 45 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर हासिल करने में सफल रही।
जौहर सरकार ने यह भी माना कि ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी भाजपा की जीत का बड़ा कारण रही। उन्होंने भ्रष्टाचार और “गुंडागर्दी” को जनता की नाराजगी का प्रमुख कारण बताया।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने पहले भी ममता बनर्जी को इस खतरे के बारे में आगाह किया था तो उन्होंने कहा, “यही कारण था कि मैंने अपनी राज्यसभा सदस्यता छोड़ दी थी। वह उनके लिए एक शुरुआती चेतावनी थी कि अपने संगठन को संभालिए, वरना बड़ी मुश्किल आने वाली है।”
उन्होंने कहा कि लगभग सभी राजनीतिक दलों में एक समस्या समान होती है। नेता के आसपास मौजूद करीबी लोग उसे वास्तविक स्थिति से दूर रखते हैं और केवल वही बातें बताते हैं जो वह सुनना चाहता है।
जौहर सरकार ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस में भी यही हुआ। क्योंकि यह पार्टी विचारधारा से अधिक व्यक्तित्व आधारित राजनीति करती है। उनके मुताबिक, ममता बनर्जी को लगातार यह भरोसा दिलाया जाता रहा कि सबकुछ ठीक चल रहा है, जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग थी।
जौहर सरकार ने आगे कहा, “मुझे याद है कि 2021 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी ने अचानक मुझसे सलाह लेना शुरू किया था। क्योंकि मैं पश्चिम बंगाल में दो लोकसभा चुनाव करा चुका मुख्य निर्वाचन अधिकारी रह चुका था। उन्होंने मुझसे एक निष्पक्ष व्यक्ति के रूप में राय मांगी थी।”
उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने ममता बनर्जी से साफ कहा था कि उनकी छवि बदलने की जरूरत है। जौहर सरकार के मुताबिक, “अगर आप इंटरनेट पर जाकर देखेंगे तो पाएंगे कि 2021 के चुनाव से करीब चार महीने पहले तक ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार चिल्ला रही थीं - ‘कट मनी वापस करो, कट मनी वापस करो।’”
उन्होंने कहा कि यह दरअसल इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रिश्वत ली थी। इसके बाद कई कार्यकर्ताओं ने पैसे लौटाने शुरू किए और सार्वजनिक तौर पर पछतावा भी जताया। हालांकि इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। क्योंकि पार्टी को पूरा भरोसा था कि वह आसानी से चुनाव जीत जाएगी।
जब उनसे पूछा गया कि बंगाल की जनता नई सरकार से आखिर क्या उम्मीद कर रही है तो जौहर सरकार ने कहा कि सबसे बड़ी उम्मीद उद्योग और रोजगार को लेकर है।
उन्होंने कहा, “सबसे पहली उम्मीद यह है कि राज्य में उद्योग आएंगे और रोजगार पैदा होगा।”
इसके बाद उन्होंने 1977 का एक पुराना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि उस समय वह सरकारी सेवा में केवल दो साल पुराने अधिकारी थे और इंदिरा गांधी की हार के बाद आपातकाल के बाद हुए चुनावों में बर्धमान के सहायक निर्वाचन अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे।
उन्होंने कहा, “वह 49 साल पहले की बात है। हमने आखिरी बार तब देखा था, जब राज्य सरकार और केंद्र सरकार एक साथ काम कर रहे थे। जून 1977 में वामपंथी सरकार सत्ता में आई और उसके बाद लगभग 50 वर्षों तक राज्य और केंद्र सरकारों के बीच लगातार टकराव बना रहा।”
उन्होंने कहा कि इस टकराव का सबसे ज्यादा असर आम जनता पर पड़ा।
जब उनसे पूछा गया कि क्या बंगाल के लोग केंद्र के विरोध में रहने को अपनी पहचान और गर्व का हिस्सा मानते थे तो उन्होंने कहा, “बिल्कुल। गैर-अनुरूपता यानी अलग सोच रखना बंगालियों की खास पहचान रही है।”
उन्होंने कहा कि केंद्र में चाहे कांग्रेस रही हो, जनता पार्टी या भाजपा, उनकी विचारधारा कभी भी बंगाल के बुद्धिजीवियों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार चलाना केवल नारों और राजनीतिक दिखावे का काम नहीं होता। बल्कि इसके लिए लगातार मेहनत और प्रशासनिक समन्वय की जरूरत होती है।
