
भारत का पुराना अलर्ट सिस्टम: नेपाल जैसी आपदाओं के आगे क्यों हुआ फेल?
नेपाल की भोटेकोशी से बिहार की गंडक तक बाढ़ का खतरा। एक्सपर्ट ज़ेरिन ओशो का दावा: 'डेंजर मार्क' का पुराना सिस्टम और इच्छाशक्ति की कमी भारत पर भारी।
AI With Sanket: नेपाल-चीन सीमा पर हाल ही में ग्लेशियल झील (Glacial Lake) के टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल नेपाल, बल्कि भारत की प्रशासनिक तैयारियों पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। 'इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट' (IGSD) के इंडिया प्रोग्राम की निदेशक ज़ेरिन ओशो के अनुसार, यदि सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशियाई सरकारें मिली हुई चेतावनियों पर कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं—तो भारत के लिए इसका खरा जवाब है: 'नहीं'।
'एआई विद संकेत' शो में बात करते हुए ज़ेरिन ओशो ने स्पष्ट किया कि यद्यपि किसी ग्लेशियर के ढहने का सटीक सेकंड कोई नहीं बता सकता, लेकिन ग्लेशियल झीलों के जमाव, पिघलती बर्फ और चरम मौसम के जोखिमों को पूरी तरह ट्रैक किया जा सकता है। असल विफलता विज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उपलब्ध वैज्ञानिक डेटा और तकनीक का उपयोग करने की प्रशासनिक इच्छाशक्ति का अभाव है।
दो देशों को जोड़ती एक नदी: नेपाल का संकट भारत के लिए रेड अलर्ट
नेपाल में आई बाढ़ का दायरा सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है:
भोटेकोशी से गंडक तक का सफर: जिस भोटेकोशी नदी में यह तबाही आई, वही आगे चलकर भारत के बिहार राज्य में गंडक नदी बन जाती है।
सैकड़ों किलोमीटर दूर तक जीवन का खतरा: नेपाल में या सैटेलाइट मॉनिटरिंग के माध्यम से मिलने वाली किसी भी अर्ली वार्निंग (प्रारंभिक चेतावनी) का सीधा असर भारत के उन समुदायों पर पड़ता है, जो सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर बसे हैं।
सटीक तकनीक की उपलब्धता: ओशो के अनुसार, आधुनिक सैटेलाइट इमेजरी, हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और फ्लड सिमुलेशन के जरिए आज यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि कौन सी सड़क, कौन सा मोहल्ला या कौन से घर जलमग्न होंगे।
'डेंजर मार्क' का पुराना और पुराना पड़ता सिस्टम
वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद भारत का बाढ प्रबंधन तंत्र आज भी दशकों पुराने 'डेंजर मार्क' (खतरे के निशान) प्रणाली पर टिका हुआ है:
पुरानी कार्यप्रणाली: इस सिस्टम में नदी का जलस्तर एक निश्चित सीमा को पार करने के बाद ही जिलों को अलर्ट जारी किया जाता है।
धीमी बाढ़ बनाम ग्लेशियल फ्लैश फ्लड: यह पारंपरिक तरीका धीमी और मौसमी बाढ़ के लिए तो ठीक हो सकता है, लेकिन नेपाल जैसी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) या अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड के सामने पूरी तरह विफल साबित होता है, जहां जलस्तर दिनों में नहीं, बल्कि कुछ घंटों में विनाशकारी रूप ले लेता है।
नीति निर्माताओं को चुनौती: जब सटीक गली-मोहल्ले स्तर की मैपिंग तकनीक उपलब्ध है, तो अलर्ट सिस्टम को अब भी पुराने ढर्रे पर क्यों चलाया जा रहा है?
तैयारी के बजाय केवल 'प्रतिक्रिया' (Reaction) की प्रवृत्ति
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, चेन्नई और केरल में बार-बार आने वाली आपदाओं का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि सरकारें हर बाढ़ या बादल फटने की घटना को एक अलग और आकस्मिक घटना मानकर निपटाती हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इसे एक नियमित और बढ़ते खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा है।
इस नीति का खामियाज़ा केवल जानमाल के नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि हर आपदा के बाद तबाह होते बुनियादी ढांचे, आजीविका के संकट और सार्वजनिक खजाने पर पड़ने वाले बोझ के रूप में सामने आता है।
वित्तीय सुरक्षा चक्र की कमी: इंश्योरेंस मॉडल की जरूरत
पूर्वानुमान के अलावा वित्तीय तैयारी में भी बड़ी कमी रेखांकित की गई है:
यूएस मॉडल का अध्ययन: भारत को अमेरिका के 'नेशनल फ्लड इंश्योरेंस प्रोग्राम' (NFIP) जैसे मॉडलों का अध्ययन करना चाहिए।
राहत कोष बनाम बीमा सुरक्षा: हर साल बाढ़ का सामना करने वाले संवेदनशील क्षेत्रों के लिए एक संरचित सार्वजनिक बीमा ढांचा होना अनिवार्य है। आपदा के बाद जारी की जाने वाली तात्कालिक आपातकालीन राहत निधियों की तुलना में यह स्थायी वित्तीय सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
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