
अमेरिका पर भरोसे की कीमत? मोदी सरकार क्यों बदल रही विदेश नीति की दिशा
भारत की विदेश नीति ने दशकों में गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता से लेकर अमेरिका के साथ करीबी साझेदारी तक कई अहम बदलाव देखे हैं। मोदी सरकार के दौर में राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए क्या भारत की पारंपरिक नैतिक और स्वतंत्र कूटनीतिक आवाज कमजोर हुई है।
क्या मोदी सरकार का अमेरिका के साथ प्रेम-संबंध खत्म हो गया है? कई जानकारों का कहना है कि भारत अपनी विदेश नीति में बदलाव कर रहा है और उस झुकाव से खुद को दूर कर रहा है जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से नई दिल्ली का अमेरिका और उसके सहयोगियों की तरफ साफ़ तौर पर देखा गया था।
यह डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के बचे हुए समय को निकालने के लिए कोई रणनीतिक चाल है या वॉशिंगटन के खिलाफ कोई स्थायी सुरक्षा उपाय, यह अभी साफ़ नहीं है। स्थिति अभी भी अस्पष्ट है।
फिलहाल, भारत दोनों तरफ़ हाथ आज़माता हुआ दिख रहा है; वह 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) की पुरानी सोच को फिर से अपना रहा है, जिसे अब 'मल्टी-अलाइनमेंट' (कई देशों के साथ तालमेल) और 'पसंद की आज़ादी' जैसी आधुनिक शब्दावली में पेश किया जा रहा है।
भारत-अमेरिका संबंध सबसे निचले स्तर पर
यह पुनर्विचार तब हो रहा है जब ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद भारत-अमेरिका संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान सब कुछ सुचारू रूप से चला, लेकिन उनके दूसरे कार्यकाल ने सरकार को चौंका दिया। "हाउडी मोदी" और "नमस्ते ट्रंप" वाले दिन बीत चुके थे, हालाँकि शुरुआत में सरकार ट्रंप की वापसी से खुश थी।
इसकी शुरुआत भारतीय आयात पर 50 प्रतिशत टैरिफ से हुई (जिसे बाद में कम कर दिया गया)। 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे, पाकिस्तान के साथ बढ़ते अमेरिकी संबंधों को लेकर चिंता, रूसी तेल को लेकर भारत पर दबाव और अमेरिकी कांग्रेस में लिंडसे ग्राहम एक्ट के पारित होने से नई दिल्ली में बेचैनी पैदा हो गई है।
इसके साथ ही H-1B वीज़ा और सख़्त इमिग्रेशन कानूनों का मुद्दा भी है। ज़ंजीरों में जकड़कर घर भेजे गए अवैध प्रवासियों की तस्वीर इस बात की साफ़ याद दिलाती है कि हालात कितने बिगड़ सकते हैं। गठबंधनों को लेकर ट्रंप का लेन-देन वाला नज़रिया और अमेरिकी वादों के टिके रहने को लेकर अनिश्चितता ने मोदी सरकार को हिलाकर रख दिया है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत के बीच भारत पर अपने कृषि क्षेत्र को खोलने का भारी दबाव है।
सवाल यह है कि क्या ट्रंप ने सिर्फ़ वॉशिंगटन पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने की सीमाओं को उजागर किया है, या फिर उन्होंने अमेरिका के बारे में भारत की सोच को ही पूरी तरह बदल दिया है।
अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने की गलती का एहसास
तलमीज़ अहमद जैसे पूर्व राजदूतों समेत कई जानकारों का मानना है कि भारत को यह समझ आ गया है कि अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहना एक गलती थी। वे मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकातों और भारत-चीन रिश्तों में आई नरमी की ओर इशारा करते हैं।
अमेरिका के भारी दबाव के बावजूद रूस के साथ भारत के करीबी रिश्ते; बंटे हुए अंतरराष्ट्रीय माहौल में ब्रिक्स (BRICS) का बढ़ता महत्व और SCO के साथ भारत का मज़बूत जुड़ाव - ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अपनी विदेश नीति में बदलाव कर रहा है।
वॉशिंगटन स्थित हडसन इंस्टीट्यूट की अपर्णा पांडे ने 'द फेडरल' को बताया, "भारत के लिए आदर्श विश्व व्यवस्था वह है जिसमें अमेरिका करीबी सहयोगी हो, रूस मज़बूत हो और चीन कमज़ोर हो। लेकिन भारत के सामने दुविधा यह है कि उसे एक ऐसी दुनिया का सामना करना पड़ रहा है जहाँ अमेरिका का व्यवहार अनिश्चित है, रूस कमज़ोर है और चीन ताकतवर है। इसलिए, भारत की मुख्य रणनीति 'मल्टी-अलाइनमेंट' (कई देशों से तालमेल), 'मल्टीलेटरलिज़्म' (बहुपक्षीय सहयोग) और 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' (रणनीतिक आज़ादी) की होगी।"