जौहर सरकार ने कहा कि राज्य और केंद्र के बीच संवाद कायम रखने में नौकरशाहों की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी बढ़ने पर यह काम बेहद कठिन हो गया था।
उन्होंने कहा, “लोग अपने आप इतने जिद्दी नहीं थे, उन्हें ऐसा बनाया गया। लेकिन हम जैसे अधिकारी बीच में फंसे रहते थे और बेहद कठिन परिस्थितियों में केंद्र और राज्य के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश करते थे।”
उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और प्रदीप भट्टाचार्य की सराहना करते हुए कहा कि दोनों इस स्थिति को समझते थे।
जौहर सरकार ने बताया कि वह उन चुनिंदा अधिकारियों में थे, जो राज्य और केंद्र सरकार दोनों में जिम्मेदारियां निभाते रहे। उन्होंने कहा कि कई बार राज्य का नौकरशाही तंत्र उन्हें दिल्ली भेजने का विरोध करता था। लेकिन मुख्यमंत्री खुद हस्तक्षेप कर कहते थे, “उन्हें जाने दीजिए, दिल्ली में वह हमारे लिए उपयोगी साबित होंगे।”
उन्होंने कहा कि इस तरह वह केंद्र तक बंगाल की आवाज पहुंचाते थे। उनके मुताबिक, वामपंथी सरकार का इस मुद्दे पर दृष्टिकोण कहीं अधिक व्यावहारिक था। हालांकि कट्टर वामपंथी लोग उन्हें कई बार “केंद्र का एजेंट” भी कहते थे।
जौहर सरकार ने दावा किया कि ममता बनर्जी के शासनकाल में नौकरशाहों के लिए काम करना बेहद कठिन हो गया था।
उन्होंने कहा, “मेरे जूनियर सहयोगियों से जो सुनने को मिला, उसके मुताबिक ममता बनर्जी के दौर में नौकरशाही बेहद परेशान रही। क्योंकि वह हर मुद्दे को व्यक्तिगत रूप से लेती थीं।”
उन्होंने कहा कि सामान्यतः नौकरशाही का काम तटस्थ तरीके से प्रशासन चलाना होता है। लेकिन ममता बनर्जी इसे स्वीकार नहीं करती थीं। यदि कोई सचिव केंद्र के साथ किसी मुद्दे पर समन्वय बनाने की कोशिश करता, तो उस पर समझौता करने का आरोप लग जाता।
जब उनसे पूछा गया कि अब लगभग 49 वर्षों बाद राज्य और केंद्र में एक ही दल की सरकार बनने से क्या व्यावहारिक बदलाव आएंगे तो उन्होंने कहा कि लोगों के बीच काफी उम्मीदें हैं कि अब कामकाज तेज होगा।
उन्होंने कहा कि अब राज्य सरकार अपने अधिकारियों से उम्मीद करेगी कि वे सीधे संबंधित केंद्रीय मंत्री से मिलकर लंबित मामलों को जल्दी निपटाएं।
उनके मुताबिक, “छोटी-छोटी प्रशासनिक अड़चनें अब जल्दी दूर होनी चाहिए। जो अनुदान रोके जा रहे थे या जिनमें देरी हो रही थी, वे अब जारी होने लगेंगे।”
जौहर सरकार ने कहा कि एक नौकरशाह के रूप में वह अच्छी तरह समझते हैं कि वास्तविक आपत्ति और जानबूझकर फाइल रोकने में क्या अंतर होता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बाकी राज्यों को उनका हिस्सा मिल जाता था, जबकि बंगाल के मामलों को जानबूझकर लंबित रखा जाता था।
उन्होंने कहा, “अगर आप सचिव से मिलते तो वह कहते ‘हां, हम देख रहे हैं’, लेकिन महीनों तक हमारे पत्रों का जवाब तक नहीं दिया जाता था। दोनों पक्षों की जिद के कारण यह स्थिति बनी हुई थी। अब यह खत्म होनी चाहिए।”
उन्होंने फिर उद्योगों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि प्रशासनिक रुकावटें हटने से सामान्य शासन व्यवस्था आसान हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
जौहर सरकार ने कहा कि केवल “डबल इंजन सरकार” होने भर से उद्योग नहीं आते। उद्योगों के लिए कार्य संस्कृति, आधारभूत ढांचा और कारोबार करने में आसानी जैसे कई अन्य कारक भी जरूरी होते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे विपक्ष शासित राज्यों ने भी जबरदस्त आर्थिक प्रगति की है।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु लंबे समय तक विपक्षी दलों की सरकार होने के बावजूद देश के सबसे औद्योगिक राज्यों में शामिल रहा, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे “डबल इंजन” वाले कई राज्य अब भी पिछड़े माने जाते हैं।
