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गाजा की तबाही, ईरान की मजबूती, क्या मध्य पूर्व में बदल रहा है शक्ति संतुलन?


गाजा की तबाही, ईरान की मजबूती, क्या मध्य पूर्व में बदल रहा है शक्ति संतुलन?
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ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका समझौते की राह तलाश रहा है, जबकि गाजा युद्ध ने इजरायल के वैश्विक अलगाव और आलोचनाओं को बढ़ा दिया है।

आधुनिक भू-राजनीति में ऐसे मौके कम ही आते हैं, जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली महाशक्ति अपनी शर्तें थोपने के बजाय पीछे हटने के लिए बातचीत करने को मजबूर हो जाए। लेकिन फिलहाल खाड़ी क्षेत्र में कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिल रहा है। हाल के हफ्तों में इजरायल के साथ मिलकर सैन्य कार्रवाई करने वाला अमेरिका अब ईरान के साथ ऐसे समझौते की तलाश करता दिखाई दे रहा है, जो शुरुआती आक्रामक बयानों और युद्धकालीन दावों से काफी अलग है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम न केवल मध्य पूर्व की बदलती शक्ति-संतुलन की कहानी कहता है, बल्कि अमेरिका और इजरायल की क्षेत्रीय रणनीति की सीमाओं को भी उजागर करता है।

लगातार हमलों के बावजूद ईरान की रणनीतिक मजबूती

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह कभी परमाणु हथियार विकसित न करे, होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी प्रतिबंध के खोला जाए और समुद्री बारूदी सुरंगों को तुरंत हटाया जाए।हालांकि आलोचकों का मानना है कि ये बयान किसी निर्णायक जीत के बजाय ऐसे प्रशासन की बेचैनी को दर्शाते हैं, जो एक महंगे और जोखिमपूर्ण संघर्ष से सम्मानजनक रास्ता तलाश रहा है।

उनके अनुसार, ईरान ने लगातार सैन्य दबाव झेलने के बावजूद अपने रणनीतिक धैर्य और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखा है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में उसकी स्थिति ने उसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बढ़त प्रदान की है।

सैन्य ताकत हमेशा राजनीतिक जीत नहीं दिलाती

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका ने पहले भी वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों में यह सबक सीखा है कि सैन्य श्रेष्ठता हमेशा राजनीतिक सफलता में नहीं बदलती।रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में प्रतिबंधों में राहत और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। बताया जा रहा है कि शुरुआती चरण में लगभग 12 अरब डॉलर की संपत्तियां जारी करने पर विचार किया जा रहा है।हालांकि अमेरिकी प्रशासन किसी संभावित समझौते को अपनी “मैक्सिमम प्रेशर” नीति की सफलता के रूप में पेश कर सकता है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इतिहास इसे अलग नजरिए से देख सकता है।

गाजा युद्ध ने बढ़ाया इजरायल का वैश्विक अलगाव

क्षेत्रीय तनाव के केंद्र में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहु की सरकार को माना जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि उनकी सरकार ने सैन्य आक्रामकता को राजनीतिक अस्तित्व के साधन के रूप में इस्तेमाल किया है।हाल ही में नेतन्याहू ने दावा किया था कि भारत उन कुछ देशों में शामिल है जहां इजरायल के प्रति समर्थन अब भी बेहद मजबूत है। लेकिन कई विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान वास्तविकता से अधिक राजनीतिक संदेश देने का प्रयास था।

गाजा से लगातार सामने आ रही तबाही की तस्वीरों ध्वस्त इमारतों, अस्पतालों पर हमलों, भूख से जूझते नागरिकों और बड़ी संख्या में मारे गए बच्चों ने दुनिया भर में इजरायल की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और यहूदी समुदाय के कई प्रभावशाली वर्गों ने भी गाजा में हो रही तबाही पर चिंता जताई है और इजरायली नीतियों की आलोचना की है।

भारत की भूमिका पर उठे सवाल

लेख में कहा गया है कि भारत और इजरायल के बीच रणनीतिक तथा रक्षा संबंध मजबूत हुए हैं, लेकिन भारतीय जनमत कहीं अधिक जटिल और विविध है।भारत का स्वतंत्रता आंदोलन और उसका उपनिवेशवाद-विरोधी इतिहास लंबे समय तक फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति सहानुभूति रखता रहा है। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी के 1938 के उस बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय होगा।

आलोचकों का आरोप है कि भारत की मौजूदा विदेश नीति में रणनीतिक हितों को नैतिक सिद्धांतों पर प्राथमिकता दी जा रही है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायली नागरिकों पर हमलों की निंदा करते हैं, लेकिन फिलिस्तीनी नागरिकों की मौतों पर अपेक्षाकृत कम मुखर दिखाई देते हैं।

पश्चिमी देशों की दोहरी नीति पर आलोचना

यह भी तर्क दिया गया है कि पश्चिमी देशों के एक बड़े हिस्से ने इजरायल को असाधारण छूट प्रदान की है, जबकि क्षेत्र के अन्य देशों से संयम बरतने की अपेक्षा की जाती है।आलोचकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं, क्योंकि मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जाता।

क्षेत्रीय संघर्ष का बढ़ता खतरा

मध्य पूर्व में इजरायल और लेबनान के बीच तनाव, गाजा संकट और ईरान के साथ बढ़ते टकराव ने व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की आशंकाओं को बढ़ा दिया है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकते हैं, खासकर ऊर्जा बाजारों पर।

बदलता शक्ति संतुलन

विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और इजरायल क्षेत्र में महत्वपूर्ण सैन्य बढ़त रखता है। लेकिन दोनों देशों को यह समझना पड़ रहा है कि केवल सैन्य बल के सहारे स्थायी राजनीतिक समाधान हासिल नहीं किया जा सकता। वैधता के बिना दबाव और सैन्य शक्ति अक्सर प्रतिरोध को जन्म देती है, समर्पण को नहीं। ऐसे में मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन एक बार फिर बदलता दिखाई दे रहा है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में कोई नया देश अब्राहम समझौतों जैसे क्षेत्रीय समझौतों में शामिल होने के लिए आगे आएगा।

गाजा, ईरान और पूरे मध्य पूर्व में जारी घटनाक्रम इस बात का संकेत दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में क्षेत्र की राजनीति और वैश्विक कूटनीति दोनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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