
ममता बनर्जी से कहाँ हुई चूक और अब क्या है TMC का भविष्य?
सवाल उठता है कि टीएमसी से अलग हुए इस बागी गुट का अगला चेहरा कौन होगा? महाराष्ट्र में जिस तरह एकनाथ शिंदे खुलकर सामने आए थे, वैसा कोई मजबूत चेहरा फिलहाल बंगाल में नजर नहीं आ रहा है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी इस वक्त अपने राजनीतिक जीवन के सबसे खराब दौर से गुजर रही हैं। पार्टी के भीतर बगावत की आग इस कदर भड़क चुकी है कि हर दिन कोई न कोई सांसद, विधायक या पार्षद पाला बदल रहा है। इस महा-संकट के बीच, राजनीतिक गलियारों में टीएमसी और कांग्रेस के विलय (Merger) की अफवाहें भी उड़ रही हैं, हालांकि कांग्रेस ने फिलहाल इससे साफ इनकार किया है।
आखिर जमीन से लड़कर अपनी पार्टी खड़ी करने वाली 'दीदी' की यह हालत कैसे हुई? क्या ममता अपनी बिखरती हुई पार्टी को बचा पाएँगी? आइए समझते हैं इस पूरे संकट के पीछे की 5 बड़ी वजहें।
1. चुनावी नतीजे: उम्मीदें बनाम कड़वी हकीकत
चुनावों से पहले तक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि ममता बनर्जी किसी न किसी तरह सत्ता बचा लेंगी। माना जा रहा था कि महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और सरकारी योजनाएं सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) को मात दे देंगी। लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 200 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की। ममता बनर्जी की कड़ी मेहनत के बावजूद टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने टीएमसी के भीतर उस डर को पैदा कर दिया, जो अक्सर एक मजबूत सत्ता के ढहने के बाद नेताओं में आता है।
2. 'तोलाबाजी' और हिंसा से तंग आ चुकी है जनता
बंगाल की राजनीति में बदलाव हमेशा बड़े चक्रों में होता है। पहले कांग्रेस, फिर तीन दशक तक लेफ्ट और उसके बाद पिछले 15 साल से ममता बनर्जी का राज था। विश्लेषकों के अनुसार, ममता बनर्जी के पतन के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
तोलाबाजी (हफ्ता वसूली और कट मनी): जब लेफ्ट के कैडर बड़ी संख्या में टीएमसी में शामिल हुए, तो वे अपने साथ वही पुरानी वसूली की संस्कृति भी ले आए। यह जमीनी स्तर पर इतना बढ़ गया कि आम जनता त्रस्त हो गई और चुनाव में इसका बदला लिया।
भ्रष्टाचार और हिंसा की संस्कृति: चुनाव के बाद होने वाली हिंसा, मारपीट और राजनीतिक अवसरवाद ने आम और विशेषकर युवा मतदाताओं के मन में टीएमसी के प्रति भारी नाराजगी पैदा कर दी।
3. विधानसभा से दिल्ली तक बगावत की आंधी
इस संकट की गंभीरता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि विधानसभा में टीएमसी के पास विपक्ष में बैठने के लिए कम से कम 80 विधायक थे। लेकिन अब पार्टी के भीतर ही दोफाड़ हो चुकी है।
ऋतुव्रत बनर्जी की अगुवाई में बगावत: पूर्व माकपा (CPI-M) नेता ऋतुव्रत बनर्जी, जो टीएमसी में आए थे, अब करीब 60 विधायकों को अपने साथ तोड़कर अलग गुट बना चुके हैं। विधानसभा स्पीकर ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता भी दे दी है।
नगर पालिकाओं में सेंध: सात नगर पालिकाओं के लगभग 100 पार्षदों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
संसद में भी फूट: दिल्ली में टीएमसी के कई राज्यसभा सांसदों ने भी पार्टी से दूरी बना ली है।=
4. भतीजे अभिषेक बनर्जी पर फूटा वरिष्ठ नेताओं का गुस्सा
पार्टी में मचे इस घमासान के केंद्र में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ सांसद और देश के जाने-माने वकील कल्याण बनर्जी ने हाल ही में सीधे अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधा।
"पार्टी की इस हार के लिए सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी जिम्मेदार हैं। हमें कोई डस्टबिन (कूड़ेदान) समझने की भूल न करे।" कल्याण बनर्जी, वरिष्ठ नेता, TMC
कल्याण बनर्जी का यह गुस्सा अकेले उनका नहीं है। कई विधायकों और सांसदों का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने पार्टी को एक कॉरपोरेट कंपनी की तरह चलाना शुरू कर दिया था। यहाँ तक कि नेताओं को पत्रकारों से मिलने के लिए भी अभिषेक के दफ्तर से क्लीयरेंस लेनी पड़ती थी। वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर एक ही व्यक्ति के हाथ में सारी पावर देने का नतीजा आज पूरी पार्टी भुगत रही है।
इससे पहले शुभेंदु अधिकारी ने भी अभिषेक के बढ़ते कद के कारण टीएमसी छोड़ी थी और आज वे राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके हैं।
5. कांग्रेस के साथ विलय की अटकलें और कानूनी पेंच
संकट के बीच ममता बनर्जी ने दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की। इसके बाद से ही टीएमसी के कांग्रेस में विलय की खबरें सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। हालांकि, कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इसे सिरे से खारिज करते हुए महज एक अफवाह बताया।
बंगाल कांग्रेस के एक नेता ने तो इस संभावित विलय पर तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि "यह साफ पानी में नाले का पानी मिलाने जैसा होगा।"
क्या कानूनी रूप से विलय संभव है?
कानूनी तौर पर टीएमसी का कांग्रेस में विलय होना फिलहाल नामुमकिन है। दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, किसी दल के विलय के लिए विधायी पार्टी (MLAs/MPs) के साथ-साथ मूल राजनीतिक दल का भी औपचारिक रूप से विभाजित होना और फिर विलय को मंजूरी मिलना जरूरी है। चूंकि बागी विधायक अभी भी तकनीकी रूप से टीएमसी का हिस्सा हैं और उन्होंने इस्तीफे नहीं दिए हैं, इसलिए कानूनी रूप से यह स्थिति जस की तस बनी हुई है।
क्या है आगे की राह?
सवाल उठता है कि टीएमसी से अलग हुए इस बागी गुट का अगला चेहरा कौन होगा? महाराष्ट्र में जिस तरह एकनाथ शिंदे खुलकर सामने आए थे, वैसा कोई मजबूत चेहरा फिलहाल बंगाल में नजर नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि टीएमसी में हमेशा ममता बनर्जी का ही एकछत्र राज रहा है, उनके साए में कोई दूसरा नेता पनप ही नहीं पाया।
द फेडरल की रिपोर्ट के मुताबिक, कई बागी नेताओं पर भ्रष्टाचार और आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसे में यह बगावत किसी विचारधारा की लड़ाई नहीं, बल्कि केंद्रीय एजेंसियों के डर से खुद को बचाने का एक अवसरवादी जरिया है। पर्दे के पीछे से इस पूरी पटकथा को लिखने वाली बीजेपी के पास 'वाशिंग मशीन' की ताकत है, इसलिए लीडरशिप का संकट भी वे जल्द ही सुलझा लेंगे।
जमीन से संघर्ष करके सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाली ममता बनर्जी आज एक बार फिर सड़क पर आकर खड़ी हो गई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 'बंगाल की शेरनी' इस मलबे से अपनी पार्टी को दोबारा जिंदा कर पाती है या नहीं।

