
ब्रीज़र बनाम ताड़ी! नए लो-अल्कोहल ड्रिंक्स से डरा केरल का पारंपरिक उद्योग
केरल का पारंपरिक ताड़ी उद्योग मजदूरों की कमी, घटते उत्पादन, मिलावट और नए लो-अल्कोहल ड्रिंक्स की चुनौती से जूझ रहा है। सरकार सुधारों की तैयारी में जुटी है।
हर सुबह छह बजे, त्रिशूर जिले के इलावली गांव में राजिथन एम.आर. नारियल के पेड़ों पर चढ़ना शुरू करते हैं। जब तक अधिकांश लोग अपने काम की शुरुआत करते हैं, तब तक वह करीब 10 पेड़ों पर चढ़ चुके होते हैं। वह पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक तकनीक से टैपिंग चाकू की मदद से नारियल के फूलों की कलियों को काटते हैं और रातभर धीरे-धीरे टपके रस (ताड़ी) को इकट्ठा करते हैं।
इसके बाद वह दोपहर और शाम को भी यही प्रक्रिया दोहराते हैं। यानी एक दिन में कुल 30 बार पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। लगभग नौ घंटे की कड़ी शारीरिक मेहनत के बावजूद उनकी रोज़ाना की कमाई 1,000 रुपये से भी कम है।
57 वर्षीय राजिथन पिछले 39 वर्षों से ताड़ी निकालने का काम कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि केरल की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है। हालांकि अब इस पेशे की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
राजिथन कहते हैं, "जब मैंने इस पेशे की शुरुआत की थी, तब मेरी उम्र करीब 18-19 साल थी। उस समय अगर हम किसी घर के मालिक से उनके नारियल के पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति मांगते थे, तो वे खुशी-खुशी हामी भर देते थे। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब कई लोग अपने पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति देना अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ समझते हैं।"
तीन शिफ्ट, 30 पेड़ और कमाई एक हजार से कम
वह बताते हैं, "हम हर दिन तीन शिफ्ट में करीब 30 पेड़ों पर चढ़ते हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारी कमाई 1,000 रुपये से भी कम रहती है। सुबह करीब छह बजे काम शुरू होता है। पहला दौर खत्म होते ही सुबह दस बजे से पहले ताड़ी दुकानों तक पहुंचानी होती है। इसके बाद दोबारा दूसरे और तीसरे दौर के लिए पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। काम बेहद कठिन है, लेकिन अब इससे मिलने वाली आय मेहनत के मुकाबले बहुत कम रह गई है।"राजिथन की यह कहानी ऐसे समय सामने आई है, जब केरल में कम अल्कोहल वाले 'रेडी-टू-ड्रिंक' पेय पदार्थों, जैसे बकार्डी ब्रीज़र, की उपलब्धता बढ़ाने पर चर्चा चल रही है।यह बहस लोगों की बदलती शराब पीने की आदतों और हार्ड लिकर के विकल्प उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। लेकिन केरल के ताड़ी उद्योग से जुड़े कामगारों का कहना है कि राज्य के पास पहले से ही एक प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाला कम अल्कोहल वाला पेय मौजूद है, जो स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उनका तर्क है कि सरकार को बाहरी ब्रांडों को बढ़ावा देने के बजाय इस पारंपरिक उद्योग को मजबूत करना चाहिए। उन्हें आशंका है कि बेहतर पैकेजिंग और प्रतिस्पर्धी कीमतों वाले नए 'रेडी-टू-ड्रिंक' उत्पाद बाजार में आने से ताड़ी की मांग और अधिक घट सकती है।
