
विपक्ष के विरोध से बैकफुट पर केंद्र, परिसीमन बिल पर पुनर्विचार
संसद में कामकाज में रुकावटों को देखते हुए, केंद्र सरकार लोकसभा के प्रस्तावित विस्तार, महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन पैकेज के बजाय अपने सूचीबद्ध विधेयकों को प्राथमिकता दे सकती है।
Monsoon Session 2026: मानसून सत्र की अब केवल नौ बैठकें बची हैं। ऐसे में केंद्र सरकार सोमवार (3 अगस्त) से संसद में अपने सूचीबद्ध विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। हालांकि, सरकार लोकसभा की संरचना को बदलने, महिला आरक्षण लागू करने और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को सक्षम करने वाले अपने बहुप्रतीक्षित लेकिन असूचीबद्ध विधायी पैकेज को रोक सकती है।
सत्र के लिए सात बिल
सरकार ने मौजूदा सत्र के लिए केवल सात विधेयकों को सूचीबद्ध किया था। पांच नए विधेयक, राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026, जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, आयकर (संशोधन) विधेयक 2026, सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026, और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक 2026 पेश करने, विचार करने और पारित करने के लिए निर्धारित थे। इसके अलावा बजट सत्र के दौरान पेश विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 भी सूचीबद्ध थे, जो संसद की एक संयुक्त समिति के विचाराधीन हैं।
परिसीमन योजना पर ब्रेक
सत्र से पहले आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) से एनडीए में बड़े पैमाने पर दल-बदल ने इन अटकलों को हवा दी थी कि सरकार लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने, महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने और संबंधित परिसीमन विधेयक लाने के लिए संशोधित संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित करने का एक और प्रयास करेगी।
अटकलों पर नहीं लगी रोक
लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण 17 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित करने का प्रयास विफल होने पर सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। इसके बाद भी सरकार ने इन अटकलों को शांत करने के लिए कुछ खास नहीं किया। इसके उलट, वरिष्ठ मंत्रियों और बीजेपी नेताओं ने अनौपचारिक बातचीत में संकेत दिया कि एक नए प्रयास की तैयारी चल रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि डीएमके और एनसीपी-एसपी जैसी पार्टियों से समर्थन हासिल करने के प्रयास चल रहे हैं।
सरकार की सोची समझी रणनीति
सरकारी सूत्रों ने कहा था कि 18 बैठकों वाले मानसून सत्र के लिए विधायी एजेंडा जानबूझकर कम रखा गया था, ताकि सत्र के अंतिम दिनों में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक पेश करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश रहे। यह रणनीति मोदी सरकार की उस पुरानी कार्यप्रणाली के अनुरूप होती, जिसमें विवादित विधेयकों को सत्र के अंत में पेश किया जाता है, जिससे विपक्ष को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।
योजनाओं में पड़ा खलल
हालांकि, 20 जुलाई को सत्र शुरू होने के बाद की घटनाओं ने उन योजनाओं को बाधित कर दिया है। सरकारी सूत्रों ने शुक्रवार (31 जुलाई) को बताया कि छात्र प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस बर्बरता और अयोध्या के राम मंदिर में कथित चंदा चोरी को लेकर विपक्ष के लगातार विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार अब पहले से सूचीबद्ध विधायी एजेंडे को पास कराने को प्राथमिकता देगी।
विपक्ष ने बिगाड़ा खेल
बार-बार परीक्षा पेपर लीक होने को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य छात्र और युवा संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के कारण 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इसने सरकार को सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक पेश करने के लिए भी मजबूर किया। हालांकि संसद ने यह विधेयक पारित कर दिया, लेकिन सरकार को एकजुट विपक्ष के लगातार हमलों का सामना करना पड़ा।
काम नहीं आया पीएम का दांव
यदि प्रधानमंत्री मोदी को उम्मीद थी कि प्रधान के इस्तीफे और सार्वजनिक परीक्षा के कड़े कानून से स्थिति सामान्य हो जाएगी, तो उनका यह अनुमान पूरी तरह से विफल रहा।
विपक्ष का जोरदार हमला
पिछले कुछ दिनों में, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे और मोदी से माफी की मांग के पीछे विपक्षी दलों को एकजुट किया है। वहीं, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने राम मंदिर चंदा विवाद पर विपक्ष के हमले का नेतृत्व किया है। कांग्रेस-सपा समन्वय की एक झलक 31 जुलाई को संसद परिसर में दिखी, जब समाजवादी सांसदों और कांग्रेस समर्थित निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने चंदा विवाद पर बीजेपी का मजाक उड़ाते हुए एक नाटक किया, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने शाह के इस्तीफे की मांग करते हुए पास में ही विरोध प्रदर्शन किया।
मुद्दे उठाने पर अड़ा विपक्ष
