सपा का पेंशन दांव या बीजेपी के नैरेटिव में फंसे अखिलेश यादव?
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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वादा किया है कि सरकार में आने पर महिलाओं को 40 हजार रुपए पेंशन देंगे।

सपा का पेंशन दांव या बीजेपी के नैरेटिव में फंसे अखिलेश यादव?

सरकार में आने पर अखिलेश यादव ने महिलाओं को प्रति वर्ष 40 हजार रुपए पेंशन देने का वादा किया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी, बीजेपी के महिला आरक्षण के दांव में फंस गई है।


क्या महिला आरक्षण के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी कहीं भारतीय जनता पार्टी के नैरेटिव में उलझती जा रही है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा बनता जा रहा है। पार्टी नेतृत्व को लगने लगा है कि अगर इस मुद्दे पर आक्रामक रुख नहीं अपनाया गया, तो सत्ता में वापसी का सपना अधूरा रह सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बड़ा दांव खेलते हुए गरीब महिलाओं को सालाना 40,000 रुपये (यानी लगभग 3,333 रुपये प्रति माह) पेंशन देने और 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि 300 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा 2022 के चुनाव में भी किया गया था, लेकिन तब इसका अपेक्षित चुनावी लाभ नहीं मिला।

2027 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए जितना अहम है, उससे कहीं ज्यादा समाजवादी पार्टी के लिए निर्णायक माना जा रहा है। बीजेपी जहां लगातार ‘हैट्रिक’ का दावा कर रही है, वहीं सपा 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को आधार बनाकर वापसी की उम्मीद जता रही है।महिला आरक्षण संशोधन पर सपा के रुख को समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि महिलाओं के बीच पार्टी की छवि कैसी रही है। 2012 में जब सपा सत्ता में आई, तब महिलाओं का भरोसा पूरी तरह उसके साथ नहीं था। कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल थे और मुलायम सिंह यादव के विवादित बयान ने इस धारणा को और कमजोर किया। यही बयान आज भी बीजेपी के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना हुआ है।

2017 के बाद जब बीजेपी ने महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बनाया, तो महिला मतदाताओं का झुकाव तेजी से उसकी ओर बढ़ा। 2017 और 2022 दोनों चुनावों में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ खड़ा दिखा। हालांकि, इसका कारण सिर्फ सुरक्षा नहीं था; उज्ज्वला योजना, शौचालय और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं ने महिलाओं के जीवन पर सीधा असर डाला। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस धारणा को आंशिक रूप से बदला। महिला वोटर बहुल सीटों (17 लोकसभा सीट) में से बड़ी संख्या में सीटें विपक्षी गठबंधन (12 सीटें) के खाते में गईं, जिससे यह संकेत मिला कि महिला मतदाता पूरी तरह किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ी हैं।

इसी बदलते परिदृश्य में बीजेपी ने महिला आरक्षण को लागू कर एक बड़ा राजनीतिक और नैतिक स्पेस बनाने की कोशिश की है। इसके जवाब में सपा ने आर्थिक लाभ के जरिए अपनी रणनीति तैयार की है। अखिलेश यादव का पेंशन और मुफ्त बिजली का वादा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। जहां तक PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की बात है, यह कोई नया फार्मूला नहीं है, लेकिन सपा इसे अब सामाजिक न्याय के व्यापक एजेंडे के रूप में पेश कर रही है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या PDA अकेले चुनाव जिता सकता है? 2019 और 2022 के आंकड़े बताते हैं कि ऐसा तब तक संभव नहीं है, जब तक महिलाओं का बड़ा वर्ग साथ न हो। यही कारण है कि सपा अब PDA के साथ महिला वोट को जोड़कर जीत का नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है।

इसके बावजूद एक अहम सवाल बना हुआ है कि क्या महिला मतदाता सिर्फ आर्थिक लाभ, जैसे पेंशन और मुफ्त बिजली, से प्रभावित होंगी? उत्तर प्रदेश की चुनावी प्रवृत्तियां बताती हैं कि ऐसा पूरी तरह संभव नहीं है। महिलाएं अब सुरक्षा, सम्मान और सुविधाओं तीनों पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करती हैं। इनमें से किसी एक में भी कमी चुनावी समीकरण बदल सकती है।

यूपी की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है। यदि अखिलेश यादव अपनी पुरानी छवि बदलने, कानून-व्यवस्था पर भरोसा दिलाने और अपने वादों को विश्वसनीय बनाने में सफल होते हैं, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। अन्यथा, ये घोषणाएं केवल राजनीतिक सुर्खियों तक सीमित रह सकती हैं।दूसरी ओर, बीजेपी जिस तरह आक्रामक तरीके से मैदान में सक्रिय है, उससे सपा पर दबाव बना रहेगा कि वह बार-बार स्पष्ट करे कि संसद में महिला आरक्षण के मुद्दे पर उसका विरोध महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ नहीं, बल्कि परिसीमन से जुड़े अपने राजनीतिक तर्कों के कारण था।

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