विडंबना यह है कि एक ओर सरकार ब्रांडेड कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों के लिए नया बाजार तलाश रही है, जबकि दूसरी ओर केरल का पारंपरिक ताड़ी उद्योग पिछले तीन दशकों से अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।
नारियल के फूलों से ताज़ा निकाली गई ताड़ी में औसतन करीब आठ प्रतिशत अल्कोहल होता है। यह मात्रा भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) की तुलना में काफी कम है और बाजार में उपलब्ध कई कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों के बराबर है।फैक्ट्री में बनने वाले बोतलबंद पेय पदार्थों के विपरीत, ताड़ी केवल एक पेय नहीं है, बल्कि यह एक पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देती है। इससे नारियल उत्पादक, ताड़ी निकालने वाले मजदूर, परिवहन कर्मी, ताड़ी की दुकानें और हजारों अन्य लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इसके बावजूद उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह क्षेत्र आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है।
मेहनत और कौशल का मेल है ताड़ी निकालना
ताड़ी निकालने की प्रक्रिया बेहद मेहनत और कौशल वाली होती है। सबसे पहले ताड़ी निकालने वाला व्यक्ति नारियल के पेड़ पर चढ़ता है और रस के प्रवाह को बढ़ाने के लिए बिना खिले फूल की कली को धीरे-धीरे थपथपाता है। इसके बाद कली के सिरे को सावधानी से काटकर वहां एक मिट्टी का बर्तन बांध दिया जाता है, जिसमें मीठा रस धीरे-धीरे टपककर जमा होता रहता है। हवा में मौजूद प्राकृतिक यीस्ट इस रस को स्वतः किण्वित (फर्मेंट) कर देता है, जिससे शाम तक यह हल्के अल्कोहल वाले पेय में बदल जाता है।केरल में ताड़ी की दुकानों को केरल आबकारी विभाग की ओर से एक विनियमित प्रक्रिया के तहत लाइसेंस दिया जाता है। इन दुकानों के संचालन का अधिकार सरकार सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से देती है। इसके बाद यह लाइसेंस व्यक्तिगत संचालकों या ताड़ी निकालने वालों की सहकारी समितियों को आवंटित किया जाता है।
राजिथन ने वर्ष 1987 में इस पेशे की शुरुआत की थी। उस समय ताड़ी निकालना सम्मानजनक और अच्छी आय देने वाला व्यवसाय माना जाता था। वह बताते हैं कि 1990 के दशक के आखिर तक ताड़ी निकालने वाले मजदूर रोजाना 500 से 600 रुपये तक कमा लेते थे, जो उस समय अच्छी आमदनी मानी जाती थी।उन्हें याद है कि उस दौर में नारियल के बागानों की नियमित देखभाल होती थी। पेड़ अधिक स्वस्थ होते थे और उनसे पर्याप्त मात्रा में ताड़ी निकलती थी। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
राजिथन कहते हैं, "आज लोग अपने पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति नहीं देना चाहते। पहले की तरह नारियल के नए पेड़ भी नहीं लगाए जा रहे हैं। बागानों की देखभाल महंगी हो गई है और कई लोगों ने तो इसकी देखरेख लगभग छोड़ ही दी है। जबकि अच्छी मात्रा में ताड़ी केवल स्वस्थ पेड़ों से ही मिल सकती है।"
नारियल उत्पादकों की परेशानी
