शरद पवार का रिकॉर्ड तोड़ देवेंद्र फडणवीस ने रचा इतिहास, लेकिन क्या दिल्ली की सियासत बढ़ाएगी मुश्किलें?
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शरद पवार का रिकॉर्ड तोड़ देवेंद्र फडणवीस ने रचा इतिहास, लेकिन क्या दिल्ली की सियासत बढ़ाएगी मुश्किलें?

महाराष्ट्र की राजनीति में देवेंद्र फडणवीस ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल में उन्होंने राज्य के सबसे दिग्गज नेता शरद पवार के 6.6 साल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।


महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कार्यकाल के मामले में राज्य के सबसे कद्दावर और दिग्गज नेता शरद पवार को पीछे छोड़ दिया है। शरद पवार ने 1978 से 1995 के बीच चार अलग-अलग कार्यकालों में कुल मिलाकर लगभग 6.6 साल (6 साल 7 महीने) मुख्यमंत्री के रूप में काम किया था। फडणवीस अब दो कार्यकालों (2014-2019 और 2024 से अब तक) को मिलाकर इस आंकड़े को पार कर चुके हैं।

यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब महाराष्ट्र के गलियारों में दो बातें तेजी से चल रही हैं। पहली यह कि शरद पवार की एनसीपी (NCP-SP) का झुकाव फडणवीस के नेतृत्व वाली बीजेपी की तरफ हो सकता है, और दूसरी यह कि दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व फडणवीस को केंद्र की राजनीति में लाने पर विचार कर रहा है। ऐसे में शरद पवार और देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक सफर की तुलना बेहद दिलचस्प हो जाती है।

दो अलग विचार, दो अलग पृष्ठभूमियां

शरद पवार और देवेंद्र फडणवीस के करियर और शैली में ज़मीन-आसमान का अंतर है:

विचारधारा: शरद पवार उदारवादी लोकतांत्रिक (Liberal Democratic) परंपरा के नेता रहे हैं, जबकि देवेंद्र फडणवीस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा की देन हैं, जो उदारवाद की पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग मानी जाती है।

क्षेत्रीय पकड़: पवार पश्चिमी महाराष्ट्र के समृद्ध और चीनी-सहकारिता (Sugarcane Belt) वाले इलाके से आते हैं। वहीं, फडणवीस किसानों की आत्महत्या और सूखे के लिए चर्चित विदर्भ क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं।

राजनीतिक शुरुआत: पवार की ताकत ग्रामीण इलाकों और जमीनी नेटवर्क में रही है, जबकि फडणवीस ने अपनी राजनीति की शुरुआत नागपुर जैसे बड़े शहरी माहौल से की, जहाँ वे काफी कम उम्र में मेयर भी बने।

सत्ता तक पहुँचने का रास्ता: 1978 में शरद पवार ने कांग्रेस से बगावत कर महज 38 साल की उम्र में अपनी खुद की रणनीतियों और जोड़-तोड़ से 'पुलोद' (PDF) सरकार बनाई और राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। इसके विपरीत, 2014 में 44 वर्ष की उम्र में फडणवीस का मुख्यमंत्री बनना दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बनाई रणनीति का हिस्सा था, जो नितिन गडकरी को राज्य की राजनीति से दूर रखना चाहते थे।

जातीय समीकरण: शरद पवार महाराष्ट्र की पारंपरिक सत्ताधारी मराठा जाति से आते हैं, जबकि फडणवीस ब्राह्मण समुदाय से हैं। राज्य में मनोहर जोशी के बाद फडणवीस दूसरे ऐसे ब्राह्मण नेता हैं जो इतने लंबे समय तक सीएम पद पर टिके रहे हैं।

पवार का 38 साल की उम्र में सबसे युवा सीएम बनने का रिकॉर्ड आज भी अटूट है। हालांकि, फडणवीस के नाम एक अलग रिकॉर्ड दर्ज है। 2022 से 2024 के बीच जब महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिरी और शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे को सीएम बनाया गया, तो फडणवीस को पार्टी के निर्देश पर उपमुख्यमंत्री का पद संभालना पड़ा था। पवार ने अपने पूरे करियर में कभी डिप्टी सीएम का पद स्वीकार नहीं किया।

सौम्य प्रशासक से 'आक्रामक रणनीतिकार' तक का सफर

अपने 12 साल के मुख्य राजनीतिक दौर में फडणवीस ने खुद को एक ऐसा नेता साबित किया है जो सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उन्होंने अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं—जैसे एकनाथ खड़से, पंकजा मुंडे, सुधीर मुनगंटीवार और विनोद तावड़े के पंख काटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब 2014 में वे पहली बार बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के मुख्यमंत्री बने, तो उनका पहला 5 साल का कार्यकाल सुशासन और विकास पर केंद्रित था। वसंतराव नाइक के बाद वे लगातार 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले महाराष्ट्र के दूसरे मुख्यमंत्री बने थे। उस वक्त उनकी छवि एक पढ़े-लिखे, सौम्य और नियम-कायदों से चलने वाले नेता की थी।

लेकिन 2019 के बाद परिस्थितियां बदलीं। जब शिवसेना ने बीजेपी से 25 साल पुराना नाता तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली, तो फडणवीस का रुख पूरी तरह बदल गया। उन्होंने कट्टर हिंदुत्व का चोला पहना और विपक्ष को निशाना बनाना शुरू किया।