उन्होंने आगे कहा, "लेकिन भारत अमेरिका से मुँह नहीं मोड़ सकता। आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक कारणों से अमेरिका के साथ रिश्ते बहुत अहम हैं। और ऐसी विश्व व्यवस्था में जहाँ चीन ताकतवर है और रूस कमज़ोर, भारत को अमेरिका के करीब रहने की ज़रूरत है।"
असल बात यह है कि भारत अमेरिका का साथ नहीं छोड़ रहा है; क्वाड (Quad), रक्षा, तकनीक और ज़रूरी खनिजों (critical minerals) के क्षेत्र में सहयोग साथ-साथ चल रहा है।
न्यूयॉर्क स्थित इतिहासकार और सिटी यूनिवर्सिटी के हंटर कॉलेज और ग्रेजुएट सेंटर में प्रोफेसर मनु भगवान ने 'द फेडरल' को बताया, "आम तौर पर कहें तो भारत ने 'मल्टीलेटरलिज़्म' (शायद 'नॉन-अलाइनमेंट 3.0') का रास्ता अपनाया है। लेकिन स्पष्ट आदर्शों और बड़ी रणनीति के अभाव में, भारत का नज़रिया बेमेल और बिना किसी मकसद वाला लगता है।"
उन्होंने सवाल किया, "एक उदाहरण लें तो, दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद का उभार ज़ेनोफ़ोबिया (विदेशियों के प्रति नफ़रत) और अंध-राष्ट्रवाद पर टिका है, और अब इसमें प्रवासी और भारतीय मूल के लोग भी शामिल हो गए हैं। किसी को भी लगेगा कि भारतीय मूल के लोगों (PIOs) के प्रति नफ़रत दिल्ली में चिंता पैदा करेगी। क्या ऐसा हुआ है? भारत ने किस तरह प्रतिक्रिया दी है? क्या उन्होंने इस मुद्दे पर सार्वजनिक और निजी तौर पर चिंता जताई है?"
व्यावहारिक सोच
इस बदलाव का एक और पहलू है जो रणनीतिक चालों से कहीं आगे है। पहले, दुनिया में भारत की आवाज़ का महत्व उसकी आर्थिक या सैन्य ताकत से कहीं ज़्यादा था। आज़ादी की लड़ाई के दौरान गांधीजी के अहिंसा के विचारों से प्रभावित भारत की विदेश नीति में एक मज़बूत नैतिक सोच थी कि एक नए आज़ाद देश की ज़िम्मेदारी है कि वह इतिहास में सही पक्ष के साथ खड़ा हो।
भारत ने अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद और नस्लीय दमन के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों का साथ दिया। उसने रंगभेद का विरोध किया, आत्म-निर्णय के फ़िलिस्तीनी अधिकार का समर्थन किया और आज़ादी व स्वतंत्रता के संघर्षों का साथ दिया।
देश के भीतर, यह एक गरीब देश था, जो बंटवारे के घावों से जूझ रहा था और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहा था। फिर भी, इसने शीत युद्ध के दौरान एक-दूसरे के विरोधी शक्ति गुटों से दूरी बनाए रखने की कोशिश की और इस बात पर ज़ोर दिया कि उसकी विदेश नीति किसी महाशक्ति के प्रति वफ़ादारी के बजाय अपने सिद्धांतों और हितों से तय होगी।
इसलिए, उन दिनों रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब सिर्फ़ अपने विकल्प खुले रखना नहीं था। इसका मतलब भारत की अपनी आवाज़ में बात करने की आज़ादी भी थी।
जैसे-जैसे भारत के हित और महत्वाकांक्षाएँ बढ़ी हैं, यह आवाज़ लगातार ज़्यादा व्यावहारिक होती गई है। व्यावहारिक सोच रखने वालों के लिए, यह विदेश नीति का स्वाभाविक विकास है। देशों को सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के आधार पर मुश्किल फ़ैसले लेने होते हैं, न कि नैतिक रुख़ के आधार पर। यह बदलाव 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद और भारत के पड़ोस में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के दौरान साफ़ तौर पर दिखाई दिया।
भारत-इजराइल दोस्ती
यह समझते हुए कि म्यांमार की मिलिट्री सरकार (जंटा) के साथ बातचीत न करने के भारत के फैसले से बनी खाली जगह को चीन भर रहा था, राव ने गैर-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ बातचीत न करने के भारत के पुराने रुख को बदल दिया। उन्होंने उन मिलिट्री शासकों से संपर्क किया जिन्होंने चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया था और बर्मा की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेता और लोकतांत्रिक पार्टी की प्रमुख आंग सान सू की को गिरफ्तार कर लिया था।
सू की के पिता आंग सान, जवाहरलाल नेहरू के करीबी दोस्त थे। उन्होंने अपनी किशोरावस्था दिल्ली में बिताई थी और यहीं कॉलेज में पढ़ाई की थी। रिहा होने के बाद जब वह भारत आईं, तो उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को अपने सिद्धांतों से पीछे हटने के लिए सबके सामने फटकार लगाई।
उन्होंने ये बातें राजीव गांधी फाउंडेशन अवॉर्ड लेते समय कहीं, जब सोनिया गांधी और कांग्रेस सरकार के वरिष्ठ मंत्री सामने की कतार में बैठे थे। भारत मिलिट्री सरकार के साथ बातचीत की अपनी नीति पर कायम है।