नारियल उत्पादकों के पास भी अपनी मजबूरियां हैं। उनका कहना है कि खेती की लागत और मजदूरी लगातार बढ़ी है। जमीन छोटे-छोटे हिस्सों में बंट चुकी है और रिहायशी इलाकों के विस्तार के कारण नारियल के बागानों का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है।कई जमीन मालिक अब अपने घरों या परिसर में लगे पेड़ों से ताड़ी निकलवाना सामाजिक रूप से उचित नहीं मानते। वहीं, इसके बदले मिलने वाली 500 रुपये प्रति पेड़ प्रति माह की राशि भी उन्हें पर्याप्त नहीं लगती।त्रिशूर जिले की 73 वर्षीय पी. ओमानादेवी, जो डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं, बताती हैं कि पहले वह अपने परिसर में लगे पांच-छह नारियल के पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति देती थीं।वह कहती हैं, "हमारे गांव में यह परंपरा थी कि जिन्हें काम की जरूरत होती थी, उन्हें हम अपने पेड़ों से ताड़ी निकालने देते थे। वे आते, रस इकट्ठा करते और वापस चले जाते। हमने कभी उनसे पैसे भी नहीं लिए, जबकि ऐसा करने का प्रावधान था। लेकिन अब मैं अकेली रहती हूं, इसलिए हर समय गेट खुला रखना संभव नहीं है। यही वजह है कि करीब पांच-छह साल पहले मैंने ताड़ी निकलवाना बंद कर दिया। जो ताड़ी निकालने वाला हमारे यहां आता था, वह भी अब बूढ़ा हो चुका है और उसके बच्चों ने यह पेशा नहीं अपनाया।"उधर, ताड़ी निकालने वालों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब नए पेड़ तलाशना बन गई है।
कई बार किसी नए नारियल के पेड़ को ताड़ी निकालने योग्य बनाने में पूरा एक महीना लग जाता है। लेकिन बाद में पता चलता है कि उस पेड़ से पर्याप्त रस ही नहीं निकलता। कई बार तो हफ्तों की मेहनत के बाद भी लगभग कुछ हासिल नहीं होता।इसके अलावा, यह पेशा बेहद जोखिम भरा भी है।
राजिथन बताते हैं, "पेड़ों पर चढ़ते समय हमें अक्सर ततैयों (Hornets) के हमलों का सामना करना पड़ता है। उनकी एक प्रजाति का डंक बेहद खतरनाक होता है। अगर पेड़ पर चढ़े हुए उसी समय हमला हो जाए, तो कई बार सुरक्षित नीचे उतरना भी मुश्किल हो जाता है।"करीब चार दशक इस पेशे में बिताने के बाद राजिथन एक निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।वह कहते हैं, "मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि मेरा बेटा ताड़ी निकालने वाला बने।"ऐसी ही भावना अब पूरे केरल के ताड़ी उद्योग में देखने को मिल रही है।
केरल में ताड़ी उद्योग
त्रिशूर जिले के मललूर में सीआईटीयू (CITU) से संबद्ध ताड़ी वर्कर्स यूनियन के नेता सी.के. विजयन का कहना है कि इस उद्योग का सबसे बड़ा संकट अब ग्राहकों की कमी नहीं, बल्कि मजदूरों की कमी है।वह कहते हैं, "आज हमारी सबसे बड़ी समस्या श्रमिकों की कमी है।"विजयन के मुताबिक, केवल चवक्कड़ रेंज में वर्ष 2010 तक लगभग 496 ताड़ी निकालने वाले मजदूर थे। आज उनकी संख्या घटकर करीब 150 रह गई है।
वह बताते हैं, "कई लोग सेवानिवृत्त हो गए, जबकि कई मजदूर इसलिए यह पेशा छोड़ गए क्योंकि अब मजदूरी और कल्याणकारी सुविधाएं पहले जैसी आकर्षक नहीं रहीं। पहले परिवार के युवा सदस्य अपने बुजुर्गों की जगह यह काम संभाल लेते थे, लेकिन अब नई पीढ़ी इस पेशे में आने को तैयार नहीं है।"
विजयन का अनुमान है कि आज पूरे केरल में ताड़ी उद्योग से जुड़े केवल 16 से 17 हजार मजदूर ही सक्रिय हैं। जबकि लगभग एक दशक पहले उनकी संख्या 50 हजार से अधिक थी।यदि परिवहन, खाना बनाने, ग्राहकों को सेवा देने, बोतल साफ करने और अन्य सहयोगी कार्यों को भी जोड़ दिया जाए, तो कभी इस उद्योग पर करीब एक लाख लोगों की आजीविका निर्भर थी।
राज्य की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन CITU को ताड़ी निकालने वाले मजदूरों के संगठन का विलय शराब उद्योग के अन्य श्रमिक संगठनों के साथ करना पड़ा, क्योंकि ताड़ी निकालने वालों की संख्या लगातार घटती जा रही थी।सरकारी नियमों के अनुसार, एक ताड़ी निकालने वाला मजदूर एक शिफ्ट में अधिकतम 10 पेड़ों से ही ताड़ी निकाल सकता है।