शिवसेना में तोड़फोड़: उन्होंने एकनाथ शिंदे और 40 विधायकों को साधकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना को दो भागों में तोड़ दिया। इतना ही नहीं, असली शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' का चुनाव चिह्न भी शिंदे गुट को दिलवाने में अहम भूमिका निभाई।

'मैं वापस आऊंगा' का तंज और वापसी: 2019 में उनका मशहूर बयान "मी पुन्हा येईन" (मैं वापस आऊंगा) काफी ट्रोल हुआ था। लेकिन जून 2022 में उन्होंने एमवीए सरकार गिरा दी। हालांकि, उन्हें खुद सीएम बनने के बजाय शिंदे का डिप्टी बनना पड़ा, जिससे उनकी काफी जगहंसाई हुई।

2024 का ऐतिहासिक प्रदर्शन: 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की 48 में से सिर्फ 9 सीटें आईं, जिससे फडणवीस के ग्राफ पर सवाल उठे। लेकिन महज छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने ज़बरदस्त वापसी कराई और बीजेपी को 288 में से 132 सीटें दिलवाईं। इसी सफलता के दम पर दिल्ली को उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी पड़ी और शिंदे को डिप्टी सीएम के पद पर डिमोशन झेलना पड़ा।

एकनाथ शिंदे और दिल्ली आलाकमान से अंदरूनी जंग

2024 में दोबारा सीएम बनने के बाद भी फडणवीस की राह आसान नहीं रही है। एकनाथ शिंदे और उनके बीच वर्चस्व की जंग लगातार जारी है। शिंदे की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से करीबी किसी से छिपी नहीं है। शिंदे अक्सर कैबिनेट बैठकें छोड़कर दिल्ली के चक्कर लगाते हैं, जिसे राजनीति के जानकार फडणवीस पर लगाम कसने की शाह की रणनीति मानते हैं।

इस बैलेंस को तोड़ने के लिए फडणवीस ने अजीत पवार की अगुवाई वाली एनसीपी को महायुति में शामिल करवाया, ताकि बीजेपी की निर्भरता शिंदे की शिवसेना पर कम हो सके। इसके जवाब में शिंदे ने हाल ही में उद्धव गुट के 6 सांसदों को अपने साथ जोड़कर (जिसे 'ऑपरेशन टाइगर' कहा गया) लोकसभा में अपनी संख्या 12 कर ली और केंद्र में अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ा ली।

इतना ही नहीं, मराठा आरक्षण को लेकर मनोज जरांगे पाटिल के आंदोलन ने भी फडणवीस के लिए मुश्किलें खड़ी कीं। एक ब्राह्मण सीएम होने के नाते उन पर तीखे हमले हुए, लेकिन फडणवीस ने बेहद संयम और धैर्य से इस आंदोलन की आंच को ठंडा किया।

भाषा का गिरता स्तर और हिंदुत्व का आक्रामक कार्ड

अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने और संघ (RSS) को खुश रखने के लिए फडणवीस ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू किया और 'सकल हिंदू समाज' जैसे संगठनों को खुली छूट दी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अपनी सौम्य छवि को छोड़कर फडणवीस ने हाल के दिनों में काफी आक्रामक और तल्ख भाषा का इस्तेमाल शुरू किया है। विधानसभा के भीतर और बाहर उनके कुछ बयान ("भाड़े के टट्टे" और "देख लूँगा") सोशल मीडिया पर काफी ट्रॉल हुए। कई जानकारों का कहना है कि बीजेपी के मौजूदा राजनीतिक ढांचे में खुद को बनाए रखने के लिए फडणवीस ने जानबूझकर यह तीखा और आक्रामक रवैया अपनाया है।

क्या दिल्ली बुलाए जाएंगे फडणवीस?

देवेंद्र फडणवीस की नज़रें हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय परिदृश्य पर रही हैं। बचपन से आरएसएस से जुड़ाव, प्रशासनिक पकड़, तेजतर्रार छवि और युवा उम्र उन्हें भविष्य की बीजेपी में एक मजबूत दावेदार बनाती है।

संघ (RSS) भी उन्हें दिल्ली के बड़े फ्रेम में देखना चाहता है। 2012 में नितिन गडकरी के दिल्ली में विफल रहने के बाद, संघ इस बार फडणवीस के रूप में अपना एक मजबूत स्वयंसेवक दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व (शायद 2029 के बाद) में देखना चाहता है।

लेकिन हाल ही में चल रही अटकलें कि शरद पवार की एनसीपी (NCP-SP) एनडीए में शामिल हो सकती है—फडणवीस के लिए नई चिंता का सबब बन सकती हैं। अगर पवार की एनसीपी सरकार में शामिल होती है, तो वित्त मंत्रालय जैसे अहम विभाग फडणवीस के हाथ से निकल सकते हैं।

साथ ही, मोदी-शाह की जोड़ी संघ के किसी भी ऐसे फैसले को आसानी से स्वीकार नहीं करेगी जो उनके अपने नियंत्रण को चुनौती दे। इसलिए चर्चा यह भी है कि फडणवीस का कद छोटा करने के लिए उन्हें दिल्ली में कोई मंत्री पद देकर महाराष्ट्र की कमान वापस शिंदे को दी जा सकती है।

फडणवीस खुद कह चुके हैं कि वे 2029 तक महाराष्ट्र में ही रहेंगे। वे फिलहाल दिल्ली जाने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं और राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनी महत्वाकांक्षाओं, पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और दिल्ली के इशारों के बीच देवेंद्र फडणवीस अपनी भावी राजनीति की पटकथा कैसे लिखते हैं।

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