अलकनंदा में 219 हैंगिंग ग्लेशियर, भारत के 39 जिलों पर बाढ़ का खतरा
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अलकनंदा में 219 हैंगिंग ग्लेशियर, भारत के 39 जिलों पर बाढ़ का खतरा

1990 के बाद हिमालय में बनीं 1052 नई ग्लेशियल झीलें। बद्रीनाथ से 1.4 किमी ऊपर 3 खतरनाक ग्लेशियर, GLOF की चपेट में आ सकते हैं 6 राज्यों के 39 जिले


Nepal Flood: नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा अलार्म बजाया है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (Wadia Institute of Himalayan Geology) समेत तीन प्रमुख शोध संस्थानों के नवीनतम अध्ययन में हिमालयी क्षेत्र की 221 ग्लेशियल झीलों को अत्यधिक संवेदनशील माना गया है। इनके फटने से 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) की विभीषिका आ सकती है, जिसका सीधा प्रभाव भारत के 6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 39 जिलों पर पड़ सकता है।


इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 'हैंगिंग ग्लेशियर' (Hanging Glaciers) की पहचान की गई है, जिनके टूटने से बद्रीनाथ, माणा और चमोली के निचले इलाकों में भारी तबाही की आशंका जताई गई है।

1. 1990 के बाद बनीं 1,052 नई ग्लेशियल झीलें
ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पीछे हटने से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की संख्या और आकार में तेजी से बढ़ोतरी हुई है:

झीलों का दायरा: रिसर्च के अनुसार, हिमालय में कुल 8,357 से 9,280 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। 1990 के बाद से अब तक 1,052 नई झीलें बन चुकी हैं।

क्षेत्रफल में वृद्धि: पुरानी झीलों के क्षेत्रफल में 17% से 76% तक की बढ़ोतरी देखी गई है। सबसे तीव्र वृद्धि 2010 से 2020 के बीच 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर दर्ज की गई।

घाटीवार स्थिति:

कोसी घाटी: 1,125 झीलें (जिनमें 47 सबसे संवेदनशील हैं)।

यारलुंग जांगबो (तिब्बत): 773 झीलें।

मानस घाटी (भूटान): 715 झीलें।

ऊपरी सिंधु घाटी: 619 झीलें।

2. भारत के संवेदनशील क्षेत्र: 6 राज्यों के 39 जिलों पर असर
शोध में चेतावनी दी गई है कि नेपाल, तिब्बत और भूटान की झीलों से आने वाला उफान भारत के निचले (Downstream) क्षेत्रों को जलमग्न कर सकता है।

प्रमुख संवेदनशील नदियां: भारत में चिनाब, झेलम, तीस्ता और ब्यास नदी घाटियां सबसे ज्यादा खतरे के निशान पर हैं।

प्रभावित क्षेत्र: जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और असम के 39 जिले इस खतरे की जद में हैं। बाढ़ के मार्ग में आने वाली सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और घनी आबादी पर सीधा संकट है।

3. 491 वर्षों का इतिहास: 254 बार फटीं ग्लेशियल झीलें
वैज्ञानिकों ने 1533 से 2024 तक के 491 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर बताया कि इस दौरान 254 बार GLOF की घटनाएं दर्ज की गईं।

इनमें से 72.4% (184 घटनाएं) उन्हीं क्षेत्रों में हुईं, जिन्हें उच्च या अति-उच्च खतरे वाले क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया था।

अधिकांश घटनाएं पूर्वी और मध्य हिमालयी क्षेत्रों से जुड़ी हैं, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

4. उत्तराखंड पर दोहरा खतरा: अलकनंदा में 219 'हैंगिंग ग्लेशियर'
उत्तराखंड के लिए यह अध्ययन अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि यहां सिर्फ झीलों के फटने का ही नहीं, बल्कि खड़ी ढलानों पर लटके 'हैंगिंग ग्लेशियरों' के टूटने का भी जोखिम है।

अस्थिर बर्फ का भंडार: अलकनंदा बेसिन के 848 ग्लेशियरों में से 219 हैंगिंग ग्लेशियर हैं, जो 71.7 वर्ग किमी में फैले हैं। इनमें 0.74 घन किमी अस्थिर बर्फ मौजूद है।

विष्णुगंगा में सर्वाधिक जोखिम: अलकनंदा की सहायक नदी विष्णुगंगा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर पाए गए हैं।

बद्रीनाथ-माणा से 1.4 किमी ऊपर खतरा: बद्रीनाथ और माणा क्षेत्र के ठीक ऊपर तीन ग्लेशियर स्थित हैं। सबसे नजदीकी ग्लेशियर आबादी से महज 1.4 किमी दूर है, जिसमें कई दरारें (Crevasses) देखी गई हैं।

जोखिम वाले स्थल: यदि ये ग्लेशियर टूटते हैं तो बद्रीनाथ, माणा, हनुमान चट्टी, घांघरिया और नीलकंठ बेस कैंप क्षेत्र सीधे मलबे और बर्फ के सैलाब की चपेट में आ सकते हैं।

5. खतरे के रास्ते में 120% बढ़ा निर्माण (2000-2030)
अध्ययन की सबसे गंभीर रिपोर्ट यह है कि एक तरफ प्राकृतिक जोखिम बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील क्षेत्रों में इंसानी गतिविधियां अनियंत्रित तरीके से बढ़ रही हैं:

अलकनंदा बेसिन में 2000 से 2030 के बीच निर्मित क्षेत्र (Built-up Area) में 120% की वृद्धि का अनुमान है।

संभावित बर्फीले बहाव के रास्ते में निर्माण क्षेत्र 8,025 वर्ग मीटर से बढ़कर 1,51,800 वर्ग मीटर होने की आशंका है, जबकि प्रभावित आबादी 380 से बढ़कर 8,540 तक पहुंच सकती है।

6. वैज्ञानिकों के सुझाव और बचाव के उपाय
वैज्ञानिकों का कहना है कि उच्च जोखिम वाले ग्लेशियरों की तुरंत पहचान कर उनकी 24/7 निगरानी (Real-time Monitoring) की जानी चाहिए:

तकनीक का इस्तेमाल: सैटेलाइट इमेजरी के साथ-साथ धरातल पर कैमरे, ग्राउंड रडार, बर्फ की आंतरिक हलचल मापने वाले सेंसर और डॉप्लर रडार स्थापित किए जाएं।

अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): खतरे का पूर्व संकेत मिलते ही प्रभावित मार्गों को बंद करने और निचले इलाकों से लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की एसओपी (SOP) बनाई जाए।

इन्फ्रास्ट्रक्चर नियंत्रण: बर्फीले बहाव और बाढ़ के प्राकृतिक रास्तों में नए निर्माण कार्यों पर सख्त पाबंदी लगाई जाए।


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