Aaj Ki Taaza Khabar: आज की बड़ी खबरें, एक नजर में जानें दिनभर का हाल
CEC ज्ञानेश कुमार और SIR विवाद से लेकर विपक्ष की महाबैठक, बंगाल-पंजाब की सियासी हलचल और प्रशांत किशोर के मिशन दिल्ली तक—पढ़ें आज की बड़ी राजनीतिक खबरें एक साथ।
एक नजर अभी तक की सुर्खियों पर। सीईसी ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष का बड़ा मोर्चा। 30 सितंबर को महा बैठक। पवनखेड़ा का तंज। ज्ञानेश कुमार को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए। एनडीए में भी सवाल। अठावले बोले सरकार मामले को देखेगी। बंगाल में ममता की रैली से पहले टीएमसी विधायक कुणाल घोष की कार पर हमला। पंजाब कांग्रेस में एकता की तस्वीर लेकिन च्नी गैर हाजिर। बांकीपुर के बाद प्रशांत किशोर का मिशन दिल्ली। जैन जी के साथ पीएम मोदी की भजन क्लबिंग कांग्रेस का तंज। आज देश की राजनीति में
एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है। क्या चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल अब सिर्फ विपक्ष की आवाज है? या इन सवालों ने सत्ता के खेमे के भीतर भी जगह बना ली है? सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष 30 सितंबर को बड़ी बैठक करने जा रहा है। ममता बनर्जी से लेकर लेफ्ट तक बातचीत चल रही है। दूसरी तरफ एनडीए के नेता रामदास अठावले कह रहे हैं कि सरकार इन मुद्दों को देखेगी। उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव अभी सामने है। लेकिन सर्वे के आंकड़े आ चुके हैं और सियासी बयानबाजी तेज है। पंजाब कांग्रेस में एकता की कोशिश हो रही है। मगर बड़े चेहरे अभी भी एक मंच से दूर दिख रहे हैं।
यानी आज की राजनीति में संस्थाएं हैं, चुनाव है, संगठन है और आम आदमी की जिंदगी से जुड़े सवाल भी। चलिए बिना शोर के खबर समझे। आज की बड़ी खबरों को एक-एक करके समझते हैं। एसआईआर पर सवालों के बीच इलेक्शन कमीशन का बड़ा बदलाव। अब घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे पीएम। एसआईआर को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने 26 सितंबर की बैठक में कई अहम बदलाव किए हैं। अब अनमैप्ड या लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के आधार पर नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर बीएलओ जाकर दस्तावेज लुटाएंगे और ईसीआई नेट पर अपलोड करें। सामान्य स्थिति में मतदाताओं को ईरो और
एरो कार्यालय में सुनवाई के लिए नहीं बुलाया जाएगा। जरूरत पड़ने पर सुनवाई ऑनलाइन होगी। गरीब, मजदूर और बेघर मतदाताओं के लिए विशेष कैंप और हेल्प डेस्क भी लगाए जाएंगे। वहीं ईसीआई नेट की समीक्षा वरिष्ठ उपचुनाव आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति करेगी। जिसमें आईआईटी और आईआईआईटी का स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होगा। आयोग ने अपनी बैठकों का एजेंडा पहले साझा करने और मिनट्स जारी करने का भी फैसला किया है। यह बदलाव ऐसे समय में हुए हैं जब एसआईआर फॉर्म सिक्स और ईसीआई नेट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि मतदाताओं को यह सुविधाएं प्रक्रिया की शुरुआत से क्यों
नहीं दी गई? चुनाव आयोग को लेकर विपक्षी लामबंदी अब और बड़ी होती दिख रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी इंडिया गठबंधन के नेता 30 सितंबर को एक बड़ी बैठक और साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी कर रहे हैं। एनडीटीवी के रिपोर्ट के मुताबिक ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने राहुल गांधी से इस मुद्दे पर बात की है। सीपीएम महासचिव एमए बेबी ने भी ममता बनर्जी से बातचीत की है। विपक्ष की तरफ से ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग के साथ महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी की बात भी सामने आई है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने
सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। उनका मुख्य निशाना एसआईआर और फॉर्म सिक्स में किए गए कथित बदलाव पर है। लेकिन यहां एक जरूरी अंतर है। यह विपक्ष के आरोप और मांगे हैं। इन आरोपों के आधार पर यह कहना कि चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा है। अभी एक स्थापित तथ्य नहीं है। आयोग पहले ही कह चुका है कि उसके फैसले सर्वसमिति से लिए गए हैं। तो सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं है। सवाल यह है कि चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों का जवाब कितनी पारदर्शिता से दिया जाता है। सीईसी विवाद अब व्यंग और तीखे राजनीतिक बयानों तक पहुंच चुका है। कांग्रेस नेता पवन
खेड़ा ने ज्ञानेश कुमार को लेकर प्रधानमंत्री पद से जुड़ा तंज कसा है। खेड़ा ने निशाना चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर कांग्रेस की लगातार जारी आलोचना है। उनका तर्क है कि अगर चुनाव आयोग पर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हैं और फिर भी सरकार की तरफ से आयोग का बचाव किया जा रहा है तो सिर्फ व्यंग के जरिए उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार को प्रधानमंत्री ही बना देना चाहिए। पद्म भूषण तो बहुत छोटी चीज है। प्रधानमंत्री बना दो। भाई जो आदमी दूसरों को प्रधानमंत्री बना सकता है उसी को बना दो। क्यों छोटी बात देते हो भाई? ज्ञानेश बाबू को ज्ञानेश
गुप्ता जी को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। वह खुद इस्तीफा दे दें। उनकी सुरक्षा, उनकी हित, उनके भविष्य की सुरक्षा उसी में है। जब मैं सुरक्षा कहता हूं तो उनके भविष्य की सुरक्षा क्योंकि फिर अगर वो अप्रूवर बन गए तो तो सुरक्षित रहेंगे। नहीं तो उनका आने वाला जो वक्त है वो जेल में ही गुजरेगा। यह बयान मूलत राजनीतिक कटाक्ष है। इसका कोई संवैधानिक या प्रशासनिक अर्थ नहीं है। लेकिन राजनीति में भाषा भी संदेश देती है। और इस समय संदेश साफ है। कांग्रेस चुनाव आयोग पर हमला सिर्फ चुनावी प्रक्रिया को लेकर नहीं बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता के
सवाल से जोड़कर कर रही है। दूसरी तरफ बीजेपी और सरकार की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। यानी विवाद का केंद्र एक ही है। आयोग की स्वतंत्रता पर भरोसा कैसे कायम रहे। विपक्ष की आवाज के बीच सत्ता पक्ष के खेमे से भी एक अलग सुर सुनाई दिया है। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने सीईसी ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर कहा है कि सरकार इस मामले में उठ रहे मुद्दों को देखेगी। अठावले ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र संस्था बताया और कहा कि आयोग का राजनीतिक दलों से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। एसआईआर को लेकर उन्होंने
विपक्ष की आलोचना को भी खारिज किया है। उनके मुताबिक एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना और गलत दस्तावेजों के आधार पर दर्जनामों को हटाना है। मुझे लगता है कि ज्ञानेश कुमार के संबंध में उनके रिजाइन की मांग कांग्रेस पार्टी की तरफ से कांग्रेस कांग्रेस जनता पार्टी है यानी कि विपक्ष दलों से मांग हो रही है। मुझे लगता है कि अह अह अह अह इलेक्शन कमिशन इंडिपेंडेंट बॉडी होता है और उनके जो निर्णय होते हैं, निर्णय से सरकार का कोई संबंध होता नहीं है। उनको पूरा अधिकार होता है। जिस तरह न्यायालय है, न्यायालय को पूरा अधिकार होता है। अपना वहां सरकार
कोई इंटरफ़ेयर नहीं करती है। इसीलिए मुझे लगता है कि ये संविधान में गवर्नमेंट न्यायपालिका और ये मतलब ये इलेक्शन कमीशन भी है और जो पत्रकारिता है तो पत्रकारिता को भी मतलब एक स्वतंत्र अधिकार दे दिया है। तो यहां तस्वीर के दो पहलू हैं। विपक्ष कह रहा है प्रक्रिया पर सवाल है। अठावले कह रहे हैं आयोग स्वतंत्र है लेकिन उठे मुद्दों को देखा जाएगा। क्या सरकार की तरफ से जांच या समीक्षा की बात आगे बढ़ती है? यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना ही तथ्य है कि यह विवाद अब केवल विपक्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल से राजनीतिक तनाव की खबर है।
