
'लोकतंत्र में लाठी नहीं, जवाबदेही चलेगी'—पुलिस कार्रवाई पर गोंसाल्विस का तीखा बयान
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने CJP प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर शीर्ष स्तर तक जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने स्वतंत्र जांच और संस्थागत सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने 20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को भारतीय लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। उनका कहना है कि यदि पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है, तो इसकी जवाबदेही केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि शीर्ष स्तर तक तय होनी चाहिए।
RAF की स्वीकारोक्ति को क्यों माना महत्वपूर्ण?
गोंसाल्विस का कहना है कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की आंतरिक रिपोर्ट में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग स्वीकार करना एक असाधारण घटना है। उनके अनुसार, उन्होंने अपने लंबे कानूनी जीवन में पहली बार किसी सुरक्षा एजेंसी को सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करते देखा कि कार्रवाई के दौरान गलती हुई।हालांकि, उनका मानना है कि केवल गलती स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। अगर इसके बाद भी किसी अधिकारी या निर्णय लेने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं होती, तो ऐसी स्वीकारोक्तियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।
जवाबदेही सबसे ऊपर तक तय होनी चाहिए
गोंसाल्विस का सबसे बड़ा तर्क यह है कि पुलिस कार्रवाई की राजनीतिक जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देशों में यदि प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग होता है, तो गृह मंत्री तक को राजनीतिक जिम्मेदारी लेनी पड़ती है।उनके अनुसार, भारत में अक्सर पुलिस कार्रवाई के बावजूद शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती। उनका मानना है कि इस मामले में बहस केवल तत्कालीन शिक्षा मंत्री तक सीमित नहीं रहनी चाहिए थी, बल्कि गृह मंत्रालय की भूमिका पर भी सवाल उठने चाहिए थे।
पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल
गोंसाल्विस का कहना है कि भारत में पुलिस व्यवस्था में हिंसा एक संस्थागत संस्कृति का रूप ले चुकी है। उनका आरोप है कि कई बार राजनीतिक नेतृत्व पुलिस बल का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए करता है और कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी उसी के अनुरूप काम करते हैं।
उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग कई बार कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत से अधिक दिखाई देता है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर आलोचना
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शुरुआती प्रतिक्रिया पर भी निराशा जताई। उनके अनुसार, पहले अदालत ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया, जबकि बाद में मुख्य न्यायाधीश ने यह कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का संवैधानिक अधिकार है और पुलिस की ज्यादती स्वीकार्य नहीं है।गोंसाल्विस का कहना है कि ऐसी घटनाओं में सर्वोच्च अदालत को स्वतः संज्ञान लेकर संबंधित अधिकारियों को तलब करना चाहिए था।उन्होंने यह भी कहा कि भारत में पत्र के माध्यम से जनहित याचिका (Epistolary Jurisdiction) दायर करने की परंपरा पहले से रही है, लेकिन इस मामले में उस व्यवस्था का प्रभावी उपयोग नहीं हुआ।
स्वतंत्र जांच की मांग
गोंसाल्विस का मानना है कि यदि जांच उसी पुलिस या सरकार के अधीन एजेंसियों से कराई जाएगी, जिन पर आरोप हैं, तो निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।उनके अनुसार, वास्तविक जवाबदेही तभी संभव है जब जांच किसी पूरी तरह स्वतंत्र संस्था से कराई जाए। हालांकि उन्होंने यह भी आशंका जताई कि सरकार ऐसी स्वतंत्र जांच की अनुमति शायद ही दे।
पहले के मामलों का जिक्र
उन्होंने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्षों बाद भी कथित पुलिस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। उनका मानना है कि इससे जवाबदेही की प्रक्रिया कमजोर होती है।
जनता के आंदोलन को बताया सबसे प्रभावी माध्यम
गोंसाल्विस का कहना है कि केवल अदालतों या सरकारी जांच से बदलाव नहीं आएगा। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण जन आंदोलन ही संस्थाओं को जवाबदेह बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं।उनका मानना है कि जब तक समाज लगातार दबाव नहीं बनाएगा, तब तक व्यवस्था में व्यापक सुधार संभव नहीं होगा।
पुलिस बल प्रयोग पर उनकी राय
उन्होंने कहा कि पुलिस अक्सर यह तर्क देती है कि बल प्रयोग अंतिम विकल्प होता है, लेकिन इस मामले में उनके अनुसार ऐसी स्थिति नहीं थी। उनका मानना है कि पुलिस को संयम, प्रशिक्षण और पेशेवर तरीके से भीड़ नियंत्रण करना चाहिए, जैसा कई अन्य लोकतांत्रिक देशों में देखने को मिलता है।उन्होंने लंदन दंगों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लंबे समय तक हिंसा के बावजूद पुलिस ने अनुशासन बनाए रखा और व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई नहीं की।
भारतीय पुलिस व्यवस्था पर चिंता
गोंसाल्विस ने कहा कि भारत में पुलिस व्यवस्था में हिंसक प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है। उन्होंने अपने कार्यालय के एक युवा वकील के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार का उदाहरण देते हुए कहा कि यह केवल बड़े आंदोलनों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि सामान्य नागरिक भी इसका सामना कर सकते हैं।
न्यायपालिका से सीमित उम्मीद
लेख के अंत में गोंसाल्विस ने कहा कि उन्हें फिलहाल न्यायपालिका से बड़े संस्थागत सुधारों की उम्मीद कम दिखाई देती है। उनका मानना है कि अदालतें कुछ टिप्पणियां या निर्देश तो दे सकती हैं, लेकिन क्या शीर्ष अधिकारियों या राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही तय होगी, इस पर उन्हें संदेह है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहते हैं कि भविष्य में उनकी आशंकाएं गलत साबित हों और वास्तव में निष्पक्ष कार्रवाई तथा संस्थागत सुधार देखने को मिलें।

