
सपा में बगावत 'मिशन इम्पॉसिबल'! जानिए क्यों सेफ है अखिलेश की साइकिल
यूपी में ओपी राजभर और केशव मौर्य के दावों के बीच जानिए क्यों दलबदल कानून, मजबूत संख्या बल और अखिलेश यादव के कड़े नियंत्रण के चलते सपा में टूट लगभग नामुमकिन है।
Samajwadi Party MPs Politics: महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी में मची भगदड़ के बाद, बीते दो दिनों से उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक नया शिगूफा तैरने लगा है। यूपी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के कई सांसद पाला बदलने को बेताब हैं। राजभर तो बाकायदा 'बागी बलिया' के सांसद सनातन पांडेय का नाम लेकर बगावत की स्क्रिप्ट सुना रहे हैं, वहीं केशव मौर्य का दावा है कि सपा के 25-26 सांसद बीजेपी के संपर्क में हैं। लेकिन अगर कड़े कानूनी गणित और जमीन पर अखिलेश यादव के चक्रव्यूह को देखें, तो सपा में सेंध लगाना 'मिशन इम्पॉसिबल' जैसा नजर आता है। इसे विस्तार से समझते हैं।
दो तिहाई का कड़ा गणित: दलबदल कानून बना सबसे बड़ा रोड़ा
महाराष्ट्र और यूपी की सियासी बिसात में सबसे बड़ा अंतर 'संख्या बल' का है। भारत के सख्त दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, किसी भी पार्टी के संसदीय दल को कानूनी रूप से तोड़ने के लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का एक साथ अलग होना जरूरी है। उद्धव ठाकरे के पास लोकसभा में सिर्फ 9 सांसद थे, जिनमें से 6 को तोड़ना आसान था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने यूपी में ऐसी साइकिल चलाई कि सपा 37 सीटें जीतकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। अब इस आंकड़े के लिहाज से अगर किसी को बगावत करनी है, तो कम से कम 25 सांसदों को एक साथ लाना होगा, जो मौजूदा हालात में नामुमकिन के बराबर है।
अखिलेश का 'पारिवारिक और पीडीए' सुरक्षा कवच
सपा के इन 37 सांसदों के आंतरिक ताने-बाने को देखें, तो यह किसी अभेद्य किले जैसा है। इन सांसदों में से 5 तो खुद अखिलेश के परिवार से हैं अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, आदित्य यादव और प्रतीक यादव। इसके अलावा पार्टी के पास 4 मजबूत मुस्लिम चेहरे हैं। बाकी बचे ज्यादातर सांसद ओबीसी (OBC) और दलित समुदाय से हैं, जिन्हें अखिलेश ने अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत पहली बार संसद की चौखट तक पहुंचाया है। इन नए सांसदों का राजनीतिक अस्तित्व पूरी तरह अखिलेश यादव और सपा के 'साइकिल' सिंबल पर टिका है, ऐसे में वे किसी दूसरे पाले में जाने का आत्मघाती कदम नहीं उठाएंगे।
सपा में कोई 'एकनाथ शिंदे' नहीं, अखिलेश ही सुप्रीम पावर
शिवसेना (यूबीटी) के टूटने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वहां एकनाथ शिंदे के रूप में पार्टी के भीतर एक समानांतर शक्ति केंद्र (पैरेलल पावर सेंटर) पहले से तैयार था, जिनकी विधायकों और सांसदों पर सीधी पकड़ थी। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव के कद के आसपास खड़ा होने वाला कोई दूसरा नेता नहीं है। साल 2017 के पारिवारिक विवाद के बाद अखिलेश ने संगठन की कमान पूरी तरह अपने हाथ में ले ली थी। कभी बागी तेवर दिखाने वाले चाचा शिवपाल सिंह यादव भी अपनी अलग पार्टी बनाकर ताकत देख चुके हैं और अब अखिलेश के नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार कर चुके हैं।
कमबैक किंग अखिलेश का बढ़ा रसूख और 2027 का टारगेट
ममता बनर्जी की टीएमसी में बगावत की खबरें तब आईं जब वहां सत्ता के समीकरण बदलने की चर्चाएं शुरू हुईं। इसके उलट, अखिलेश यादव इस समय बैकफुट पर नहीं, बल्कि फ्रंटफुट पर खेल रहे हैं। 2024 में यूपी में बीजेपी को पछाड़कर उन्होंने खुद को एक बेहद कामयाब और आक्रामक रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया है। पार्टी के कार्यकर्ता और सांसद इस समय बेहद जोश में हैं और उनका पूरा फोकस 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव पर है। जब पार्टी लगातार मजबूत हो रही हो, तब सांसदों का एक बड़ा धड़ा छोड़कर चला जाए, ऐसा राजनीति के इतिहास में अमूमन नहीं होता।
मानसिक दबाव बनाने का 'साइकोलॉजिकल वॉरफेयर'
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ओम प्रकाश राजभर और केशव प्रसाद मौर्य की यह बयानबाजी सिर्फ एक 'साइकोलॉजिकल वॉर' (मानसिक युद्ध) का हिस्सा है। दरअसल, बीजेपी और उसके सहयोगी दल मीडिया में सपा में टूट की अफवाहें उड़ाकर विपक्षी एकता को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर करना चाहते हैं। खुद अखिलेश यादव ने इस पर तंज कसते हुए कहा है कि जो लोग डरेंगे, सिर्फ वही जा सकते हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी चट्टान की तरह एकजुट है। राजभर को दूसरों के घर में झांकने के बजाय अपने कुनबे की फिक्र करनी चाहिए। कुल मिलाकर, राजभर-केशव के दावों से सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन सपा की साइकिल को पंचर करना फिलहाल दूर की कौड़ी है।
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