मणिपुर में बार-बार क्यों लौट आती है हिंसा? शांति की राह में क्या है सबसे बड़ी बाधा?
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मणिपुर में बार-बार क्यों लौट आती है हिंसा? शांति की राह में क्या है सबसे बड़ी बाधा?

मई 2023 में जब यह हिंसा शुरू हुई थी, तब मुख्य मुद्दा मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने का था। लेकिन अब यह संघर्ष एक बड़े संवैधानिक और क्षेत्रीय मुद्दे में बदल गया है।


मणिपुर में पिछले एक साल से अधिक समय से जारी अशांति ने न केवल राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की सुरक्षा और राजनीतिक रणनीतियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारी सुरक्षा बलों की तैनाती और कई राजनीतिक हस्तक्षेपों के बावजूद, स्थिति अभी भी विस्फोटक बनी हुई है। हाल ही में 7 अप्रैल को दो मासूम बच्चों की हत्या के बाद भड़की ताज़ा हिंसा ने एक बार फिर प्रशासन की विफलता को उजागर किया है।

प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और 'राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप' (RRAG) के निदेशक सुहास चकमा का मानना है कि मणिपुर में शांति बहाली न हो पाने की सबसे बड़ी वजह दोनों विरोधी गुटों को 'बातचीत की मेज' तक लाने में सरकार की नाकामी है।

हथियारबंद गुट और अस्तित्व का सवाल

सुहास चकमा के अनुसार, मणिपुर की स्थिति अन्य संघर्ष क्षेत्रों (जैसे बोडोलैंड) से अलग है। यहाँ कुकी और मैतेई, दोनों समुदायों के पास ऐसे सशस्त्र संगठन हैं जो किसी भी समय एक छोटी सी चिंगारी को बड़ी आग में बदल सकते हैं। चाहे वह मोर्टार दागना हो या किसी की हत्या, ये गुट माहौल बिगाड़ने में माहिर हैं। इन समूहों के लिए यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान की बन चुकी है।

मणिपुर का दुर्गम इलाका और विभिन्न समूहों के साथ चल रहे पुराने संघर्षविराम (Ceasefire) समझौते भी केंद्र सरकार के लिए स्थिति को जटिल बनाते हैं। जब भी स्थिति थोड़ी नियंत्रण में आती है, कोई एक हिंसक घटना पूरे राज्य को फिर से दंगों की आग में झोंक देती है।

सुरक्षा बलों की 'मजबूरी' और प्रशासनिक सुस्ती

7 अप्रैल की घटना के बाद प्रशासन की सुस्ती पर सवाल उठाते हुए चकमा कहते हैं कि भारी सुरक्षा बल होने के बावजूद हिंसा का सिलसिला जारी रहना बताता है कि प्रशासन 'प्रोएक्टिव' यानी सक्रिय कदम नहीं उठा पा रहा है। मणिपुर में तैनात केंद्रीय बलों की भूमिका अक्सर संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति मिशनों जैसी हो गई है। उनके पास हथियार तो हैं, लेकिन वे उनका स्वतंत्र रूप से उपयोग नहीं कर सकते।

यदि सुरक्षा बल उग्रवादियों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई करते हैं और उसमें किसी नागरिक को नुकसान पहुँचता है, तो यह हिंसा के एक नए चक्र को जन्म देता है। इसलिए, सुरक्षा बल संयम बरतते हैं, लेकिन यही संयम उनकी प्रभावशीलता को कम कर देता है। वे शांति को केवल 'मैनेज' (प्रबंधन) कर पा रहे हैं, उसे सख्ती से 'एनफोर्स' (लागू) नहीं कर पा रहे।

बातचीत की मेज का खाली होना: सबसे बड़ी विफलता

चकमा के विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। वे कहते हैं, "सबसे बड़ी विफलता यह है कि सरकार दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों और उनके सशस्त्र गुटों को एक मेज पर नहीं ला पाई है। भले ही बातचीत तुरंत सफल न हो, लेकिन संवाद शुरू होने से समुदायों के बीच विश्वास पैदा होता है और हिंसा में कमी आती है।"

अक्सर सरकार शांति विरोधी तत्वों को दोष देकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन अंततः यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसा वातावरण बनाए जहाँ हर कोई बातचीत के लिए तैयार हो। भारत सरकार ने अतीत में इससे भी अधिक कठिन उग्रवादी समूहों के साथ बातचीत की है, तो मणिपुर में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा?

बदलते मुद्दे: जमीन से स्वायत्तता तक

मई 2023 में जब यह हिंसा शुरू हुई थी, तब मुख्य मुद्दा मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने का था। लेकिन अब यह संघर्ष एक बड़े संवैधानिक और क्षेत्रीय मुद्दे में बदल गया है। कुकी समूहों के लिए 'स्वायत्तता' अब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। मांगों के कड़े होने के कारण समाधान और भी जटिल हो गया है। इस वैचारिक और क्षेत्रीय लड़ाई के बीच आम जनता—दुकानदार, किसान और दिहाड़ी मजदूर—सबसे अधिक पिस रहे हैं। आर्थिक गतिविधियां ठप हैं और लोगों की रोजी-रोटी छिन गई है।

क्या केंद्रीय बलों को हटाना समाधान है?

राज्य के कुछ हिस्सों से केंद्रीय बलों को हटाने की मांग उठ रही है, लेकिन सुहास चकमा इसे एक आत्मघाती कदम मानते हैं। उनके अनुसार, समुदायों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर हमेशा सवाल उठते हैं। मणिपुर पुलिस से हथियारों और गोला-बारूद की लूट ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। ऐसे में केंद्रीय बल ही एकमात्र ऐसी शक्ति हैं जो स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण से बाहर होने से रोके हुए हैं। अगर उन्हें वापस बुलाया गया, तो मणिपुर में भयानक तबाही मच सकती है।

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