शोर के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत जान? विक्रम सिंह की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल
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शोर के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत जान? विक्रम सिंह की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल

मणिपुरी संगीतकार चोंगथम विक्रम सिंह की शोर का विरोध करने के बाद कथित हमले में मौत ने ध्वनि प्रदूषण, नागरिक अधिकार और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला अब लाउडस्पीकर-DJ के नियमों, त्योहारों में बढ़ते शोर, कानून के कमजोर अमल और तेज आवाज़ से होने वाले स्वास्थ्य खतरों पर बड़ी बहस बन गया है।


चोंगथम विक्रम सिंह की जिस रात मौत हुई, उस रात उन्होंने कुछ ऐसा किया था जो भारत में अनगिनत लोग पहले भी कई बार कर चुके हैं, बिना यह सोचे कि ऐसा करना उनकी जान को खतरे में डाल सकता है।

वह दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के किलोकरी स्थित अपने घर से बाहर निकले और कथित तौर पर बाहर शोर-शराबा कर रहे लोगों के एक समूह से आवाज़ कम करने को कहा। इसके बाद कथित रूप से उन पर हमला हुआ, जिसमें 50 वर्ष से अधिक उम्र के मणिपुरी संगीतकार और संगीत शिक्षक गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन चोटों के कारण उनकी मौत हो गई। इस मामले में अब तक सात वयस्कों और एक नाबालिग को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कथित हमले से जुड़ी परिस्थितियों की जांच अभी जारी है।

संगीतकार की मौत में छिपी कड़वी विडंबना

सिंह की मौत में एक बेहद कड़वी विडंबना छिपी है। वह स्वयं एक संगीतकार थे और मणिपुर के शुरुआती रॉक संगीत परिदृश्य से जुड़े अग्रणी गिटारवादकों में से एक थे। दिल्ली आने के बाद उन्होंने करीब दो दशक तक संगीत सिखाया और युवा संगीतकारों को गिटार सीखने में मदद की। उन्होंने अलग-अलग संगीत परंपराओं से जुड़े कलाकारों के साथ काम किया था, जिनमें राजस्थानी गायक मामे खान भी शामिल हैं।

लेकिन 6 सितंबर की रात जो कुछ हुआ, उसके उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, अपने घर के बाहर किसी और द्वारा पैदा की जा रही उस आवाज़ पर उनकी आपत्ति—जो अब शोर की सीमा में पहुंच चुकी थी—उन्हें एक ऐसे टकराव तक ले गई, जिससे वह वापस नहीं लौट सके।

मणिपुरी संगीतकार चोंगथम विक्रम सिंह की कथित तौर पर अपने घर के बाहर हो रहे शोर का विरोध करने पर हुए हमले के बाद मौत हो गई।

क्या सिर्फ ध्वनि प्रदूषण का मामला है?

सिंह की मौत केवल ध्वनि प्रदूषण की कहानी नहीं है। कथित हमले की परिस्थितियों, आरोपियों की पहचान और उनके उद्देश्यों के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत के एक निवासी के खिलाफ नस्लीय पूर्वाग्रह की संभावित भूमिका की भी अलग से जांच किए जाने की आवश्यकता है।

लेकिन घटनाओं के जिस कथित क्रम की जानकारी सामने आई है, उसने महाराष्ट्र में भी एक परेशान करने वाली समानता पैदा की है। पुणे के नागरिक कार्यकर्ता विद्यानंद बापट त्योहारों के दौरान अत्यधिक शोर के खिलाफ अभियान चला रहे हैं और तेज आवाज़ वाले डीजे तथा एम्प्लीफाइड संगीत का विरोध करने के बाद उन्हें भी कथित तौर पर गाली-गलौज और शारीरिक हमले का सामना करना पड़ा है।

इंदौर की नागरिक अधिकार अधिवक्ता और कार्यकर्ता मैथिली पांडे दोनों मामलों के अलग-अलग होने को स्वीकार करते हुए इनके बीच मौजूद समानता की ओर ध्यान दिलाती हैं।