विजयन कहते हैं, "दिन में तीन शिफ्ट में करीब 30 पेड़ों पर चढ़ने के बाद भी अधिकांश मजदूर 1,000 रुपये से कम ही कमा पाते हैं। वे लगभग 12 घंटे तक काम करते हैं, लेकिन आय बेहद सीमित रहती है। इसके अलावा, अगर किसी ताड़ी की दुकान में नियमों का उल्लंघन होता है, तो सबसे पहले कार्रवाई का सामना भी अक्सर मजदूरों को ही करना पड़ता है।"
आम धारणा के विपरीत, मजदूरों का कहना है कि ताड़ी पीने वालों की संख्या में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है।विजयन कहते हैं, "समस्या ग्राहकों की नहीं, बल्कि उत्पादन की है। पीने वाले आज भी हैं, लेकिन ताड़ी पहले जितनी मात्रा में तैयार नहीं हो पा रही।"
उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, ताड़ी उत्पादन में गिरावट के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि अब जमीन मालिक अपने नारियल के पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति देने से हिचकिचाते हैं। इसके अलावा, स्वस्थ और पर्याप्त रस देने वाले पेड़ भी लगातार कम होते जा रहे हैं।हाल के वर्षों में नारियल के पेड़ों में फैलने वाली बीमारियों ने भी उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस तरह की वायरल बीमारियां इतनी आम नहीं थीं। दूसरी ओर, ताड़ी निकालने वाले कुशल मजदूरों की संख्या भी लगातार घट रही है।इसी वजह से कई जिलों में स्थानीय स्तर पर उत्पादन कम हो गया है। नतीजतन, अब राज्य के कई हिस्सों की ताड़ी की दुकानें पलक्कड़ जिले, खासकर चित्तूर से आने वाली ताड़ी पर निर्भर होती जा रही हैं।
पलक्कड़-चित्तूर पर बढ़ती निर्भरता
दशकों से पलक्कड़ का चित्तूर इलाका केरल के ताड़ी उद्योग की रीढ़ माना जाता रहा है। कन्नूर और तिरुवनंतपुरम को छोड़कर राज्य के अधिकांश जिलों में ताड़ी की आपूर्ति यहीं से होती है।केरल आबकारी विभाग ताड़ी की ताजगी और परिवहन की व्यवहारिकता को ध्यान में रखते हुए पलक्कड़ से अन्य जिलों में ताड़ी भेजने की अनुमति देता है। कन्नूर और तिरुवनंतपुरम राज्य के दो छोर पर स्थित हैं, इसलिए वहां तक रोज ताजा ताड़ी पहुंचाना मुश्किल होता है।
कागजों पर इस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता अब भी मजबूत दिखाई देती है। विभाग के अनुसार, लगभग 1.90 लाख नारियल के पेड़ों से ताड़ी निकालने की अनुमति है, जिससे प्रतिदिन करीब तीन लाख लीटर उत्पादन संभव है।लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।ताड़ी मजदूरों का अनुमान है कि पलक्कड़ में आज प्रतिदिन 40 हजार लीटर से भी कम ताड़ी का उत्पादन हो रहा है।
अब तमिलनाडु की ओर पलायन कर रहे हैं मजदूर
उत्पादन में गिरावट के साथ-साथ मजदूरों का पलायन भी उद्योग के लिए नई चुनौती बन गया है।एक समय ऐसा था जब बेहतर मजदूरी की तलाश में तमिलनाडु से ताड़ी निकालने वाले मजदूर केरल आया करते थे। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।आज अनुभवी ताड़ी मजदूर बेहतर वेतन, अधिक काम और कम नियमों की वजह से तमिलनाडु का रुख कर रहे हैं।मजदूरों के अनुसार, कभी चित्तूर क्षेत्र में केरल के करीब 2,500 और तमिलनाडु के लगभग 3,000 ताड़ी मजदूर काम करते थे, जिनमें अधिकांश नादर समुदाय से थे।अब यह संख्या घटकर केरल के लगभग 150 और तमिलनाडु के करीब 400 मजदूरों तक सिमट गई है।