टीएमसी विधायक कुणाल घोष की कार पर हमला किए जाने की खबर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक ममता बनर्जी की बैठक में शामिल होने जा रहे कुणाल घोष की गाड़ी पर अंडे और पत्थर फेंके गए और गाड़ी के शीशे भी तोड़े गए। NDTV की ताजा खबरों में भी इस घटना का उल्लेख है। घटना की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। बंगाल में चुनावी राजनीति पहले से ही बेहद प्रतिस्पर्धी है। लेकिन किसी जनप्रतिनिधि की गाड़ी पर हमला या सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान हिंसक माहौल, लोकतांत्रिक राजनीति के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। इस मामले में आरोप किस पर
है? घटना के पीछे कौन था? और पुलिस की जांच क्या कहती है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही साफ होगा। इसलिए अभी किसी राजनीतिक दल या समूह को जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी। लेकिन सवाल जरूर रहेगा। राजनीतिक असहमति आखिर कब सड़क पर हमले में बदल जाती है। पंजाब कांग्रेस में संगठन को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन 25 सितंबर के रोष मार्च ने दिखाया कि अंदरूनी मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट को मार्च की अगुवाई करनी लेकिन वे चंडीगढ़ नहीं पहुंच सके। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह च्नी भी मार्च में नजर नहीं
आए हैं। विधायक सुखपाल खरा भी कार्यक्रम से दूर रहे। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने वरिष्ठ नेताओं को सम्मान देने और साथ लेकर चलने की बात कही। कुछ नेताओं ने भी मंच से एकता का संदेश दिया। लेकिन राजनीति में मंच की तस्वीर और संगठन की अंदरूनी स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं होती है। एबीपी की रिपोर्ट के मुताबिक च्नी और वडिंग के बीच मतभेद की चर्चा पहले से रही है। तो कांग्रेस की चुनौती सिर्फ बीजेपी या आपसे मुकाबला करने की नहीं है। पहली चुनौती अपने ही संगठन को एक लाइन में खड़ा करने की है। प्रशांत किशोर अब बिहार की राजनीति से आगे दिल्ली की तरफ भी संगठन
खड़ा करने की तैयारी में है। जन स्वराज पार्टी दिल्ली में अपना संगठन तैयार करने के लिए एक कमेटी बनाने जा रही है। लाइव हिंदुस्तान के मुताबिक इस कमेटी के काम दिल्ली में पार्टी का संगठन और टीम तैयार करना होगा। जन स्वराज ने अगस्त 2026 में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीता था। द फेडरल की रिपोर्ट भी बांकीपुर की जीत के बाद प्रशांत किशोर की दिल्ली में राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की योजना पर केंद्रित है। दिल्ली में पहले से बीजेपी और आपकी सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। कांग्रेस भी मौजूद है। ऐसे में किसी तीसरे राजनीतिक संगठन के लिए जगह बनाना आसान नहीं होगा।
लेकिन प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। बांकेपुर की जीत ने उन्हें दिल्ली में संगठन बनाने का एक नया राजनीतिक अवसर जरूर दिया है। अब एक ऐसी तस्वीर जिसने सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय पार्क में जैन के साथ भजन क्लबिंग कार्यक्रम में शामिल हुए। वीडियो में प्रधानमंत्री डपली बजाते दिखाई दिए। कार्यक्रम पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के मौके पर हुआ था। प्रधानमंत्री की इस तस्वीर पर कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने चुनाव आयोग से
जुड़े विवाद को लेकर तंज किया। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री के पास ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने का समय है। लेकिन चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों का जवाब देने का समय नहीं है। बीजेपी ने पलटवार करते हुए कांग्रेस पर भारतीय भक्ति और भजन परंपरा का मजाक उड़ाने का गंभीर आरोप लगाया है। अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर बताएं। वीडियो पसंद आया हो तो इसे लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें।