वह कहती हैं, “बापट हमले में बच गए और उन्होंने अपना अभियान जारी रखा, जबकि सिंह का टकराव उनकी मौत पर जाकर खत्म हुआ। लेकिन दोनों मामलों को एक अधिक बुनियादी बात जोड़ती है: दोनों ही मामलों में अत्यधिक शोर करने वालों से दूसरों का खयाल रखने की एक नागरिक की मांग को सामान्य नागरिक अधिकार के प्रयोग के बजाय दुश्मनी का कारण बना दिया गया।”

शोर का विवाद अब अदालतों तक पहुंचा

अब यह सवाल व्यक्तिगत टकरावों से आगे बढ़कर अदालतों तक पहुंच चुका है।

महाराष्ट्र में चल रहे गणेश उत्सव समारोह से पहले—इस साल यह वार्षिक त्योहार 14 से 25 सितंबर के बीच मनाया जा रहा है—नागरिक समूहों ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) सदानंद दाते और पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार को कानूनी नोटिस भेजा।

इस नोटिस में अत्यधिक शोर, उच्च क्षमता वाले साउंड सिस्टम और डीजे, लेजर शो, त्योहारों के मंडपों द्वारा सार्वजनिक सड़कों पर अनधिकृत कब्जे और बार-बार होने वाले उल्लंघनों के खिलाफ अधिकारियों द्वारा कार्रवाई न किए जाने को लेकर चिंता जताई गई। डीजीपी कार्यालय और पुणे पुलिस आयुक्त कार्यालय ने नोटिस मिलने की पुष्टि की, लेकिन इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

पुलिस की दुविधा—कानून लागू करें तो धार्मिक समूह नाराज

बेंगलुरु के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जो इन घटनाक्रमों पर करीब से नजर रख रहे थे क्योंकि कर्नाटक की राजधानी भी त्योहारों के मौसम के लिए तैयार हो रही थी, ने इस दुविधा को स्पष्ट शब्दों में रखा।

उन्होंने कहा, “यह अच्छी बात है कि नागरिक समूह सतर्क हो रहे हैं, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि पुलिस प्रशासन चाहे कुछ भी करे, वह हमेशा निशाने पर रहता है। अगर हम कानून के मुताबिक कार्रवाई करते हैं, तो धार्मिक समूह नाराजगी जताने लगते हैं।”

बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा मामला

27 अगस्त को बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर एक अलग अवमानना याचिका ने इस मुद्दे को और स्पष्ट रूप से अदालत के सामने रख दिया है।

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय मजदूर संघ, पुणे डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटीज एंड अपार्टमेंट्स फेडरेशन और पुणे डिस्ट्रिक्ट रिटेल ट्रेडर्स एसोसिएशन समेत छह याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि पुणे पुलिस ध्वनि प्रदूषण पर 20 अगस्त 2024 को जारी हाई कोर्ट के निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रही है।

इन निर्देशों में सुप्रीम कोर्ट के पहले के उस फैसले को दोहराया गया था जिसमें कहा गया था कि लाउडस्पीकर किसी भी धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं हैं। हाई कोर्ट के 2024 के निर्देशों में त्योहारों के दौरान डेसिबल सीमा के उल्लंघन को भी रेखांकित किया गया था।

‘त्योहारों पर रोक नहीं, कानून समान रूप से लागू हो’

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सत्य मुले त्योहारों का विरोध करने और त्योहारों के दौरान कानून लागू करने की मांग के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं।

वह कहते हैं, “हम उत्सवों या वैध सार्वजनिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं। हम केवल यह मांग कर रहे हैं कि कानून को समान रूप से लागू किया जाए। धार्मिक, राजनीतिक या व्यावसायिक गतिविधियों को निर्धारित शोर सीमा के उल्लंघन का बहाना नहीं बनने दिया जा सकता।”

भारत में ध्वनि प्रदूषण को लेकर क्या है कानून?