करीब चार दशक से इस पेशे से जुड़े और आईएनटीयूसी (INTUC) से संबद्ध यूनियन के सदस्य के.पी. अरुमुघन कहते हैं,"राज्य की सीमा के दूसरी ओर बेहतर अवसर उपलब्ध हैं। यहां हममें से कई लोग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से बाहर हैं और दिहाड़ी मजदूर के रूप में बिना किसी ठोस सुरक्षा के काम कर रहे हैं। तमिलनाडु में मजदूरी अधिक है, इसलिए वहां जाना ज्यादा लाभदायक लगता है। पहले तमिलनाडु के लोग रोजगार के लिए केरल आते थे, लेकिन अब हालात उलट चुके हैं।"
उद्योग पर मिलावट का भी बढ़ता दबाव
मलप्पुरम जिले में सीआईटीयू से जुड़े ताड़ी मजदूर नेता पी.के. कुंजुमोन का कहना है कि उद्योग केवल उत्पादन संकट से नहीं, बल्कि बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मिलावट की समस्या से भी जूझ रहा है।उनके अनुसार, हर दिन पलक्कड़ से करीब 2.5 लाख लीटर ताड़ी केरल के विभिन्न जिलों में भेजी जाती है। लेकिन यह पूरी मात्रा संगठित और पंजीकृत व्यवस्था के तहत नहीं आती।
वह कहते हैं, "कुछ उत्पादक ऐसे हैं जो पंजीकृत मजदूरों को रोजगार देते हैं और उन्हें कल्याणकारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराते हैं। लेकिन इसके समानांतर एक दूसरा तंत्र भी काम कर रहा है, जहां मजदूर किसी भी वेलफेयर स्कीम के दायरे में नहीं आते और उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिलती।"कुंजुमोन का आरोप है कि बाजार में पहुंचने वाली ताड़ी का एक बड़ा हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचने से पहले मिलावटी या पानी मिलाकर बेचा जाता है।
वह कहते हैं,"कुछ कारोबारी ताड़ी खरीदते हैं, उसमें मिलावट करते हैं और फिर उसे बाजार में बेच देते हैं। इससे पूरी ताड़ी उद्योग की साख प्रभावित होती है।"
कम मुनाफा, बढ़ती लागत
आर्थिक स्थिति भी इस उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।कुंजुमोन के अनुसार, मजदूरी और वेलफेयर फंड में योगदान को मिलाकर एक लीटर स्थानीय ताड़ी तैयार करने की लागत लगभग ₹120 आती है। जबकि इसकी बिक्री ₹140 से ₹150 प्रति लीटर के बीच होती है। यानी मुनाफा बेहद सीमित रह जाता है।इसके उलट, गैर-पंजीकृत स्रोतों से कम लागत पर लाई गई ताड़ी व्यापारियों को लगभग आधी कीमत में मिल जाती है।
कुंजुमोन कहते हैं, "आज कई ताड़ी की दुकानें इसी मॉडल पर चल रही हैं। यही वजह है कि नियमों का पालन करने वाले उत्पादकों और मजदूरों पर सबसे ज्यादा आर्थिक दबाव पड़ रहा है।" हालांकि, केरल आबकारी विभाग का कहना है कि ताड़ी उद्योग को पुनर्जीवित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
इसी महीने की शुरुआत में राज्य विधानसभा में आबकारी मंत्री एम. लिजू ने कहा था कि सरकार ताड़ी मजदूरों की आजीविका सुरक्षित रखने के साथ-साथ उपभोक्ताओं का भरोसा बहाल करने के लिए उद्योग में व्यापक सुधारों पर काम कर रही है।उन्होंने कहा, "केरल का ताड़ी उद्योग राज्य की बची हुई पारंपरिक आजीविकाओं में से एक है। हमारी प्राथमिकता इसकी विश्वसनीयता बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं तक केवल शुद्ध और बिना मिलावट वाली ताड़ी ही पहुंचे।"
