7 अक्टूबर के तीन साल बाद: क्या इज़राइल पहले से ज्यादा सुरक्षित है?
x

7 अक्टूबर के तीन साल बाद: क्या इज़राइल पहले से ज्यादा सुरक्षित है?

तीन साल की जंग, गाज़ा की तबाही और हमास के नेतृत्व पर प्रहार के बावजूद इज़राइल के सामने स्थायी शांति और दीर्घकालिक सुरक्षा का सवाल अब भी कायम है।


सालों से, गाज़ा असल में एक खुली जेल जैसा था—पूरी तरह बंद, कड़े नियंत्रण वाला और जिस पर इज़राइली सेना समय-समय पर हमले करती रहती थी। हमास के हमले से पहले भी वहाँ के लोगों की ज़िंदगी मुश्किल थी: इज़राइल की नाकेबंदी, लोगों की आवाजाही पर रोक और बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी। गाज़ा में तंग हालात में रह रहे 20 लाख लोगों के लिए भविष्य भी उतना ही अंधकारमय लग रहा था।

फिर भी, 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल अचानक कमज़ोर और असुरक्षित स्थिति में आ गया। करीब 1,200 लोग मारे गए और 250 से ज़्यादा लोगों को अगवा करके गाज़ा ले जाया गया।

इज़राइल की खुफिया एजेंसी कहां चूक गई?
इज़राइल एक ऐसा देश है जो घुसपैठियों से निपटने के लिए हाई-टेक तकनीक का इस्तेमाल करता है। वहाँ बेहतरीन निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा के हर तरह के इंतज़ाम हैं ताकि कोई चूक न हो। फिर भी, उस मनहूस सुबह उसकी मशहूर खुफिया एजेंसियों—मोसाद और शिन बेट—की सुरक्षा व्यवस्था इज़राइली नागरिकों को बचाने में नाकाम रही।

इज़राइली खुफिया एजेंसियां ​​गाज़ा पट्टी में फिलिस्तीनियों को दबाने की इतनी आदी हो चुकी थीं कि उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि हमास इतना दुस्साहसी कदम उठा सकता है। या शायद वे अति-आत्मविश्वास का शिकार हो गई थीं।

भले ही यह बात चौंकाने वाली लगे, लेकिन हमास के हमले की योजना—जिसे इज़राइली खुफिया एजेंसियों ने 'जेरिको वॉल' (Jericho Wall) कोड-नाम दिया था—की जानकारी उन्हें 7 अक्टूबर से लगभग एक साल पहले ही मिल चुकी थी।

40 पन्नों के उस दस्तावेज़ में दक्षिणी इज़राइल पर कई तरफ से हमले की विस्तृत योजना थी। इसमें रॉकेटों की शुरुआती बौछार, सीमा पर लगे सुरक्षा कैमरों को बेकार करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल और पैराग्लाइडर व मोटरसाइकिल के ज़रिए हमास लड़ाकों की बड़े पैमाने पर घुसपैठ जैसी बातें शामिल थीं; इज़राइली लोगों को बंधक बनाने की कोशिश समेत ये सारी बातें उन्हें पता थीं। बस, हमले के समय की जानकारी नहीं थी।


जब हमास के बारे में गलत अंदाज़ा लगाया गया
इतनी सारी जानकारी होने के बावजूद, इज़राइली अधिकारियों को यकीन नहीं था कि हमास उस ब्लूप्रिंट को अंजाम दे सकता है। उनका मानना ​​था कि हमास का मकसद सिर्फ़ गाज़ा पर कब्ज़ा करना है। 2006 के चुनावों के बाद सत्ता के लिए हुए संघर्ष में फ़तह (फिलिस्तीनी अथॉरिटी की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी) को गाज़ा से बाहर कर दिया गया। जून 2007 तक, उस इलाके पर हमास का पूरा कब्ज़ा हो गया।

हालात में आए इस बदलाव से इज़राइल खुश था। वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी अथॉरिटी को कमज़ोर करते हुए गाज़ा में हमास को मज़बूत करना, एक एकजुट फिलिस्तीनी राजनीतिक ताकत के मुकाबले ज़ायोनी देश के लिए ज़्यादा फायदेमंद था। इसलिए हमास एक ऐसा गुट था जिसके साथ इज़राइल काम कर सकता था।

भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला मोहम्मद अबू शावेश के अनुसार, "नेतन्याहू ने आधिकारिक तौर पर कतर से गाज़ा को बड़ी मात्रा में आर्थिक मदद देने का अनुरोध किया, और इस पैसे के ट्रांसफर को मंज़ूरी दी और उसमें मदद की।"

पद संभालने के बाद से नेतन्याहू की रणनीति हमास को काबू में रखने, फिलिस्तीनी मुद्दे को सुलझाने के बजाय गाज़ा के हालात को मैनेज करने, और सैन्य ताकत व आर्थिक दबाव का इस्तेमाल करके संघर्ष को बड़े युद्ध में बदलने से रोकने की थी। लेकिन उस जानलेवा हमले ने इस सोच को तोड़ दिया कि हमास को काबू में रखा जा सकता है।

