
पीएम केयर्स फंड भी इलेक्टोरल बॉन्ड जैसा अपारदर्शी: अंजलि भारद्वाज
FY 2024-25 ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा: PM CARES के 8,500 करोड़ रुपये के बैलेंस में से केवल 87 लाख खर्च। अंजलि भारद्वाज और अंजलि दमानिया ने उठाए सवाल।
AI with Sanket: वित्तीय वर्ष 2024-25 (FY 2024-25) की नई ऑडिट रिपोर्ट सामने आने के बाद 'पीएम केयर्स फंड' (PM CARES Fund) की कार्यप्रणाली और इसकी पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, फंड के पास मौजूद लगभग 8,500 करोड़ रुपये के विशाल कुल बैलेंस में से इस पूरे वित्त वर्ष के दौरान केवल 87 लाख रुपये ही जनहित में खर्च किए गए।
यानी फंड की कुल रकम का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में निष्क्रिय (idle) पड़ा रहा। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'AI With Sanket' में पारदर्शिता कार्यकर्ताओं (Activists) ने इस ऑडिट रिपोर्ट के हवाले से सरकार की मंशा और फंड के ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
इलेक्टोरल बॉन्ड जैसा अपारदर्शी ढांचा और 'क्विड प्रो क्वो' की आशंका
पारदर्शिता और जवाबदेही कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने शो पर बात करते हुए तर्क दिया कि पीएम केयर्स फंड का अपारदर्शी ढांचा बंद हो चुकी विवादित 'इलेक्टोरल बॉन्ड' योजना से काफी मिलता-जुलता है।
क्विड प्रो क्वो (लेन-देन) का जोखिम: अंजलि भारद्वाज ने चेतावनी दी कि चूंकि प्रधानमंत्री और वरिष्ठ केंद्रीय कैबिनेट मंत्री इस फंड को निजी ट्रस्टी के रूप में संचालित करते हैं, इसलिए इसमें वित्तीय लेन-देन या राजनीतिक संरक्षण (quid pro quo) की भारी संभावना बनी रहती है। बड़ी रकम दान करने वाली कॉरपोरेट कंपनियों को बदले में सरकारी अनुबंध (Contracts), नियामक छूट या नीतिगत लाभ मिलने की आशंका बनी रहती है।
FCRA से विशेष छूट: पीएम केयर्स फंड को 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट' (FCRA) से विशेष कानूनी छूट दी गई है। हालांकि ऑडिट रिपोर्ट से पता चलता है कि कुल प्राप्तियों में विदेशी धन का हिस्सा बहुत कम है, लेकिन FCRA में मिली इस छूट के कारण यह ट्रस्ट बिना किसी सामान्य वैधानिक जांच (Statutory Checks) के अज्ञात विदेशी फंड भी स्वीकार कर सकता है।
राहत कोष या सेविंग्स स्कीम? प्राकृतिक आपदाओं के बीच फंसा फंड
एंटी-करप्शन एक्टिविस्ट अंजलि दमानिया ने 93% रकम के फिक्स्ड डिपॉजिट में बंद रहने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, इन फिक्स्ड डिपॉजिट से फंड को 469 करोड़ रुपये का ब्याज राजस्व मिला है।
आपदा पीड़ितों को मदद नहीं: अंजलि दमानिया ने सवाल उठाया कि जब यह राहत फंड बैंक खातों में बंद पड़ा है, तब असम, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के पीड़ितों को पीएम केयर्स से कोई वित्तीय सहायता या वितरण नहीं किया गया।
लोक कल्याण में हो सकता था इस्तेमाल: उन्होंने कहा कि ट्रस्टी एक साधारण प्रस्ताव पास करके इस निष्क्रिय पड़ी रकम को जर्जर सरकारी अस्पतालों के अपग्रेडेशन या सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारने में लगा सकते थे। लेकिन जनता की राहत के बजाय यह पैसा केवल बैंकिंग संस्थानों में जमा पड़ा हुआ है।
RTI और CAG जांच के दायरे से बाहर क्यों?
पीएम केयर्स फंड की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के चरम दौर में राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए एक समर्पित राहत कोष के रूप में की गई थी।
सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) का दर्जा वापस लिया: शुरुआती दिनों में इसे एक सार्वजनिक इकाई घोषित किया गया था, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के 'सीएसआर' (CSR) फंड से 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि तेजी से एकत्र की गई। लेकिन जब नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने आरटीआई (RTI) आवेदन दायर कर चंदे के स्रोतों और खर्च का ब्योरा मांगा, तो केंद्र सरकार ने अपना रुख बदल लिया।
ना CAG ऑडिट, ना आरटीआई: सरकार ने अदालत में दावा किया कि पीएम केयर्स कोई सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है और न ही इसे सरकार द्वारा बनाया गया है। इसके चलते इसे आरटीआई अधिनियम (RTI Act) के दायरे से बाहर कर दिया गया। इसके अलावा, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा इसकी जांच नहीं की जाती, बल्कि इसके लिए निजी ऑडिटिंग फर्मों (Private Auditors) पर भरोसा किया जाता है।
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