भारत में शोर को नियंत्रित करने के लिए कानूनी ढांचे की कोई कमी नहीं है।

ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल के लिए लिखित अनुमति आवश्यक है। कुछ निर्धारित अपवादों को छोड़कर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक है।

इन नियमों में आवासीय क्षेत्रों और साइलेंस जोन के लिए परिवेशीय शोर के मानक भी तय किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट एम्प्लीफाइड साउंड की अवधि और तीव्रता की सीमाओं समेत इस मुद्दे से बार-बार निपट चुके हैं।

कानून है, लेकिन कार्रवाई कहां?

समस्या यह नहीं है कि नागरिक कोई नया कानून चाहते हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर अवमानना याचिका जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा सवाल उठाती है।

मुले कहते हैं, “नागरिक पुलिस के पास जा रहे हैं और अत्यधिक शोर की शिकायत के लिए उपलब्ध हेल्पलाइन का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन कई मामलों में उन्हें जमीन पर प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती। अगर बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद उल्लंघन जारी रहें, तो शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।”

सिर्फ त्योहार नहीं—रैली, शादी, बार और पब का शोर भी सवालों में

त्योहारों के दौरान पुणे, मुंबई या महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक अथवा तेलंगाना के किसी भी अन्य शहर का ध्वनि-परिदृश्य परिचित है। डीजे, लाउडस्पीकर, ढोल, हॉर्न, संगीत वाद्ययंत्र और एम्प्लीफाइड संगीत देर रात तक जारी रह सकते हैं।

लेकिन याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर इस मुद्दे का दायरा बढ़ाया है और इसमें “राजनीतिक बैठकों और जुलूसों के साथ-साथ बार, पब, रेस्तरां और मनोरंजन केंद्रों” को भी शामिल किया है।

उनका तर्क सीधा है—ध्वनि प्रदूषण को ऐसी मौसमी समस्या नहीं माना जा सकता जो त्योहार के साथ सामने आए और पंडाल हटते ही खत्म हो जाए।

बापट भी यही बात कहते हैं। उनका कहना है कि उनका विरोध हर समुदाय के धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों, चुनावी प्रचार, शादियों, जुलूसों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से होने वाले अत्यधिक शोर पर समान रूप से लागू होता है।

‘शोर करने वाला कोई भी हो, नियम एक होना चाहिए’

बापट का मत है कि शोर को अपने आप में अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए, चाहे उसे पैदा करने वाला कोई भी हो। एक समुदाय द्वारा किए गए उल्लंघन को दूसरे समुदाय के उल्लंघन को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

उनका मानना है कि “जब शक्तिशाली एम्प्लीफिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल होता है, तब खुले सार्वजनिक स्थानों में डेसिबल का नियमन व्यावहारिक रूप से कारगर नहीं है, क्योंकि बहुत तेज आवाज़ पैदा करने में सक्षम डीजे या लाउडस्पीकर सिस्टम अनिवार्य रूप से उन लोगों को भी प्रभावित करेगा जिन्होंने उसमें शामिल होने का विकल्प नहीं चुना है।”

इसलिए वह चाहते हैं कि एम्प्लीफाइड संगीत को बंद और साउंडप्रूफ स्थानों तक सीमित किया जाए, जहां उसे सुनने के इच्छुक लोग ऐसा कर सकें और अनिच्छुक पड़ोसियों पर वह आवाज़ न थोपी जाए।

वह कहते हैं, “किसी विशेष ध्वनि स्तर का स्वीकार्य सीमा के भीतर होना इस बात का मतलब नहीं है कि आयोजकों को जानबूझकर उसी सीमा तक आवाज़ रखनी चाहिए, सिर्फ इसलिए कि वे ऐसा कर सकते हैं।”

