
Delimitation पर क्यों छिड़ी है जंग, जानिए क्या चाहती है सरकार और क्यों अड़ा है विपक्ष?
सरकार का प्रस्ताव लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करके 2029 के आम चुनावों से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का है।
केंद्र सरकार द्वारा विवादित 131वें संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को पारित कराने की नई कोशिशों ने देश की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। सरकार ने इन दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में गतिरोध खत्म करने और सहमति बनाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क साधा था। लेकिन विपक्ष ने सरकार के इस आउटरीच को सिरे से खारिज कर दिया। संसद सत्र के दौरान भले ही यह बिल सरकार की सूचीबद्ध कार्यसूची का हिस्सा न रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में यह सबसे ऊपर बना हुआ है।
प्रस्तावित संविधान संशोधन का मुख्य उद्देश्य लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 तक करना है। इसके साथ ही नए परिसीमन अभ्यास के माध्यम से संसद में महिलाओं के लिए लंबे समय से लंबित एक-तिहाई (33%) आरक्षण को लागू करना है। हालांकि, परिसीमन के समय, प्रारूप और इसके संभावित दूरगामी परिणामों को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के बीच गहरा मतभेद पैदा हो गया है। आइए समझते हैं कि इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों के क्या-क्या तर्क और चिंताएं हैं।
1. महिला आरक्षण विवाद: परिसीमन से जोड़ने पर क्यों है आपत्ति?
केंद्र और विपक्ष के बीच सबसे तीखा मतभेद इस बात पर है कि क्या महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रक्रिया को परिसीमन (Delimitation) से जोड़ा जाना चाहिए या नहीं।
सितंबर 2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (106वां संविधान संशोधन) के नियमों में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार इसे 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले ही लागू करना चाहती है। इसके लिए सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करते हुए परिसीमन प्रक्रिया को अंजाम देना चाहती है, ताकि नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के लंबे इंतजार को टाला जा सके। सरकार का कहना है कि यदि नई जनगणना का इंतजार किया गया तो महिला आरक्षण 2034 तक टल सकता है, जबकि वह 2029 में ही महिलाओं को उनका अधिकार देना चाहती है।
दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में अपने राजनीतिक परिसीमन के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। संसद में बहस के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कड़ा हमला बोलते हुए कहा था कि सरकार देश की महिलाओं के पीछे छिपकर राजनीतिक लाभ के लिए संसदीय क्षेत्रों का फेरबदल करना चाहती है। विपक्ष का तर्क है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसे वर्तमान 543 सीटों के भीतर ही तुरंत लागू किया जा सकता है।
2. उत्तर-दक्षिण का विभाजन: प्रतिनिधित्व घटने का डर
लोकसभा सीटों के प्रस्तावित विस्तार ने उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर पुरानी चिंताओं को फिर से जिंदा कर दिया है।
सरकार का पक्ष: सरकार का दावा है कि नए परिसीमन से किसी भी राज्य की हिस्सेदारी या प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण भारतीय राज्यों की कुल सीटों की संख्या 129 से बढ़कर 195 हो जाएगी और लोकसभा में उनका कुल आनुपातिक शेयर लगभग 24 प्रतिशत पर ही बना रहेगा। उदाहरण के लिए, कर्नाटक की सीटें 28 से बढ़कर 42 हो जाएंगी (शेयर 5.15% बना रहेगा) और तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी (शेयर 7.18% से बढ़कर 7.23% हो जाएगा)। सरकार के अनुसार, यह व्यवस्था सभी राज्यों की सीटों में वृद्धि करती है और दक्षिण के शेयर को सुरक्षित रखती है।
विपक्ष का तर्क: विपक्ष, विशेषकर दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस का आरोप है कि यह फार्मूला उत्तर-दक्षिण के बीच की खाई को और गहरा करेगा। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने बीते दशकों में जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य (Human Development Index - HDI) के क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है। विपक्ष का कहना है कि जिन राज्यों ने राष्ट्रीय नीति का पालन करते हुए जनसंख्या वृद्धि पर सफलतापूर्वक रोक लगाई, उन्हें सजा क्यों दी जा रही है? केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाने से अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों को अनुचित राजनीतिक लाभ मिलेगा और दक्षिण के राज्यों का राजनीतिक वजन राष्ट्रीय स्तर पर घट जाएगा।