हालांकि राव की राष्ट्रीय सुरक्षा वाली दलील में कुछ दम है, लेकिन मौजूदा सरकार द्वारा फिलिस्तीन के मुद्दे पर समर्थन कम करने - या कुछ लोग तो इसे समर्थन छोड़ना ही कहेंगे - का सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं था। 2014 तक, दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह भारत में भी फिलिस्तीन का मुद्दा काफी हद तक अपनी अहमियत खो चुका था, जब तक कि हमास ने इसे फिर से मुख्य चर्चा में नहीं ला दिया।
1992 में राव के समय इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध बेहतर होने के बाद से ही रिश्ते मज़बूत हो रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह दोस्ती और भी गहरी हुई। मोदी और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत तालमेल और साथ ही बड़े हिंदुत्व इकोसिस्टम द्वारा इस क्षेत्र में इज़राइल के सैन्यवादी और सख्त रुख की तारीफ़ ने दोनों देशों के बीच एक स्वाभाविक जुड़ाव पैदा किया। रिश्ते पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हुए।
ज़्यादातर पश्चिमी सरकारों की तरह, भारत भी गाज़ा में हुए नरसंहार की निंदा करने में नाकाम रहा। जहाँ मोदी ने 7 अक्टूबर, 2023 को हमास के हमले की तुरंत और सही ढंग से निंदा की, वहीं भारत ने अब तक गाज़ा में इज़राइल के अत्याचारों के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। इस मामले में भारत 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों के समूह) से अलग खड़ा नज़र आया, जबकि वहाँ ज़्यादातर देशों ने फ़िलिस्तीन का समर्थन किया था। मोदी का भारत इज़राइल और अमेरिका के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता हुआ दिखा।
कई चूकें हुईं
यह बात ईरान पर US-इजराइल के हमले के दौरान भी साफ दिखी। भारत ने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद शोक संदेश भेजने की भी जहमत नहीं उठाई। न ही उसने उस स्कूल पर हुए हमले की निंदा की जिसमें 200 से ज़्यादा बच्चे और स्टाफ मारे गए थे। ऐसी कई चूकें हुईं। हालांकि, भारत की रणनीतिक ज़रूरतों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारतीय टैंकरों को गुज़ारने की ज़रूरत ने नई दिल्ली को ईरानी नेतृत्व के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर किया।
जिस भारत ने इज़राइल और अमेरिका की निंदा करने से इनकार कर दिया था, उसने धीरे-धीरे अपना रुख बदल लिया। इस साल किर्गिस्तान के बिश्केक में हुई SCO बैठक में, ईरान पर इज़राइल-US की कार्रवाई की कड़ी निंदा की गई और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और UN चार्टर के खिलाफ बताया गया।
घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि फिलिस्तीन पर इज़राइल के हमलों ने पश्चिम एशिया में अस्थिरता पैदा कर दी है और 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) को ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान बताया गया है। हालांकि BRICS घोषणापत्र में भी इनमें से कई बातें दोहराई गई थीं, लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिया गया था। इन्हीं संकेतों की वजह से विश्लेषक भारत की विदेश नीति में बदलाव की बात कर रहे हैं। इस बदलाव की असली परीक्षा ट्रंप के बाद होगी।
पांडे कहते हैं, "भारत ट्रंप के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के खत्म होने का इंतज़ार करेगा, इस उम्मीद में कि अगला राष्ट्रपति ऐसा होगा जो भारत के साथ साझेदारी के महत्व को समझेगा।"
भारत का उच्च वर्ग अमेरिका के साथ बेहतर संबंध चाहता है
सच तो यह है कि भारत का उच्च वर्ग, जिसमें बड़े अधिकारी और कारोबारी नेता शामिल हैं, अमेरिका के साथ बेहतर संबंध चाहता है, चाहे सत्ता में कोई भी सरकार हो। रूस या चीन के विपरीत, यहाँ लोगों के बीच आपसी संबंध मज़बूत हैं।
अगर भारत चीन, रूस, ब्रिक्स (BRICS) और एससीओ (SCO) के साथ अपने संबंध मज़बूत करता रहता है और अमेरिका में सरकार बदलने के बाद भी अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखने पर ज़ोर देता है, तो यह एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है।
अगर ट्रंप के बाद वॉशिंगटन के साथ संबंध तेज़ी से फिर से मुख्य केंद्र में आ जाते हैं, तो मौजूदा बदलाव को मुख्य रूप से एक रणनीतिक कदम माना जा सकता है।