उत्सव में शामिल होना आपकी पसंद, शोर सुनना पड़ोसी की पसंद नहीं

बापट का सबसे मजबूत तर्क ‘विकल्प’ के सवाल से जुड़ा है।

वह समझाते हैं, “किसी त्योहार में शामिल होने वाले व्यक्ति ने अपनी इच्छा से उसमें भाग लेने का फैसला किया है, जबकि उस उत्सव के पास रहने वाले निवासी ने ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना है। एक बार जब एम्प्लीफाइड आवाज़ घर के अंदर पहुंच जाती है, तो निवासी उससे बस बाहर निकलने का विकल्प नहीं चुन सकता। कोई बच्चा उसे सुनना बंद करने का फैसला नहीं कर सकता, न ही कोई मरीज, बुजुर्ग, परीक्षा की तैयारी कर रहा छात्र या वह व्यक्ति जिसे अगली सुबह काम के लिए उठना है।”

बापट का दावा है कि पुणे के कुछ पुराने इलाकों में गणेशोत्सव के दौरान शोर असहनीय हो जाने के कारण कई बार निवासियों को अपने घर छोड़ने तक के लिए मजबूर होना पड़ा है।

वह कहते हैं, “जब ऐसा होता है, तो सामंजस्य बैठाने का बोझ वास्तव में उस व्यक्ति से हटाकर, जो परेशानी पैदा कर रहा है, उस व्यक्ति पर डाल दिया जाता है जो उसे झेल रहा है।”

दो दशक से जारी ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई

मुंबई की पर्यावरणविद् सुमैरा अब्दुलअली की आवाज़ फाउंडेशन दो दशक से अधिक समय से ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रही है।

अब्दुलअली ने 2003 में गणपति उत्सव के दौरान शोर का दस्तावेजीकरण शुरू किया था। उनके आंकड़ों पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन कार्यवाहियों में भरोसा किया, जिनके परिणामस्वरूप साइलेंस जोन में लाउडस्पीकर को लेकर निर्देश जारी हुए।

इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने स्वीकार्य शोर स्तर, समय-सीमा और नियमों को लागू करने को लेकर बार-बार निर्देश जारी किए हैं।

फिर भी अब्दुलअली स्वीकार करती हैं, “निर्णायक कारक अक्सर कानूनी प्रावधानों की कमी के बजाय राजनीतिक इच्छाशक्ति रही है।”

उनके मुताबिक किसी विशेष वर्ष में सरकार और पुलिस नियमों को कितनी गंभीरता से लागू करती है, उसी के अनुसार शोर का स्तर बढ़ता या घटता है।

सिर्फ DJ बंद करने से समस्या खत्म नहीं होती

2019 में मुंबई के गणपति मंडलों ने नरेश दहीबावकर समेत मंडल नेताओं के साथ हुई बातचीत के बाद डीजे का इस्तेमाल बंद करने पर सहमति जताई थी।

लेकिन अब्दुलअली कहती हैं, “सिर्फ डीजे पर प्रतिबंध लगा देने से समस्या अपने आप खत्म नहीं होती, जब पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज़ को भी लाउडस्पीकर के जरिए बढ़ाया जाता है।”

उनके मुताबिक सवाल यह नहीं है कि आवाज़ डीजे, ढोल या किसी दूसरे वाद्ययंत्र से आ रही है। असली सवाल यह है कि आवाज़ कितनी तेज है और उसे कितनी दूर तक उन लोगों पर थोपा जा रहा है जिन्होंने इसके लिए सहमति नहीं दी है।

गणपति मंडलों में भी एक राय नहीं

महाराष्ट्र में त्योहारों के शोर को लेकर बढ़ते विरोध पर गणपति मंडलों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं है।

शिवाजीनगर के श्री गुरुदत्त मित्र मंडल के अध्यक्ष उदय महाले नियमन की जरूरत को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका तर्क है कि ध्वनि उत्सव के पैमाने और स्वरूप का हिस्सा है।

