पहला कारण जहां सरकारी सूत्रों के हवाले से 'राष्ट्रीय सुरक्षा' की बात कर रहा है, वहीं दूसरा कारण सीधे तौर पर पंजाब में आसन्न विधानसभा चुनावों के सियासी नफा-नुकसान और वोटों के ध्रुवीकरण से जुड़ा हुआ है।
'एंटी-इंडिया' ताकतों के हाथ हथियार लगने का डर
आधिकारिक और खुफिया सूत्रों के मार्फ़त आ रही जानकारी के मुताबिक, फिल्म को हटाए जाने के पीछे सबसे बड़ी तात्कालिक चिंता देश की सुरक्षा और संप्रभुता थी।
विदेशी जमीन से प्रोपेगैंडा की आशंका: सूत्रों का कहना है कि फिल्म 'सतलुज' में 1980 और 90 के दशक के पंजाब के उग्रवाद के दौर को दिखाया गया है। फिल्म के कुछ हिस्से और दृश्य ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल विदेशों में बैठे भारत विरोधी तत्व और अलगाववादी ताकतें भारत की छवि को वैश्विक स्तर पर धूमिल करने के लिए कर सकती थीं।
काल्पनिक बनाम ऐतिहासिक सच का नैरेटिव: खुफिया एजेंसियों को अंदेशा था कि फिल्म में दिखाए गए कुछ संवेदनशील दृश्यों को सोशल मीडिया पर क्रॉप करके प्रोपेगैंडा टूल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे राज्य में एक बार फिर पुरानी कड़वाहट और नैरेटिव को हवा मिल सकती है।
पंजाब चुनाव और 'सच' से डरने की सियासी मजबूरी?
दूसरी तरफ, पंजाब की जमीनी सियासत को समझने वाले विश्लेषक और विपक्षी दल इसे सीधे तौर पर पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं।
वोट बैंक और ध्रुवीकरण का डर: विपक्षी दलों आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) का सीधा आरोप है कि सरकार को डर है कि अगर यह फिल्म पंजाब के घर-घर तक पहुंच गई, तो चुनाव से ठीक पहले माहौल बदल सकता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के संघर्ष की कहानी पंजाबियों के भीतर भावनात्मक उबाल पैदा कर सकती है, जो सत्ताधारी गठबंधन के सियासी समीकरणों को बिगाड़ सकता है।
इतिहास पर सेंसरशिप: आप सांसद मलविंदर सिंह कांग और अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने साफ कहा कि जब कोई सरकार अपने ही इतिहास से डरने लगती है, तो वह बैन का सहारा लेती है। विपक्ष का दावा है कि बीजेपी पंजाब के कड़वे सच का सामना करने से कतरा रही है और चुनाव में नुकसान के डर से इस आवाज को दबाया गया है।
3 साल की सेंसर जंग और दिलजीत का 'खुला चैलेंज'
यह फिल्म कोई नई नहीं है। मूल रूप से 'पंजाब 95' (Punjab 95) के नाम से बनी यह फिल्म 2022 से सेंसर बोर्ड के दफ्तर में धूल फांक रही थी। मेकर्स का दावा है कि बोर्ड ने इस पर 127 कट्स लगाने की शर्त रखी थी। जब थियेटरों के रास्ते बंद कर दिए गए, तो इसे नाम बदलकर ओटीटी पर लाया गया, लेकिन यहाँ भी 'सेंसरशिप' की अदृश्य कैंची चल गई।
फिल्म के हटने से भड़के दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम लाइव पर सीधे व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहा, "मैं अंधेरे को चुनौती देता हूँ। जो 'सतलुज' के साथ हुआ, वही भाई जसवंत सिंह खालरा के साथ भी हुआ था। इंटरनेट पर जो एक बार आ गया, वो मिटता नहीं। तुम मुझे जितना चाहे परेशान कर लो, मैं मरते दम तक पंजाब के साथ खड़ा हूँ।"
भाजपा क्यों डर रही है?
केंद्र सरकार द्वारा जिस तरह से ZEE 5 से सतलुज फिल्म को हटाया गया है, उसको देखते हुए सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर भाजपा क्यों डर रही है? जिस दौर की ये घटना है, उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार थी, ऐसे में कांग्रेस जब इस फिल्म को लेकर चिंतित नहीं है तो फिर भाजपा क्यों? सूत्रों का कहना है कि इस डर की एक वजह ये हो सकती है कि उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह थे, फिल्म में उनकी हत्या को भी दर्शाया गया है। वर्तमान की बात करें तो बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू भाजपा में है और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। कयास है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बिट्टू को बड़ी ज़िम्मेदारी भी मिलने वाली है। विपक्षियों का कहना है कि बहुत संभव है कि इस एक वजह से भाजपा को ज्यादा चिंता हो रही है।