BRICS 2026: दिल्ली घोषणापत्र पास, मोदी-जिनपिंग वार्ता में क्या हुआ?
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BRICS 2026: दिल्ली घोषणापत्र पास, मोदी-जिनपिंग वार्ता में क्या हुआ?

नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन संपन्न। जानिए 'नई दिल्ली घोषणापत्र', अमेरिका-इज़राइल पर कड़े रुख और पीएम मोदी व शी जिनपिंग की द्विपक्षीय वार्ता के मायने।


BRICS: राजधानी नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का आज (13 सितंबर) समापन हो रहा है। शिखर सम्मेलन का दूसरा दिन 'रेज़िलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' विषय पर खुली चर्चा के साथ आगे बढ़ रहा है। अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे कर चुके ब्रिक्स संगठन की अध्यक्षता इस वर्ष भारत के पास है। सम्मेलन के पहले दिन शनिवार को गहन कूटनीतिक रस्साकशी के बाद 'नई दिल्ली घोषणापत्र' पर सर्वसम्मति बनी, जिसमें पश्चिम एशिया संघर्ष पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच के गहरे मतभेदों को पाटते हुए एक संयुक्त रुख सामने रखा गया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक ने दोनों देशों के रिश्तों को एक नई दिशा देने का संकेत दिया है।


गाज़ा पर इज़राइल की तीखी आलोचना, यूक्रेन पर साधी चुप्पी
शनिवार को स्वीकार किए गए 'नई दिल्ली घोषणापत्र' में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गहरे विरोधाभास साफ दिखाई दिए। घोषणापत्र में गाज़ा में लगातार जारी हिंसा को लेकर इज़राइल की कड़े शब्दों में निंदा की गई और फ़िलिस्तीनी जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की पुरज़ोर वकालत की गई। हालांकि, पश्चिम एशिया पर कड़ा रुख अपनाने वाले इस दस्तावेज़ में रूस-यूक्रेन युद्ध का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जिसे कूटनीतिक हलकों में रूस के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है।

घोषणापत्र में बिना अमेरिका का नाम लिए पश्चिमी देशों की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला गया। ब्रिक्स देशों ने 'अंधाधुंध टैरिफ', गैर-टैरिफ रुकावटों और व्यापार-प्रतिबंधक कदमों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे एकतरफा फैसले वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) को बाधित कर रहे हैं और आर्थिक असमानता को बढ़ावा दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ जाकर लगाए जाने वाले 'एकतरफा प्रतिबंधों' और 'दबावकारी कदमों' का समूह ने स्पष्ट विरोध किया, जो सीधे तौर पर रूस और ईरान पर पश्चिमी पाबंदियों के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा दिखाता है।

मोदी-जिनपिंग वार्ता: 'प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार बनें'
सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय बातचीत हुई। विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत और चीन को अपने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नज़रिए से देखना चाहिए तथा आपसी मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति जिनपिंग के सामने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य और निरंतर विकास के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और सीमावर्ती क्षेत्रों में अमन-चैन और स्थिरता सबसे बुनियादी शर्त है। वहीं, चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर और सुदृढ़ बनाने के लिए चार सूत्री फॉर्मूला पेश किया। जिनपिंग ने ज़ोर देकर कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय साझेदार के रूप में देखना चाहिए और स्पष्ट उद्देश्यों के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

वैश्विक शासन सुधार के लिए मोदी का 10-सूत्रीय रोडमैप
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में बुनियादी बदलाव की मांग करते हुए ब्रिक्स के दायरे में 'ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म' के लिए 10-सूत्रीय रोडमैप पेश किया। भू-राजनीतिक संकटों और युद्धग्रस्त समुद्री मार्गों में नाविकों की सुरक्षा को लेकर भारत ने 'सीफेयरर्स इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क' (Seafarers’ Emergency Support Network) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, ताकि संकटग्रस्त क्षेत्रों में वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों के जीवन की रक्षा की जा सके। भारत की चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित यह सम्मेलन इस बात का गवाह बना कि वैश्विक दक्षिण (Global South) अब पश्चिमी आर्थिक दबावों के सामने अपनी स्वतंत्र और बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था बनाने के लिए तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है।


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