उनके मुताबिक, बंगाल के मतदाता पूरी तरह यह नहीं समझ पाए कि “डबल इंजन” का मतलब अपने आप विकास नहीं होता।
जब जौहर सरकार से पूछा गया कि हिंदुत्व की राजनीति के अधिक कट्टर होने का पश्चिम बंगाल के सामाजिक ताने-बाने पर क्या असर पड़ेगा, खासकर तब जब राज्य में मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है तो उन्होंने कहा कि इसका असर बेहद गंभीर हो सकता है।
उन्होंने कहा, “बंगाल की 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और बंगाली मुसलमानों को आप उनके पहनावे, भाषा या संस्कृति से बंगाली हिंदुओं से अलग नहीं पहचान सकते। भाजपा की राजनीति का एक हिस्सा लगातार उन्हें बांग्लादेशी बताने की कोशिश करता रहा है।”
जौहर सरकार ने कहा कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में कई पीढ़ियों से रहने वाले मुस्लिम इस तरह के दावों को अपमानजनक मानते हैं। उनके मुताबिक, वे खुद को “खानदानी मुसलमान” कहते हैं। यानी ऐसे लोग जिनकी जड़ें पीढ़ियों से बंगाल में रही हैं।
उन्होंने कहा कि भाजपा ने सुवेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया है, जबकि उनके अनुसार समिक भट्टाचार्य अपेक्षाकृत अधिक संतुलित विकल्प हो सकते थे।
जौहर सरकार ने आरोप लगाया कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसे नेता को चुना है, जो उनके राजनीतिक एजेंडे को अधिक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाएगा। उन्होंने सुवेंदु अधिकारी की तुलना असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की।
उन्होंने कहा कि असम की स्थिति अलग है। क्योंकि वहां जनसंख्या को लेकर एक गहरी आशंका मौजूद है। उनके मुताबिक, अगर वास्तविक जनगणना के आधार पर भाषा बोलने वालों की संख्या देखी जाए तो संभव है कि बंगाली भाषी लोगों की संख्या असमिया भाषियों से अधिक हो।
उन्होंने कहा कि असम में यह जनसांख्यिकीय भय एक वास्तविक राजनीतिक कारक है। जबकि बंगाल में ऐसा कोई वास्तविक कारण नहीं है। उनके अनुसार, यहां केवल राजनीतिक कथानक और कृत्रिम रूप से पैदा की गई नफरत का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जौहर सरकार ने कहा कि कुछ छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर माहौल बनाना पहले ही शुरू हो चुका है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अब लोग यह कहने लगे हैं कि खुले में बीफ के अवशेष नहीं लटकाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि बंगाल में लंबे समय से यह सामान्य दृश्य रहा है। लेकिन अब इसे ढंककर रखने की बात की जा रही है। हालांकि उन्होंने माना कि इसे पूरी तरह अव्यावहारिक भी नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा, “जैसे कोई भी व्यक्ति कहीं खुले में सूअर लटकते हुए नहीं देखना चाहेगा, उसी तरह अगर किसी बड़ी आबादी को कोई चीज असहज लगती है तो संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत होती है।”
हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के अपेक्षाकृत “तर्कसंगत” मुद्दों से शुरुआत होती है और फिर राजनीति धीरे-धीरे कट्टर एजेंडे की ओर बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि इसके बाद अगला कदम होगा- “हम यह जांच करेंगे कि कौन बांग्लादेशी है।”
जौहर सरकार ने कहा कि “पहचानो, नाम हटाओ और निर्वासित करो” जैसी राजनीति को लेकर पहले से आशंकाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि इसी आशंका को देखते हुए बांग्लादेश के गृह मंत्री भी बयान दे चुके हैं कि “यह चाल हमारे साथ मत चलिए, आप अपने लोगों को रखिए और हम अपने लोगों को रखेंगे।”
उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर पूरे देश में बहुत शोर मचाया गया। लेकिन वास्तविकता उससे काफी अलग रही।
