
हिमाचल में 5 गुना बढ़ीं ग्लेशियर झीलें, क्या भारत में संभव है नेपाल जैसी बाढ़?
नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से तबाही के बाद भारत के लिए अलर्ट। हिमाचल में 525% बढ़ीं ग्लेशियर झीलें, जानिए भारत के 6 राज्यों पर कितना बड़ा खतरा है।
Nepal Flash Flood is Alaram For India: 26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा जिले में स्थित भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल नेपाल और तिब्बत में तबाही मचाई है, बल्कि भारत के लिए भी खतरे का बड़ा अलार्म बजा दिया है। तिब्बत की ओर स्थित किसी ग्लेशियर झील के अचानक फटने (Glacial Lake Outburst Flood - GLOF) से आई इस बाढ़ में 105 भारतीय पर्यटकों समेत 384 लोग लापता हैं और कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स ध्वस्त हो चुके हैं।
वैज्ञानिक चेतावनियों के मुताबिक, यह सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं है, बल्कि भारत के पूरे हिमालयी बेल्ट के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है। भारत के कम से कम 6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर GLOF का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
नेपाल जैसी तबाही भारत में क्यों संभव है? (वैज्ञानिक आंकड़े)
1. हिमाचल प्रदेश में 525% बढ़ीं ग्लेशियर झीलें
IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी की हालिया साझा रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 1990 में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं, जो 2024 तक बढ़कर 669 हो गईं।
इनमें से 88 झीलें अत्यंत संवेदनशील हैं।
9 झीलों को 'बेहद ज्यादा खतरनाक' श्रेणी में रखा गया है।
2. सिमुलेशन मॉडल: हर सेकेंड 35 लाख लीटर पानी का सैलाब
वैज्ञानिकों ने हिमाचल की दो प्रमुख झीलों पर सिमुलेशन मॉडल बनाकर देखा कि अगर इनका प्राकृतिक बांध टूटा तो क्या होगा:
हिमसू झील (ब्यास बेसिन): बांध टूटने पर 1,385 क्यूबिक मीटर/सेकंड (लगभग 14 लाख लीटर प्रति सेकंड) पानी बहेगा।
अनाम झील (सतलुज बेसिन): बांध टूटने पर 3,507 क्यूबिक मीटर/सेकंड (लगभग 35 लाख लीटर प्रति सेकंड) पानी का जलप्रलय आएगा, जो निचले इलाकों के कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और 588 इमारतों को सीधे तबाह कर सकता है।
3. हिमालय का बढ़ता तापमान
IIT खड़गपुर की जुलाई 2026 की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में ऊंचे हिमाचली क्षेत्रों का तापमान 1°C तक बढ़ चुका है। 'नेचर' मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि ग्लोबल वॉर्मिंग इसी तरह जारी रही तो अगले 70 वर्षों में हिमालय-काराकोरम इलाके की 65% बर्फ पिघल जाएगी।
भारत में पहले भी मच चुकी है GLOF से तबाही
नेपाल की घटना भारत के लिए नई नहीं है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र पहले भी ऐसी त्रासदियों का सामना कर चुका है:
केदारनाथ त्रासदी (उत्तराखंड, 2013): चोराबाड़ी ताल (ग्लेशियर झील) फटने और मूसलाधार बारिश के कारण आई बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।
चमोली हादसा (उत्तराखंड, 2021): रोंटी ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ में तपोवन-विष्णुगाड हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बह गया था और 200 से अधिक लोग मारे गए थे।
दक्षिण ल्होनाक झील हादसा (सिक्किम, 2023): सिक्किम की दक्षिण ल्होनाक ग्लेशियर झील के फटने से तीस्ता नदी में भयानक बाढ़ आई थी, जिसने चुंगथांग बांध को तोड़ दिया था और सेना के जवानों समेत कई लोगों की जान गई थी।
नेपाल बाढ़ का बिहार-यूपी पर सीधा असर
नेपाल की भोटेकोशी नदी आगे चलकर सुनकोशी और सप्तकोशी से मिलती है और नेपाल के हनुमान नगर (भीमनगर बराज) से होकर बिहार के सुपौल जिले के बीरपुर में प्रवेश करती है, जहाँ इसे कोसी नदी (बिहार का शोक) कहा जाता है।
2008 की कुसहा त्रासदी की यादें: 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी का तटबंध टूटने से नदी ने अपना प्राकृतिक रास्ता बदल लिया था, जिससे बिहार के 34 लाख लोग अचानक बेघर हो गए थे।
वर्तमान स्थिति: राहत की बात यह है कि इस बार भोटेकोशी में आई बाढ़ के बावजूद नदी ने अपना प्राकृतिक रास्ता नहीं बदला है। फिर भी, बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिलों समेत उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में हाई अलर्ट जारी किया गया है।
भारत के लिए क्या हैं बचाव के उपाय? (NDMA & ISRO)
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और इसरो (ISRO) के अनुसार, भारत को ऐसी त्रासदियों से बचने के लिए तुरंत ये कदम उठाने होंगे:
सैटेलाइट निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): ISRO के जरिए संवेदनशील झीलों की 24/7 निगरानी और झीलों में जलस्तर मापने वाले रडार व सेंसर लगाना।
नियंत्रित जल निकासी (Artificial Drainage): अत्यधिक जलभराव वाली झीलों से कृत्रिम नालियों के जरिए पानी का स्तर पहले ही कम करना ताकि प्राकृतिक बांध पर दबाव न बने।
पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों में कंस्ट्रक्शन पर नियंत्रण: हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित खनन, अंधाधुंध बुनियादी ढांचा निर्माण और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की समीक्षा करना।
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