उनका मंडल दशकों से विसर्जन के दौरान डीजे का इस्तेमाल करता रहा है। वह चार-बेस और चार-टॉप की सीमा का समर्थन करते हैं, लेकिन कहते हैं कि सदस्य अब भी “गणपति विसर्जन के दौरान कम से कम एक दिन नाचने का आनंद लेने के लिए साउंड सिस्टम” चाहते हैं।

वहीं गरुड़ गणपति मंडल के अध्यक्ष सुनील कुंजीर बताते हैं कि उनका मंडल 26 साल से अधिक समय से बिना लाउडस्पीकर के आयोजन करता आया है। उनका मंडल और पड़ोसी गजानन मंडल एक दशक से एक ही ढोल-ताशा पथक साझा करते आए हैं, जबकि दोनों को दो-दो पथक रखने की अनुमति थी।

क्या राजनीति के कारण नियम लागू करने से डरती है पुलिस?

कार्यकर्ताओं का दावा है कि अक्सर राजनीति शोर की सीमा लागू करना और कठिन बना देती है।

अब्दुलअली आरोप लगाती हैं, “हर तरह के समारोहों में निहित राजनीतिक और व्यावसायिक हित होते हैं, जबकि पुलिस को कई बार डर रहता है कि सख्त कार्रवाई से कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।”

उनके मुताबिक इससे ऐसा असंतुलन पैदा होता है जिसमें राज्य किसी उल्लंघन को जारी रहने देने के परिणामों की तुलना में उसे रोकने के परिणामों को लेकर अधिक चिंतित हो सकता है।

शिकायत करने वाले ही बन रहे निशाना

यह असंतुलन तब विशेष रूप से चिंताजनक हो जाता है जब शिकायत करने वाले व्यक्ति से ही उन लोगों का सामना करने की उम्मीद की जाती है जो शोर के लिए जिम्मेदार हैं।

अब्दुलअली पर खुद दो बार मौखिक हमला हो चुका है—एक बार मुस्लिम त्योहार के दौरान और बाद में एक हिंदू त्योहार के दौरान। इनमें से एक घटना से संबंधित आपराधिक शिकायत मुंबई की एक अदालत में अभी लंबित है।

वह सिंह की हत्या को “उस प्रवृत्ति का भयावह रूप से बढ़ जाना बताती हैं जिसका सामना कार्यकर्ता वर्षों से करते आए हैं।”

उनका कहना है, “मौखिक और शारीरिक हमलों के कई अन्य उदाहरण हैं, हालांकि यह पहली रिपोर्टेड मौत है।”

तेज शोर सिर्फ परेशानी नहीं, स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन अत्यधिक पर्यावरणीय शोर को स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण खतरे के रूप में मान्यता देता है और इसके संपर्क को नींद में व्यवधान तथा हृदय संबंधी, मेटाबॉलिक, संज्ञानात्मक और सुनने से संबंधित विभिन्न प्रभावों से जोड़ता है।

अहमदाबाद के ईएनटी सर्जन डॉ. नरेश ढोलकिया के मुताबिक लंबे समय तक उच्च डेसिबल वाले शोर, विशेषकर 85 डेसिबल से अधिक, के संपर्क में रहने से आंतरिक कान की नाजुक हेयर सेल्स को अपरिवर्तनीय नुकसान हो सकता है।

ये सूक्ष्म कोशिकाएं ध्वनि संकेतों को मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं और एक बार क्षतिग्रस्त होने के बाद दोबारा विकसित नहीं होतीं। बार-बार तेज शोर के संपर्क में रहने से स्थायी रूप से सुनने की क्षमता कम हो सकती है।

तेज आवाज़ टिनिटस का कारण भी बन सकती है, जिसमें शोर वाले वातावरण से निकलने के बाद भी कानों में लगातार घंटी, भनभनाहट या गरजने जैसी आवाज़ महसूस होती रहती है।

120 डेसिबल पर दर्द, 150 डेसिबल पर फट सकता है कान का पर्दा

डॉ. ढोलकिया कहते हैं, “120 डेसिबल से अधिक शोर तत्काल दर्द और गंभीर असुविधा पैदा कर सकता है।”