मंत्री ने स्वीकार किया कि यह उद्योग कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें नए मजदूरों की कमी, काम की अत्यधिक शारीरिक कठिनाई और ताड़ी में मिलावट जैसी समस्याएं प्रमुख हैं।इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने 'ऑपरेशन शुद्धि' शुरू किया है।
इस अभियान के तहत नकली और मिलावटी ताड़ी के उत्पादन व बिक्री पर रोक लगाने के लिए राज्यभर में व्यापक जांच अभियान चलाया जा रहा है। विशेष रूप से पलक्कड़ के चित्तूर जैसे प्रमुख उत्पादन केंद्रों और विभिन्न जिलों की ताड़ी दुकानों में निरीक्षण तेज कर दिया गया है।सरकार के अनुसार, प्रयोगशाला जांच के लिए 2,740 से अधिक ताड़ी दुकानों का निरीक्षण किया गया है और 1,457 नमूने एकत्र किए गए हैं।
आबकारी मंत्री ने कहा कि सरकार की दीर्घकालिक योजना में ताड़ी मजदूरों के कल्याण को मजबूत करना, बेहतर किस्म के नारियल के पेड़ों को बढ़ावा देकर उत्पादन बढ़ाना तथा केरल टॉडी इंडस्ट्री डेवलपमेंट बोर्ड समेत सभी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर नई आबकारी नीति तैयार करना शामिल है।
बंद ताड़ी दुकानों को फिर से खोलना आसान नहीं
सरकार वर्षों से बंद पड़ी ताड़ी दुकानों को दोबारा शुरू करने पर विचार कर रही है। लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि मौजूदा नियम इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।सबसे बड़ी समस्या दुकानों के स्थानांतरण (रिलोकेशन) से जुड़े नियम हैं।मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी कारणवश ताड़ी की दुकान को दूसरी जगह स्थानांतरित करना पड़े, तो नई जगह स्कूल, धार्मिक स्थल और अन्य निर्धारित संस्थानों से कम से कम 400 मीटर दूर होनी चाहिए।इसके विपरीत, बार और अन्य शराब की दुकानों के लिए यह दूरी 200 मीटर निर्धारित है।
मलप्पुरम के ताड़ी मजदूर नेता पी.के. कुंजुमोन कहते हैं,"400 मीटर का नियम अब उद्योग के लिए बड़ी बाधा बन चुका है। कई दुकानें सिर्फ इसलिए बंद पड़ी हैं क्योंकि उन्हें तय मानकों के अनुसार दूसरी जगह नहीं मिल पाती।" सी.के. विजयन भी इससे सहमत हैं। उनका कहना है, "अगर मकान मालिक दुकान खाली करने के लिए कह दे, तो अधिकतर मामलों में लाइसेंसधारी को दूसरी मंजूरशुदा जगह नहीं मिलती। यही कारण है कि कई दुकानें दोबारा शुरू ही नहीं हो पातीं।"
ताड़ी की दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की भी कमी
एर्नाकुलम जिले में करीब 35 वर्षों से ताड़ी की दुकान पर काम कर रहे स्टीफन थॉमस का कहना है कि केवल ताड़ी निकालने वाले मजदूर ही नहीं, बल्कि दुकानों में काम करने वाले रसोइए और अन्य कर्मचारी भी तेजी से कम हो रहे हैं। वह कहते हैं, "रसोइए और फूड हैंडलर मिलना बेहद मुश्किल हो गया है। जो लोग काम करने के लिए तैयार भी होते हैं, वे आबकारी और स्वास्थ्य विभाग के लगातार निरीक्षण तथा लाइसेंस संबंधी औपचारिकताओं से परेशान होकर यह काम छोड़ देते हैं। अब बहुत कम लोग इस क्षेत्र में आना चाहते हैं।"
लो-अल्कोहल ड्रिंक्स पर बहस और ताड़ी उद्योग की चिंता
इसी बीच केरल में कम अल्कोहल वाले नए पेय पदार्थों को बढ़ावा देने पर चर्चा तेज हो गई है।ताड़ी उद्योग से जुड़े मजदूरों का कहना है कि यह बहस एक अहम सवाल खड़ा करती है।उनका तर्क है कि यदि सरकार का उद्देश्य कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों को बढ़ावा देना है, तो राज्य के पारंपरिक पेय ताड़ी को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?
