
संसद से सड़क तक नीट पर रार, जंतर-मंतर पुलिसिया कार्रवाई पर HC सख्त
दिल्ली HC ने केंद्र और पुलिस से 4 हफ्ते में मांगा जवाब; CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का सख्त आदेश; वकीलों ने लगाए छेड़छाड़ और कील लगे डंडों के इस्तेमाल के गंभीर आरोप।
CJP Protest: जंतर-मंतर पर नीट (NEET) अभ्यर्थियों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं पर हुई दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का मामला अब अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिसिया कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और बर्बरता के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है। इसके साथ ही, अदालत ने Standard Operating Procedure (SOP) के तहत घटना से जुड़े तमाम CCTV फुटेज और वीडियोग्राफी को तुरंत प्रभाव से सुरक्षित रखने का सख्त आदेश जारी किया है।
अदालत में पुलिस बर्बरता के वीडियो सबूत
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन, हरिहरन और विकास सिंह ने पीठ के समक्ष पुलिसिया कार्रवाई के 130 से अधिक वीडियो साक्ष्यों का हवाला दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने कोर्ट को बताया कि कई पुलिसकर्मी बिना वर्दी और नेम टैग के भीड़ में शामिल थे। उन्होंने आरोप लगाया कि एक वीडियो में एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा पास से गुजर रही एक निहत्थी महिला को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं।
वरिष्ठ वकील हरिहरन ने दलील दी कि प्रदर्शनकारी छात्र पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रख रहे थे और वहां धारा 144 (BNSS धारा 163) भी लागू नहीं थी। इसके बावजूद पुलिस ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या सीटी बजाए क्रूरतापूर्वक बल प्रयोग किया। कोर्ट को बताया गया कि छात्रों पर पेलेट्स, इलेक्ट्रिक बैटन और कील लगे डंडों से हमला किया गया, जिसमें 90 से अधिक छात्र घायल हुए हैं। इसके अलावा, वकीलों ने एक वाहन में पत्थरों से भरी बोरियों का वीडियो दिखाते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के लिए साजिश के तहत फर्जी पथराव का ताना-बाना बुना गया।
'गैरकानूनी भीड़ से निपटने के भी नियम होते हैं' - हाई कोर्ट
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने याचिकाओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए इन्हें 'पब्लिसिटी स्टंट' करार दिया। उन्होंने दलील दी कि भीड़ ने हिंसक होकर पथराव किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और पीड़ितों को जनहित याचिका की जगह मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करानी चाहिए थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने ASG की इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने टिप्पणी की:
"यह कोई अकेली घटना नहीं है। अगर यह वास्तव में एक अनलॉफुल असेंबली (गैरकानूनी सभा) भी थी, तब भी कानून में उससे निपटने की एक तय प्रक्रिया होती है। आप इस मामले में जनहित याचिका के औचित्य पर सवाल नहीं उठा सकते।"
मेदांता अस्पताल शिफ्ट होंगे सोनम वांगचुक
उधर, पिछले एक महीने से आंदोलन की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए हाई कोर्ट ने उन्हें सफदरजंग अस्पताल से उनकी पसंद के मेदांता अस्पताल शिफ्ट करने का आदेश दिया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर सहमति जताते हुए अनुरोध किया कि डॉक्टरों की लिखित अनुमति के बिना उन्हें डिस्चार्ज न किया जाए।
संसद के भीतर नीट पेपरलीक और पुलिसिया लाठीचार्ज पर मचे घमासान के बीच अब हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
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