लगभग 150 डेसिबल या उससे अधिक की आवाज़ इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि कान का पर्दा फट जाए।

बहुत तेज आवाज़ का प्रभाव सिर्फ कानों तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे शरीर में व्यापक तनाव प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकती है।

दिमाग को लगातार ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट’ मोड में रख सकता है शोर

मनोचिकित्सक डॉ. राजेंद्र बर्वे के मुताबिक लंबे समय तक उच्च डेसिबल वाले शोर के संपर्क में रहने से मस्तिष्क और शरीर लगातार शारीरिक तनाव की स्थिति में रह सकते हैं।

वह कहते हैं, “जब आप सचेत रूप से शोर को सुनना बंद कर देते हैं, तब भी मस्तिष्क बस बंद नहीं हो जाता।”

लगातार दखल देने वाली आवाज़ शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया प्रणाली को सक्रिय रख सकती है। इससे कॉर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोन निकलते रहते हैं और तंत्रिका तंत्र लगातार ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट’ यानी ‘लड़ो या भागो’ की स्थिति में बना रह सकता है।

समय के साथ इसका असर नींद, मनोदशा और भावनात्मक नियंत्रण पर पड़ सकता है, खासकर छोटे बच्चों और बुजुर्गों में।

‘ध्वनि प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा माना जाए’

इसीलिए अब्दुलअली का मानना है कि “ध्वनि प्रदूषण को अब केवल पर्यावरण से जुड़ी असुविधा के बजाय मुख्य रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए।”

उनका तर्क है कि नागरिकों को हानिकारक शोर से बचाने की अंतिम जिम्मेदारी सरकार की है।

बापट के अभियान पर सांस्कृतिक जगत की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि इस जिम्मेदारी को लेकर कितना विवाद पैदा हो चुका है।

अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी बापट की सबसे मजबूत समर्थकों में शामिल रही हैं। सोशल मीडिया पर एक खुले संदेश में उन्होंने बापट की नागरिक जागरूकता, स्पष्टता और दृढ़ता की प्रशंसा करते हुए उन्हें “एक सजग नागरिक की परिभाषा को फिर से लिखने” के लिए बधाई दी।

गायक, संगीतकार और फिल्म निर्माता अवधूत गुप्ते ने बापट के समर्थन में एक गीत लिखा और प्रस्तुत किया। उनके सोशल मीडिया पोस्ट में “#SupportBapat” और “#HatsOffBapat” जैसे हैशटैग शामिल थे।

अभिनेत्री आरती सोलंकी ने भी बापट का बचाव किया और डीजे तथा अत्यधिक शोर के उनके विरोध को गणेशोत्सव के विरोध से अलग बताया। कॉमेडियन पुनीत पानिया ने व्यंग्य के माध्यम से इस मुद्दे को उठाया।

हालांकि प्रतिक्रिया पूरी तरह सहानुभूतिपूर्ण नहीं रही। दुबई स्थित त्रिविक्रम ढोल-ताशा पथक से जुड़े संगीतकार सागर पाटिल जैसे कुछ लोगों ने बापट का मजाक उड़ाते हुए एक रैप जारी किया।

शोर की बहस अब ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ तक पहुंची

पांडे कहती हैं, “यह दिखाता है कि विवाद डेसिबल के तकनीकी सवाल से आगे बढ़ चुका है। यह सार्वजनिक व्यवहार, उत्सव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के परस्पर विरोधी विचारों के बीच संघर्ष बन गया है।”

बापट का अपना अनुभव दिखाता है कि यह संघर्ष कितनी तेजी से व्यक्तिगत हो सकता है और अत्यधिक शोर से शुरू हुआ विवाद किस तरह धार्मिक निष्ठा के सवाल के रूप में पेश किया जा सकता है।

सिंह की कथित हमले के बाद हुई मौत ने शोर पर चल रही बहस को एक भयावह नया आयाम दे दिया है।