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नासिर हुसैन और समाजवादी पार्टी की सांसद रुचि वीरा ने बताया कि 3 अगस्त को संसद की कार्यवाही फिर से शुरू होने पर इंडिया ब्लॉक इन दोनों मुद्दों को उठाना जारी रखेगा।
केवल दो बिल ही हुए पास
दस बैठकें पूरी होने के साथ संसद ने मूल रूप से सूचीबद्ध सात विधेयकों में से केवल दो पारित किए हैं। इनमें राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 और जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक शामिल हैं। भारी हंगामे के बीच जन्म और मृत्यु पंजीकरण विधेयक लोकसभा में मिनटों में पास हो गया। विधेयक पेश करने वाले गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय सहित एक भी सांसद इस पर बोल नहीं पाया। राष्ट्रीय गौरव विधेयक पर राज्यसभा में पूरी बहस हुई, लेकिन लोकसभा में केवल एक संक्षिप्त चर्चा हुई, जहां डीएमके सांसद कनिमोझी ने सरकार के विभाजनकारी एजेंडे की कड़ी आलोचना की।
बहुमत का संकट
कनिमोझी के हस्तक्षेप और सार्वजनिक परीक्षा विधेयक पर बहस के दौरान सुप्रिया सुले के सरकार पर असामान्य रूप से आक्रामक हमले ने भी केंद्र के उस विश्वास को कमजोर किया है कि वह संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए डीएमके और एनसीपी-एसपी को अपने पक्ष में कर लेगा।
गतिरोध खत्म होने की उम्मीद नहीं
छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर जनता का गुस्सा अभी भी सुलग रहा है और विपक्ष मोदी और शाह पर हमले तेज कर रहा है। सरकारी सूत्र अब मानते हैं कि उन्हें सत्र के शेष समय के दौरान संसदीय गतिरोध खत्म होने की कोई संभावना नहीं दिखती है।
रणनीति में हुआ बदलाव
पिछले पखवाड़े के इन घटनाक्रमों ने केंद्र को अपनी विधायी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर कर दिया है। मानसून सत्र के पहले दो दिनों के भीतर ही इसके संकेत दिखाई दे रहे थे, जब संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक की जांच कर रही संसद की संयुक्त समितियों ने अपनी रिपोर्ट अपनाने से टाल दिया, जबकि उनके अध्यक्षों ने कुछ ही दिन पहले संकेत दिया था कि विचार-विमर्श समाप्त हो गया है।
जेपीसी को मिला अतिरिक्त समय
संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, जो एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव की परिकल्पना करता है, उसे केंद्र के परिसीमन और महिला आरक्षण योजना के तार्किक विस्तार के रूप में व्यापक रूप से देखा गया था। बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली जेपीसी को अब दिसंबर में संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने का समय दिया गया है।
रिपोर्ट में हुई देरी
बीजेपी सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में संविधान (130वां संशोधन) विधेयक की जांच कर रही जेपीसी को भी ऐसा ही विस्तार दिया गया। कथित तौर पर समिति ने अपनी मसौदा रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया था, लेकिन अंतिम समय में इसे अपनाने से टाल दिया। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति का भी यही हश्र हुआ है।
सूचीबद्ध बिलों पर पूरा ध्यान
जिन सरकारी सूत्रों ने पहले कहा था कि समितियों द्वारा अपनी रिपोर्ट सौंपने के बाद कैबिनेट इन विधेयकों के संशोधित संस्करणों को तेजी से मंजूरी देगी, वे अब मानते हैं कि राजनीतिक स्थिति मौजूदा सत्र के दौरान संसद के माध्यम से इन विवादास्पद उपायों को आगे बढ़ाने के लिए अब अनुकूल नहीं है।
हंगामे के बीच बिल पास कराने की तैयारी
इसके बजाय, सरकार और उसके प्रबंधक अब पहले से सूचीबद्ध विधेयकों को पारित कराने के इच्छुक हैं, जो लगातार व्यवधानों के कारण रुके हुए हैं। भले ही इसका मतलब बिना किसी चर्चा के शोर-शराबे के बीच उन्हें पारित कराना हो।
गैर-विवादित बिलों से होगी शुरुआत
केंद्र सरकार अपेक्षाकृत कम विवादित विधेयकों को पेश करने से शुरुआत कर सकती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक 2026 और आयकर (संशोधन) विधेयक 2026 शामिल हैं।
विपक्ष से सीधे टकराव की भी राय
सरकार के भीतर एक और राय विपक्ष का सीधे तौर पर सामना करने के पक्ष में है। इसके तहत लोकसभा में विचार और पारित होने के लिए विवादास्पद एफसीआरए विधेयक पेश किया जा सकता है। गृह मंत्रालय द्वारा संचालित इस विधेयक की विपक्ष पहले ही इस बात के लिए आलोचना कर चुका है कि यह विदेशी धन प्राप्त करने वाले नागरिक समाज संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने का एक और प्रयास है।
अमित शाह की मौजूदगी पर सस्पेंस
केंद्र सरकार इस बात को अच्छी तरह जानती है कि एफसीआरए विधेयक आगे और टकराव को भड़काएगा। लेकिन बीजेपी के एक वर्ग का मानना है कि इसे आगे बढ़ाने से यह प्रदर्शित होगा कि मोदी सरकार राजनीतिक रूप से दृढ़ है। चूंकि अमित शाह विपक्ष के हमलों के केंद्र में हैं, इसलिए यह देखना बाकी है कि क्या वह खुद विधेयक पेश करेंगे या मानसून सत्र की शुरुआत के बाद से सदन से दूर ही रहेंगे। ऐसे में विपक्ष के विरोध का सामना करने की जिम्मेदारी नित्यानंद राय पर आ जाएगी।
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