जौहर सरकार के मुताबिक, अगर झारखंड, बिहार या अन्य राज्यों में वास्तव में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी पकड़े गए होते तो उनकी तस्वीरें हर जगह दिखाई जातीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि “कथानक वास्तविकता से कहीं अधिक मजबूत रहा है।” हालांकि उनके अनुसार सुवेंदु अधिकारी इस कथानक को वास्तविकता के अधिक करीब लाने की कोशिश कर सकते हैं और यही बात लोगों को डराती है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या लोगों ने मुख्य रूप से सांप्रदायिक आधार पर मतदान किया, तो उन्होंने कहा कि ऐसा पूरी तरह नहीं था।
उन्होंने कहा कि लोगों के बीच ममता बनर्जी की मुस्लिम पहचान से जुड़ी राजनीति को लेकर कुछ नाराजगी जरूर थी।
जौहर सरकार ने कहा कि पिछले चार चुनावों में मुस्लिम समुदाय का तृणमूल कांग्रेस के प्रति उत्साह लगातार कम होता गया है।
उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम बहुल इलाकों के नतीजों से यह स्पष्ट होगा कि वहां बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं ने वामपंथी दलों और कांग्रेस को समर्थन दिया।
उनके मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस को मुस्लिम वोटों में लगभग 8 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के भीतर यह भावना बढ़ रही थी कि उनका इस्तेमाल केवल राजनीतिक प्रदर्शन के लिए किया जा रहा है।
जौहर सरकार ने कहा, “मुस्लिम समुदाय खुद पूछ रहा था कि हमारे लिए कितने स्कूल खोले गए? 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। लेकिन पश्चिम बंगाल पुलिस में निचले स्तर तक मुस्लिम प्रतिनिधित्व 5 से 6 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है।”
उन्होंने कहा कि अगर ममता बनर्जी वास्तव में मुस्लिम समुदाय के लिए गंभीर होतीं तो केवल हिजाब पहनने और इफ्तार कार्यक्रमों में शामिल होने के बजाय प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम उठातीं।
उन्होंने सुझाव दिया कि हर वर्ष भर्ती में 2 प्रतिशत अतिरिक्त मुस्लिम प्रतिनिधित्व का लक्ष्य तय किया जा सकता था।
उनके मुताबिक, “15 वर्षों में इससे प्रतिनिधित्व आबादी के अनुपात के करीब पहुंच सकता था। इसके लिए किसी विशेष आरक्षण की जरूरत नहीं थी, केवल विशेष प्रयास की आवश्यकता थी।”
जौहर सरकार ने कहा कि मौलानाओं और इमामों को अनुदान देना तथा इफ्तार में शामिल होना धर्मनिरपेक्षता नहीं है। उनके मुताबिक, इससे आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव नहीं आता।
उन्होंने कहा, “मैं सोशल मीडिया पर सक्रिय हूं और जब भी मैं ममता बनर्जी की आलोचना करता था तो कई मुस्लिम मुझे टोकते हुए कहते थे कि आप ममता बनर्जी के समर्थक की तरह बोल रहे हैं। लेकिन मैं उनकी बात समझता था।”
जौहर सरकार के अनुसार, पश्चिम बंगाल के युवाओं ने इस चुनाव में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, जिसे अभी तक पूरी तरह समझा नहीं गया है।
उन्होंने बताया कि जब वह कॉलेजों में बहस के लिए जाते थे तो भाजपा की ओर से बोलने वाला वक्ता चाहे कितनी भी साधारण या कमजोर बात कहे, उसे उनकी तुलना में कहीं अधिक तालियां मिलती थीं।
उन्होंने कहा, “शिक्षित युवा खुलकर अपनी पसंद दिखा रहे थे। इसकी वजह यह है कि लगातार 12 वर्षों तक चला प्रचार कहीं न कहीं असर डालता है। जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे, तब ये युवा करीब 10 साल के थे और अब 22 साल के हो चुके हैं। उन्होंने केवल यही राजनीतिक कथा सुनी और देखी है।”
उन्होंने कहा कि दूसरी ओर निम्न और मध्यम वर्ग के युवा ममता बनर्जी सरकार से इसलिए नाराज थे, क्योंकि उन्हें रोजगार नहीं मिला।
जौहर सरकार ने कहा कि कोलकाता में बंगाली युवाओं के लिए रोजगार के अवसर मुख्य रूप से स्विगी, जोमैटो, नाइट गार्ड जैसी नौकरियों तक सीमित रह गए हैं।
हालांकि उन्होंने माना कि यह स्थिति केवल बंगाल में नहीं, बल्कि पूरे देश में है। लेकिन बंगाल के युवाओं को दूसरे राज्यों की तुलना का पूरा अंदाजा नहीं होता।
