चीनी संकट पर अशोक गुलाटी का हमला: 1990 के सोवियत रूस जैसे नियम
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चीनी संकट पर अशोक गुलाटी का हमला: 1990 के सोवियत रूस जैसे नियम

कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गुलाटी का बड़ा बयान: एथनॉल डायवर्जन, 100% आयात शुल्क और सरकारी नियंत्रण के कारण देश में गहराया चीनी संकट।


AI with Sanket: देश में चीनी के घटते स्टॉक, एथनॉल डायवर्जन और चीनी क्षेत्र पर सख्त सरकारी नियंत्रण को लेकर प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गुलाटी (विशिष्ट प्रोफेसर, ICRIER) ने सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।


'द फ़ेडरल' के विशेष शो AI with Sanket में डॉ. गुलाटी के इंटरव्यू का विस्तृत विश्लेषण पेश किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि उत्पादन में गिरावट के पूर्वानुमानों के बावजूद सरकार के सही समय पर कदम न उठाने और एथनॉल ब्लेंडिंग के दबाव के कारण देश में चीनी संकट गहराया है।

"चीनी क्षेत्र में हम 1990 से पहले के सोवियत रूस जैसे ढांचे में जी रहे हैं"
डॉ. अशोक गुलाटी ने चीनी उद्योग में अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि देश में गन्ना मूल्य से लेकर चीनी के दाम और मिलों से बाजार में आने वाली सप्लाई तक, हर चीज सरकार तय करती है।

इलास्टिक मांग और 10% डायवर्जन का असर: गुलाटी ने कहा कि जब चीनी का उत्पादन घट रहा हो और स्टॉक पिछले 10 साल के सबसे निचले स्तर पर हो, तब महज 9-10% गन्ने का एथनॉल में डायवर्जन भी बाजार में चीनी की कीमतों को 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।

त्योहारी सीजन में कीमतें बढ़ना तय: त्योहारों के दौरान चीनी की मांग पूरी तरह से बेलोचदार (Inelastic) होती है। ऐसे समय में सप्लाई में 10% की कमी भी कीमतों में भारी उछाल लाती है, और ठीक यही बाजार में देखने को मिला है।

100% आयात शुल्क और वायदा बाजार पर रोक बनी 'परफेक्ट स्टॉर्म'
डॉ. गुलाटी ने बताया कि मई-जून के महीनों में ही यह साफ हो गया था कि इस साल चीनी का उत्पादन 30 मिलियन टन से कम रहेगा (लगभग 3 से 4 मिलियन टन की गिरावट)। इसके बावजूद सरकार ने समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए:

आयात शुल्क घटाने में विफलता: भारत में चीनी पर आयात शुल्क (Import Duty) 100% की रिकॉर्ड ऊंचाई पर बनाए रखा गया। अगर सरकार समय रहते इस ड्यूटी को 100% से घटाकर 10% कर देती, तो व्यापारी समय पर चीनी आयात कर पाते और कमी को पूरा किया जा सकता था।

वायदा बाजार (Futures Market) पर प्रतिबंध: वायदा बाजार में हजारों व्यापारी लगातार उत्पादन का अनुमान लगाकर कीमतों और सप्लाई को संतुलित करते हैं। लेकिन वायदा व्यापार पर रोक और 100% ड्यूटी के चलते बाजार में 'सेल्फ-करैक्शन' (स्व-सुधार) का मौका ही नहीं मिला।

एथनॉल ब्लेंडिंग नीति में लचीलेपन की जरूरत
सरकार के इस दावे पर कि एथनॉल नीति के कारण चीनी की कमी नहीं हुई है, डॉ. गुलाटी ने वरिष्ठ पत्रकार हरीश दामोदरन के आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि नवंबर से जुलाई के बीच उत्पादित कुल एथनॉल का लगभग 32 प्रतिशत हिस्सा सीधे गन्ने से आया था, न कि केवल 9-10 प्रतिशत।

20% एथनॉल लक्ष्य में जल्दबाजी: डॉ. गुलाटी ने कहा कि संकट के समय 20% एथनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को घटाकर 15% या 10% पर लाया जा सकता था।

ब्राजील मॉडल का उदाहरण: ब्राजील जैसे देशों में पेट्रोल पंपों पर फ्लेक्सिबल विकल्प होते हैं ग्राहक अपनी मर्जी और कीमत के अंतर के आधार पर 10%, 20% या अधिक एथनॉल वाला ईंधन चुनते हैं। भारत को भी इस नीति को लेकर अधिक लचीला और बाजार-उन्मुख (Market-Oriented) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


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