फिल्म निर्माता शिरीष कुंदर ने सिंह की मौत के बाद लिखा:

“जब कोई व्यक्ति थोड़ी शांति और सुकून मांगता है, तो भीड़ यह सुनिश्चित कर देती है कि उसे वह हमेशा के लिए मिल जाए।”

‘शोर करने की आजादी और शांति मांगने की आजादी समान नहीं’

पांडे कहती हैं, “ये दोनों स्वतंत्रताएं समान नहीं हैं। साउंड सिस्टम चलाने वाले व्यक्ति के पास उसे बंद करने की क्षमता होती है। लेकिन उस आवाज़ के संपर्क में आने वाले व्यक्ति के पास उससे बचने की क्षमता जरूरी नहीं होती।”

वह कहती हैं कि निवासी खिड़कियां बंद कर सकता है, लेकिन शक्तिशाली एम्प्लीफिकेशन के सामने दीवारों और दरवाजों की भी सीमा होती है। परिवार घर छोड़ सकता है, लेकिन तब किसी दूसरे व्यक्ति के उत्सव की कीमत उस परिवार को चुकानी पड़ती है।

मुले कहते हैं कि कानून का अस्तित्व ही इसलिए है क्योंकि जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता के इस्तेमाल से दूसरों को नुकसान पहुंचता है, तब उसकी सीमाएं होती हैं।

वह उदाहरण देते हैं, “कोई रेस्तरां यह कहकर अपने पड़ोसी के घर में बिना उपचार वाला कचरा नहीं छोड़ सकता कि वह अपनी व्यावसायिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहा है। कोई वाहन एम्बुलेंस का रास्ता इस आधार पर नहीं रोक सकता कि चालक को सड़क इस्तेमाल करने का अधिकार है। कोई फैक्ट्री सिर्फ इसलिए प्रदूषक नहीं छोड़ सकती कि उसके मालिकों को व्यवसाय करने का अधिकार है। यही तर्क ध्वनि पर भी लागू होता है।”

उनके मुताबिक शोर को नियंत्रित करने में मुश्किल इसलिए आती है क्योंकि यह धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक या व्यावसायिक पहचान से जुड़ सकता है। लेकिन इसी कारण नियमों का मानक निष्पक्ष होना चाहिए।

डेसिबल का कोई धर्म नहीं होता। ध्वनि तरंग यह नहीं जानती कि उसे किस राजनीतिक दल ने पैदा किया है।

पांडे का मानना है कि अंततः यह मुद्दा इस सवाल से जुड़ा है कि शहरी भारत किस तरह का समाज बनना चाहता है।

वह कहती हैं, “सार्वजनिक स्थान अनिवार्य रूप से साझा स्थान होते हैं और उन्हें साझा करने के लिए उन लोगों से संयम की आवश्यकता होती है जिनके पास दूसरों पर खुद को थोपने की सबसे अधिक क्षमता होती है।”

समाज की असली परीक्षा—कितना तेज नहीं, क्या हम दूसरे की बात सुन सकते हैं?

मुले कहते हैं कि किसी समाज की नागरिक परिपक्वता की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह कितनी तेज आवाज़ में उत्सव मना सकता है, बल्कि यह है कि क्या वह उस व्यक्ति की बात सुन सकता है जो दूसरों का खयाल रखने की मांग कर रहा है।

वह कहते हैं, “बहुत लंबे समय से उस व्यक्ति से कहा जाता रहा है कि वह खुद को एडजस्ट करे, वहां से चला जाए, खिड़कियां बंद कर ले, कुछ घंटों तक इसे सहन कर ले या यह स्वीकार कर ले कि त्योहार इसी तरह मनाए जाते हैं।”

अब सवाल यह है कि क्या कानून, अदालतें और व्यापक संस्कृति कुछ अलग कहने के लिए तैयार हैं—कि किसी नागरिक को शोर सहते रहने और उसे बंद करने के लिए कहने पर हिंसा का जोखिम उठाने, इन दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।

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