NEET का संकट पेपर लीक से गहरा, शिक्षाविदों ने गिनाईं ढांचागत खामियां
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NEET का संकट पेपर लीक से गहरा, शिक्षाविदों ने गिनाईं ढांचागत खामियां

'द फेडरल' से बातचीत में शिक्षाविदों ने बताया कि NEET की असली समस्या पेपर लीक नहीं, बल्कि कोचिंग कल्चर, सीट किल्लत और संघीय ढांचे पर हमला है।


NEET Test: नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) में पेपर लीक और हालिया धांधलियों ने भले ही देशभर के छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया हो, लेकिन शिक्षाविदों का मानना है कि NEET की समस्याएं केवल सुरक्षा में चूक या लीक तक सीमित नहीं हैं। 'द फ़ेडरल' से खास बातचीत में जाने-माने शिक्षाविदों, नीति विशेषज्ञों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने साफ किया है कि कोचिंग आधारित तंत्र, मेडिकल सीटों की भारी किल्लत, रटने की प्रवृत्ति और राज्यों के अधिकारों का हनन ऐसे गहरे ढांचागत संकट हैं, जो इस पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को दीमक की तरह चाट रहे हैं।


'ऑनलाइन परीक्षा बनाम नैतिक जिम्मेदारी': क्या टेक्नोलॉजी से हल होगी समस्या?
NEET-UG को 2027 से पूरी तरह कंप्यूटर आधारित (CBT) फॉर्मेट में ऑनलाइन आयोजित करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।

ऑनलाइन मोड का समर्थन: ब्रिलियंट स्टडी सेंटर (पाला, केरल) के जनरल मैनेजर ईपी शिवकुमार का कहना है कि परीक्षा को पूरी तरह ऑनलाइन करने और अभ्यर्थियों को साल में एक से अधिक अवसर (Multiple Attempts) देने से छात्रों का मानसिक तनाव कम होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी।

टेक्नोलॉजी से परे नैतिक जिम्मेदारी: इसके विपरीत, कर्नाटक राज्य नीति एवं नियोजन आयोग के सदस्य प्रो. ए. नारायण ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीक से भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता। उनका कहना है, "ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिसे इंसान गलत इस्तेमाल न कर सके। जब तक परीक्षा तंत्र में बैठे लोग नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे और लालच नहीं छोड़ेंगे, तब तक कोई तकनीक काम नहीं करेगी।"

रटने की गति नहीं, डॉक्टर बनने के लिए चाहिए तर्क और संवेदना
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान NEET परीक्षा केवल एक तय पाठ्यक्रम से जवाब याद करने और सीमित समय में सही विकल्प चुनने (Recall & Speed) की क्षमता को परखती है, जबकि चिकित्सा पेशे के लिए व्यावहारिक समझ, सहानुभूति और नैदानिक तर्क (Clinical Reasoning) की जरूरत होती है।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: ब्रिटेन का UCAT टेस्ट छात्रों के नैतिक व व्यावहारिक दृष्टिकोण का मूल्यांकन करता है, जबकि अमेरिका का MCAT मनोविज्ञान और सामाजिक व्यवहार को विज्ञान के साथ जोड़ता है।

कोचिंग कल्चर का हावी होना: शिक्षाविदों ने चिंता जताई कि NEET की मौजूदा बनावट ने एक बड़े प्राइवेट कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जिससे केवल सक्षम पृष्ठभूमि वाले छात्र ही आगे निकल पाते हैं, जबकि गरीब व वंचित वर्ग पिछड़ जाता है।

24 लाख छात्र और महज 1.3 लाख सीटें: असंतुलन और बेरोजगारी का संकट
चेन्नई के शिक्षाविद डी. नेदुंचेझियन ने बताया कि NEET से जुड़ा तनाव मुख्य रूप से सीटों के भारी असंतुलन के कारण है।

मांग और आपूर्ति में भारी अंतर: देश में हर साल करीब 22 से 24 लाख छात्र NEET की परीक्षा देते हैं, जबकि पूरे देश में MBBS की केवल 1.3 लाख सीटें ही उपलब्ध हैं।

अन्य करियर विकल्पों का अभाव: छात्रों को MBBS के अलावा मेडिकल क्षेत्र के अन्य क्षेत्रों और करियर विकल्पों की सही जानकारी नहीं दी जाती, जिससे हर कोई एक ही दौड़ में शामिल हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि डिग्री पूरी करने के बाद भी युवा बेरोजगारी और अंडर-एंप्लॉयमेंट की समस्या से जूझ रहे हैं।

'संघीय ढांचे पर हमला': तमिलनाडु मॉडल और राज्यों की स्वायत्तता
जेएनयू (JNU) के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के पूर्व प्रोफेसर और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. मोहन राव तथा प्रो. नारायण ने NEET के राष्ट्रीय स्वरूप पर सवाल उठाते हुए इसे रद्द करने या राज्यों को अधिकार देने की वकालत की।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा पर असर: डॉ. मोहन राव के मुताबिक, NEET के कारण तमिलनाडु जैसे राज्यों को दूरदराज के इलाकों में डॉक्टर तैनात करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि कोचिंग से निकलकर आने वाले शहरी व संपन्न छात्र ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में काम करने से कतराते हैं।

राज्यों को मिले परीक्षा का अधिकार: विशेषज्ञों ने कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) में है, इसलिए राज्यों को अपनी मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की अनुमति मिलनी चाहिए। यदि केंद्रीकृत परीक्षा में धांधली होती है तो पूरा देश भुगतता है, जबकि राज्य स्तर पर इसका असर सीमित रहेगा।


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