उन्होंने कहा कि युवाओं को सबसे ज्यादा इस बात से पीड़ा होती है कि उनके ही इलाके का कोई दलाल या स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता, जो पांच-छह साल पहले तक बेहद साधारण स्थिति में था, तृणमूल कांग्रेस से जुड़ने के बाद अब तीन मंजिला मकान में रहने लगा है।
जौहर सरकार ने कहा कि इन सभी कारणों- मुस्लिम समर्थन में कमी, शिक्षित और अशिक्षित युवाओं की नाराजगी तथा महिलाओं के वोटों में बदलाव, ने भाजपा को अतिरिक्त 8 प्रतिशत समर्थन दिलाने में भूमिका निभाई।
जब उनसे पूछा गया कि अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे सुवेंदु अधिकारी क्या समान नागरिक संहिता या आक्रामक हिंदुत्व आधारित नीतियों को आगे बढ़ाएंगे तो उन्होंने कहा कि सुवेंदु अधिकारी खुद को भाजपा से भी बड़ा भाजपा समर्थक साबित करने की कोशिश करेंगे।
उन्होंने कहा कि भाजपा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव है, जबकि सुवेंदु अधिकारी कभी संघ की पृष्ठभूमि से नहीं रहे।
जौहर सरकार ने कहा, “एक समय ऐसा था जब वह तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए संघ कार्यकर्ताओं को पीटते थे। अब उन्हें खुद को साबित करना है।”
उनके मुताबिक, इसी कारण सुवेंदु अधिकारी अधिक आक्रामक और नाटकीय राजनीति कर सकते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि सुवेंदु अधिकारी कठोर और विवादास्पद कदम उठा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि ईद के दौरान अगर 300 वर्षों से रेड रोड पर नमाज पढ़ी जाती रही है, तो वह कह सकते हैं कि अब सड़क पर नमाज नहीं होगी।
जौहर सरकार ने कहा कि सुवेंदु अधिकारी ऐसे मुद्दे उठाएंगे, जिन्हें वह “लोकप्रिय” मुद्दे मानते हैं, केवल लोकलुभावन नहीं।
उन्होंने कहा कि कोलकाता में कई कट्टर धर्मनिरपेक्ष लोग भी मस्जिदों में अत्यधिक तेज लाउडस्पीकर पर दी जाने वाली अजान से परेशान रहते हैं।
उन्होंने कहा, “अगर आप मस्जिद के पास किसी अपार्टमेंट में रहते हैं तो अजान के दौरान कुछ मिनटों के लिए बातचीत रोकनी पड़ती है। जबकि इस्लाम में कहीं भी माइक्रोफोन से अजान देना अनिवार्य नहीं बताया गया है।”
उनके मुताबिक, सुवेंदु अधिकारी ऐसे मुद्दों को उठाकर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
जौहर सरकार ने कहा कि शुरुआत में वह ऐसे अपेक्षाकृत “आसान” मुद्दों को उठाएंगे, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली हमेशा से अत्यधिक आक्रामक रही है और वह उसी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति पूरी तरह भाजपा के लिए फायदेमंद साबित नहीं होगी।
उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता भी भाजपा के साथ गए, जो तटस्थ थे और जिन्होंने ममता बनर्जी सरकार के भ्रष्टाचार से नाराज होकर भाजपा को समर्थन दिया।
उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों को लगभग खत्म कर दिया था, जिसके कारण जनता के पास कोई मजबूत विकल्प नहीं बचा था।
जौहर सरकार के मुताबिक, यदि भाजपा अत्यधिक आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति करती है, तो बंगाल के लोगों को बहुत जल्दी उसकी वास्तविक राजनीति का एहसास हो जाएगा।
उन्होंने कहा, “अगर कट्टर हिंदुत्व को तुरंत और आक्रामक तरीके से लागू किया गया तो इसका उल्टा असर भाजपा पर ही पड़ेगा।”
उनके मुताबिक, सुवेंदु अधिकारी के लिए अधिक व्यावहारिक रास्ता यह होगा कि वह थोड़ा संतुलित और समावेशी रवैया अपनाएं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह उनके स्वभाव में नहीं है।
जौहर सरकार ने कहा कि भाजपा सुवेंदु अधिकारी के स्वभाव को बहुत अच्छी तरह जानती है, शायद आम लोगों से भी बेहतर। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री चुना है।
उन्होंने कहा, “अब देखना यह होगा कि इसका आगे क्या परिणाम निकलता है।”