3. गेरीमैंडरिंग और निष्पक्षता पर उठते सवाल
परिसीमन की प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भी विपक्ष ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी दलों को आशंका है कि चुनावी सीमाओं का पुननिर्धारण (Gerrymandering) इस प्रकार किया जा सकता है जिससे सत्तारूढ़ भाजपा को सीधा चुनावी फायदा पहुंचे।
अपनी बात को साबित करने के लिए विपक्ष असम और जम्मू-कश्मीर में हाल ही में हुए परिसीमन अभ्यासों का उदाहरण देता है:
असम: विपक्ष का आरोप है कि असम में परिसीमन के जरिए मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों की संख्या 33 से घटाकर 22 कर दी गई और कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों को विभाजित कर दिया गया। कई अल्पसंख्यक बहुल इलाकों को आरक्षित सीटों में बदल दिया गया।
जम्मू-कश्मीर: जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के दौरान हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में सीटें बढ़ाई गईं, जिसे विपक्ष राजनीतिक हित से प्रेरित बताता है।
इसके अलावा, विपक्षी दल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का मानना है कि यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर ही संदेह हो, तो देशव्यापी परिसीमन से निष्पक्ष चुनावी मैदान की उम्मीद नहीं की जा सकती।
4. जनगणना और जातिगत जनगणना का पेच
विवाद का एक और बड़ा कारण यह है कि सरकार नए परिसीमन के लिए 2021 की नई जनगणना कराने के बजाय 2011 के 15 साल पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल करना चाहती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (SP), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), आम आदमी पार्टी (AAP), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और द्रमुक (DMK) जैसी सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियां 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का कड़ा विरोध कर रही हैं।
राहुल गांधी का आरोप: राहुल गांधी ने कहा कि बिना नई जातिगत जनगणना (Caste Census) के 2011 के पुराने आंकड़ों पर परिसीमन करना देश के पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों की "हिस्सा चोरी" करने के समान है।
मल्लिकार्जुन खड़गे का रुख: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के संवैधानिक प्रावधान को दरकिनार कर 2011 के आंकड़ों को अपनाना राजनीतिक अवसरवादिता है, जो हमारे संघीय ढांचे के खिलाफ है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M): भाकपा (एम) सांसद जॉन ब्रिटास का कहना है कि 15 साल पुराने आंकड़ों पर आधारित परिसीमन भारत के संघीय संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा और कुछ चुनिंदा उत्तरी राज्यों को असंगत फायदा पहुंचाएगा।
5. अविश्वास की गहरी होती खाई और कानूनी पेच
इस पूरे घटनाक्रम ने केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच अविश्वास के स्तर को और बढ़ा दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले सत्र के दौरान मौखिक आश्वासन दिया था कि हर राज्य की लोकसभा सीटों में आनुपातिक रूप से 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी, ताकि किसी को नुकसान न हो। लेकिन कांग्रेस और विपक्ष ने इस मौखिक आश्वासन को केवल "आंखों का धोखा" (Optical Illusion) बताकर खारिज कर दिया। विपक्ष का तर्क है कि सरकार द्वारा लाए गए ड्राफ्ट बिल में ऐसा कोई वैधानिक गारंटी (Statutory Guarantee) का प्रावधान शामिल नहीं है।
कानूनी रूप से देखें तो संविधान का अनुच्छेद 81(2)(a) यह अनिवार्य करता है कि प्रत्येक राज्य की जनसंख्या और उसकी लोकसभा सीटों की संख्या का अनुपात पूरे देश में यथासंभव एक समान होना चाहिए। यदि संविधान के इस मूल प्रावधान को बदले बिना सीटों का फ्रीज हटाया जाता है, तो कानूनन अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को स्वाभाविक रूप से अधिक सीटें मिलेंगी, चाहे सरकार कोई भी जुबानी आश्वासन क्यों न दे।
131वां संविधान संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक केवल संसद की सीटों की संख्या बढ़ाने या घटाने का तकनीकी मामला नहीं है। यह भारत के संघीय ढांचे, लोकतंत्र में राज्यों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा है। जब तक सरकार और विपक्ष मिलकर सर्वसम्मति से किसी पारदर्शी और न्यायसंगत फार्मूले पर सहमत नहीं होते, तब तक परिसीमन को लेकर यह सियासी संग्राम थमने वाला नहीं है।