ताड़ी में स्वाभाविक रूप से करीब 8.3 प्रतिशत अल्कोहल होता है, जो बाजार में उपलब्ध कई कम अल्कोहल वाले ब्रांडेड पेय पदार्थों के बराबर है।इसके बावजूद मजदूरों को आशंका है कि यदि बकार्डी ब्रीज़र जैसे ब्रांड बेहतर मार्केटिंग और प्रतिस्पर्धी कीमतों के साथ बाजार में आते हैं, तो ताड़ी का पहले से ही सिमटता ग्राहक वर्ग और तेजी से कम हो सकता है।
सी.के. विजयन कहते हैं,"अगर बकार्डी जैसे उत्पाद कम अल्कोहल वाले बाजार में लोकप्रिय हो गए, तो सबसे ज्यादा नुकसान ताड़ी उद्योग को होगा।" पी.के. कुंजुमोन भी इसी चिंता को दोहराते हैं। उनका कहना है, "इन उत्पादों को कम अल्कोहल वाले पेय के रूप में प्रचारित किया जाएगा। यदि इनकी कीमत भी कम रखी गई, तो इनका सीधा असर ताड़ी की दुकानों पर पड़ेगा। खासकर युवा उपभोक्ता ऐसे ब्रांडेड उत्पादों की ओर तेजी से आकर्षित हो सकते हैं।"
पर्यटन से जोड़ने की कोशिश भी अधूरी रही
ताड़ी उद्योग को नया जीवन देने के लिए अतीत में पर्यटन और आबकारी विभाग ने टॉडी पार्लर विकसित करने की योजना भी बनाई थी।उद्देश्य था कि साफ-सुथरे, आधुनिक और आकर्षक पार्लर विकसित किए जाएं, जहां पारंपरिक केरल व्यंजनों के साथ ताड़ी भी परोसी जाए।शुरुआत में इस पहल को अच्छा समर्थन मिला। त्रिशूर समेत कुछ स्थानों पर ताड़ी की दुकानों को लोकप्रिय भोजन स्थलों में भी बदला गया।लेकिन बाद में यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
स्थानीय निकायों से अनुमति, पार्किंग की व्यवस्था, स्वास्थ्य विभाग की मंजूरी और अन्य नियामकीय प्रक्रियाओं ने निवेशकों की रुचि कम कर दी।फिर भी उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकार समन्वित नीति अपनाए, तो ताड़ी को केरल के पाक एवं सांस्कृतिक पर्यटन (Culinary Tourism) का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे यूरोप में वाइनरी और जापान में साके ब्रुअरी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
क्या खत्म हो जाएगी सदियों पुरानी परंपरा?
ताड़ी केवल एक पारंपरिक पेय नहीं है।यह हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका, नारियल की खेती, पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कौशल और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है।उत्पादन में हर गिरावट का असर केवल ताड़ी निकालने वालों पर नहीं पड़ता, बल्कि नारियल उत्पादकों, परिवहन कर्मियों, रसोइयों, दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों और पूरे ग्रामीण आर्थिक तंत्र पर पड़ता है।
आज इस पूरी श्रृंखला की लगभग हर कड़ी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।नई पीढ़ी इस पेशे में नहीं आना चाहती। नारियल के पेड़ों की संख्या घट रही है।उत्पादन लगातार कम हो रहा है।अनुभवी मजदूर बूढ़े हो रहे हैं।बेहतर रोजगार के अवसर उन्हें दूसरे राज्यों की ओर खींच रहे हैं। और अब कम अल्कोहल वाले नए ब्रांडेड पेय पदार्थों की संभावित एंट्री ने इस उद्योग के भविष्य को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं।
राजिथन के लिए नीति स्तर पर चल रही यह पूरी बहस उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से बहुत दूर नजर आती है।कल सुबह भी वह सूर्योदय से पहले घर से निकलेंगे।करीब 30 नारियल के पेड़ों पर चढ़ेंगे।लगभग नौ घंटे तक कड़ी मेहनत करेंगे और दिन के अंत में 1,000 रुपये से भी कम कमाई लेकर घर लौटेंगे।
उनकी तरह ही हजारों ताड़ी मजदूर आज यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या केरल कम अल्कोहल वाले नए ब्रांडेड पेय पदार्थों का स्वागत करने की तैयारी कर रहा है, जबकि उसका अपना सदियों पुराना पारंपरिक पेय और उससे जुड़ी आजीविकाएं धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं?