7 अक्टूबर की नाकामी
7 अक्टूबर की घटना इज़राइली सरकार की नाकामी भी थी। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, जानकारी मौजूद थी लेकिन उसे गलत समझा गया या नज़रअंदाज़ कर दिया गया। हमले से कुछ घंटे पहले भी हमास की असामान्य गतिविधियाँ देखी गई थीं, लेकिन बॉर्डर को पूरी तरह से अलर्ट पर नहीं रखा गया।

हाल की रिपोर्टों से पता चला है कि नेतन्याहू को 7 अक्टूबर से पहले मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की खुफिया एजेंसियों से चेतावनी मिली थी, जिससे इस बहस में एक नया पहलू जुड़ गया है।

इज़राइल के जाने-माने अंग्रेज़ी अख़बार 'हारेट्ज़' में छपी एक सनसनीखेज रिपोर्ट के अनुसार, UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद ने नेतन्याहू को हमास की ओर से किसी बड़ी कार्रवाई की संभावना के बारे में चेतावनी दी थी। नेतन्याहू के कार्यालय ने साफ तौर पर ऐसी किसी बातचीत से इनकार किया है। अख़बार के मुताबिक, नेतन्याहू ने किसी अज्ञात वजह से यह जानकारी अपने तक ही सीमित रखी और इसे सेना के अपने वरिष्ठ कमांडरों तक नहीं पहुँचाया।

युद्ध की कीमत
7 अक्टूबर की घटना के जवाब में इज़राइल ने अपनी सैन्य ताकत और बेरहमी का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया। इज़राइल इस क्षेत्र की सबसे बड़ी सैन्य ताकत बनकर उभरा; उसने हमास के उस पूरे राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को खत्म कर दिया, जिसने यहूदी देश को चुनौती देने की हिम्मत की थी। गाज़ा मलबे में तब्दील हो गया और बच्चों व महिलाओं समेत 74,000 लोग मारे गए।

शुरुआत में इज़राइल के प्रति जो सहानुभूति थी, वह कुछ ही महीनों में गायब हो गई, क्योंकि दुनिया भर में IDF की कार्रवाई के वीडियो फैल गए। इज़राइल की बेरहमी और जिनेवा कन्वेंशन के तहत तय युद्ध के नियमों को न मानने के कारण उस पर नरसंहार के आरोप लगे। इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने नेतन्याहू पर आरोप तय किए और उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। आज इज़राइल के बहुत कम दोस्त बचे हैं, और इससे भी अहम बात यह है कि उसने कई अमेरिकी वर्गों का काफी समर्थन खो दिया है।

राजनयिक असर
इसकी एक राजनयिक कीमत भी चुकानी पड़ी। डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर की मध्यस्थता में हुए 'अब्राहम समझौते' का मकसद इस इलाके में इज़राइल को मान्यता दिलाना था।

UAE और बहरीन ने सबसे पहले 2020 में इस समझौते पर दस्तखत किए और इज़राइल के साथ सामान्य संबंध बनाए। इसके बाद मोरक्को, सूडान और कज़ाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया।

हालांकि, असली कामयाबी सऊदी अरब को साथ लाना था, जो खाड़ी इलाके में सबसे अहम सुन्नी ताकत है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ऐसा करने के इच्छुक थे। लेकिन हमास के हमले ने इस कदम को रोक दिया। भले ही वहां का शाही परिवार इसे आगे बढ़ाना चाहता था, लेकिन देश की मस्जिदों और बाज़ारों में आम लोगों की राय ने शासकों को जनता की इच्छा के खिलाफ जाने से रोक दिया।

तो, शानदार सैन्य सफलता के बावजूद, तीन साल बाद ज़्यादा अहम सवाल यह है कि क्या उस ताक़त ने इज़राइल को ज़्यादा सुरक्षित बनाया?

इसका जवाब है - नहीं। इस युद्ध ने इज़राइल की तबाही मचाने की ज़बरदस्त क्षमता तो दिखाई, लेकिन लंबे समय तक चलने वाली सुरक्षा बनाने की उसकी काबिलियत नहीं।

लंबी अवधि की कोई सोच नहीं
नेतन्याहू की सबसे बड़ी विफलता यह है कि उनके पास सैन्य सफलता से आगे की कोई लंबी अवधि की सोच नहीं है। इज़राइल हमेशा युद्ध की स्थिति में नहीं रह सकता और उसे कभी न कभी शांति स्थापित करनी ही होगी। नेतन्याहू 1993 के ओस्लो शांति समझौते के कड़े विरोधी थे। 7 अक्टूबर के बाद, ज़्यादा से ज़्यादा आम इज़राइली नागरिक यह मानने लगे हैं कि वे फ़िलिस्तीनियों के साथ शांति से नहीं रह सकते। नेतन्याहू की तरह ही, इज़राइल का राजनीतिक विपक्ष भी 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का विरोध करता है।

अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों जैसे इज़राइल के समर्थकों को यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि फ़िलिस्तीनियों को न्याय दिए बिना केवल इज़राइली भावनाओं को खुश करने से व्यापक खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता नहीं आ सकती।

जब तक इज़राइल फ़िलिस्तीनियों को उचित अधिकार देने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक हमास के हमले के बाद के इन तीन विनाशकारी वर्षों से कोई सबक नहीं सीखा जा सकेगा। जहाँ तक हमास के हमले की बात है, तो उससे गाज़ा के लोगों को केवल तकलीफ़ ही मिली।

Read More
Next Story