अपनी ही सरकार, अपना ही वोट, फिर भी घर आने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे बंगाल के मजदूरों का दर्द
x

अपनी ही सरकार, अपना ही वोट, फिर भी घर आने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे बंगाल के मजदूरों का दर्द

बंगाल चुनाव 2026 में लगभग 22 लाख प्रवासी वोटरों के लिए परिवहन की कमी एक बड़ा संकट बनकर उभरी है, जहाँ नागरिकता और मतदाता सूची से नाम कटने का डर उन्हें किसी भी कीमत पर घर लौटने के लिए मजबूर कर रहा है।


36 साल के समयुन शेख के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में अपना नाम मतदाता सूची (Electoral Roll) में दर्ज करवाना किसी जंग जीतने से कम नहीं था। मुर्शिदाबाद जिले के रघुनाथगंज के रहने वाले समयुन को लगा था कि सबसे कठिन काम पूरा हो गया है और अब वे 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान में अपनी उंगली पर स्याही लगवा सकेंगे। लेकिन असली परीक्षा तो अभी शुरू होनी थी।

संबलपुर से घर वापसी की वो खौफनाक सुबह

समयुन और उनके साथ 63 अन्य मजदूर पड़ोसी राज्य ओडिशा के संबलपुर जिले में काम करते हैं। चुनाव के लिए घर लौटने के लिए उन्होंने हफ़्तों तक ट्रेन की टिकट पाने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। मजबूरन, इन मजदूरों ने 70,000 रुपये में एक बस किराए पर ली। 21 अप्रैल की सुबह 6 बजे जब ये लोग कुचिंडा (संबलपुर) से निकलने ही वाले थे, तभी स्थानीय पुलिस ने 'ओवरलोडिंग' के आरोप में उनकी बस (WB19G8407) को जब्त कर लिया।


यह इन मजदूरों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। 50,000 रुपये पहले ही एडवांस दिए जा चुके थे। पुलिस ने 12,000 रुपये का जुर्माना भरने को कहा। मजदूरों ने दोबारा पैसे जुटाए और आरटीओ (RTO) दफ्तर के चक्कर काटे। अगले दिन जुर्माना जमा हुआ और रिलीज ऑर्डर मिला, लेकिन पुलिस ने फिर भी बस नहीं छोड़ी। घंटों की मिन्नतें और पुलिसिया बेरुखी के बाद, इन मजदूरों ने अपनी बची-कुची जमापूंजी और रिश्तेदारों से उधार लेकर प्राइवेट गाड़ियां और ट्रक बुक किए। समयुन और उनके साथी अंततः बुधवार दोपहर 3 बजे 12,000 रुपये में एक SUV बुक कर घर के लिए रवाना हुए, ताकि गुरुवार सुबह तक अपने गांव पहुंच सकें।

मताधिकार से वंचित होने की 'दूसरी परत'

विश्लेषक इसे मताधिकार से वंचित होने की 'दूसरी परत' (Second Layer of Disenfranchisement) कहते हैं। यह नाम कटने के बारे में नहीं है, बल्कि उस कठिन वास्तविकता के बारे में है जो एक मजदूर को वोट डालने के लिए अपने घर पहुंचने में आती है। पश्चिम बंगाल के लगभग 22 लाख मतदाता राज्य से बाहर रहकर काम करते हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों से एक बड़ी आबादी केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों में मजदूरी करती है।

मुंबई के खार रोड इलाके में फंसे सुमन अली की कहानी भी ऐसी ही है। वे कहते हैं, "ट्रेनों में जगह नहीं है और हवाई किराया 30,000 रुपये पार कर चुका है। हम जैसे गरीब मजदूरों के लिए यह नामुमकिन है।"

पहचान और अस्तित्व का डर

इस साल घर लौटकर वोट डालने की इतनी जल्दबाजी क्यों है? इसका जवाब डर में छिपा है। विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में बड़ी संख्या में नाम काटे जाने की खबरों ने प्रवासी मजदूरों के मन में भय पैदा कर दिया है। समयुन कहते हैं, "हमें डर है कि अगर हम वोट डालने नहीं आए, तो हमारा नाम फिर से काट दिया जाएगा या भविष्य में हमारे बच्चों को नागरिकता साबित करने में परेशानी होगी।" विशेषकर मुस्लिम समुदायों में यह आशंका अधिक है कि मतदान न करना उनकी पहचान पर सवाल खड़ा कर सकता है।

रेलवे और प्रशासन की अनदेखी?

सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग और रेलवे ने बंगाल के चुनाव के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की। तुलनात्मक रूप से, 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों और छठ पूजा के दौरान रेलवे ने लगभग 2,000 विशेष ट्रेनें चलाई थीं। 'प्रवासी श्रमिक ऐक्य मंच' के महासचिव आसिफ फारुक कहते हैं कि उन्होंने चुनाव आयोग से विशेष ट्रेनों की मांग की थी, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दिया गया। आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी के अनुसार, इस चुनाव के लिए प्रवासी मजदूरों के लिए कोई विशेष ट्रेन नहीं चलाई गई।

नंदीग्राम से लेकर मुर्शिदाबाद तक, बंगाल की राजनीति अब पहचान और अस्तित्व के मुद्दों पर सिमट गई है। समयुन जैसे हजारों मजदूर अपनी मेहनत की कमाई सिर्फ इसलिए लुटा रहे हैं ताकि वे यह साबित कर सकें कि वे इस देश के नागरिक हैं। जब वे गुरुवार को कतार में खड़े होंगे, तो वह केवल एक वोट नहीं होगा, बल्कि उनकी नागरिकता और पहचान की मुहर होगी।

Read More
Next Story