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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से आगे की लड़ाई! राहुल गांधी ने मोदी-शाह को कैसे घेरा?

दिल्ली में लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों और केंद्रीय मंत्रियों के पलटवार के बीच क्या राहुल गांधी की नई रणनीति मोदी सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन रही है?


नमस्कार द फेडरल देश के खास कार्यक्रम शनी से संवाद में आप सभी का स्वागत है। पिछले दो हफ्ते से राजधानी दिल्ली में जो कुछ भी हो रहा पूरे देश की उस पर नजर है। 2 अक्टूबर से दिल्ली में पहले छात्र संगठनों से जुड़े लोग ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू किया। 6 अक्टूबर से राजनीतिक दल इसमें कूदे। इंडिया ब्लॉक ने संसद से आकाशवाणी तक हालांकि वह चुनाव आयोग तक जाना चाहते थे मार्च निकाला।

राहुल गांधी और तमाम सांसदों को नहीं जाने दिया गया। इसके बाद हमने देखा सागर रत्ना की पॉलिटिक्स। फिर हमने देखा एक मोइट्स रेस्टोरेंट की पॉलिटिक्स। फिर तमाम सांसद राष्ट्रपति भवन भी गए और फिर दिल्ली चलो के तहत बाराखंभा सीपी से सुप्रीम कोर्ट तक का मार्च निकाला। अब सवाल उठता है कि इन तमाम प्रदर्शनों के बीच सरकार पे फिलहाल इसका क्या असर है? तमाम मंत्री पीयूष गोयल, शिवराज सिंह चौहान, ललन सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ और अमित शाह ये सभी अब निकल कर सामने आए। प्रवक्ता को किनारे कर दिया गया। अब सारे मंत्री निकलकर राहुल गांधी पर हमला बोल रहे हैं।

इंडिया ब्लॉक पर हमला बोल रहे हैं। तो आखिरकार चल क्या रहा? इसी को हम समझेंगे और हमारे साथ हमारे एयर चीफ एस श्रीनिवासन जी श्रेणी से संवाद खास कार्यक्रम में जुड़ चुके हैं। उनसे हम समझते हैं भारत की राजनीति के इस नब्ज को जो कि बहुत ही अब रोचक होता जा रहा है। तो सर सबसे पहले आपका बहुत-बहुत स्वागत और सर आप तो दिल्ली से दूर हैं।

लेकिन फिर भी आप दर्शकों को बताएं कि ये कैसे हालात हैं। अचानक से 2 अक्टूबर से गांधी जयंती के दिन से प्रोटेस्ट शुरू हुआ। दो हफ्ता आज भी प्रोटेस्ट दिल्ली के सड़कों पर हुआ जो कि अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के स्टूडेंट्स विंग ने किया है और ये कैसी तस्वीर देखने को मिल रही?

श्रीनिवासन : देखिए दिल्ली में जो हो रहा है एक एक नए तरह का एक राजनीति देखने को मिल रही है। यदि आप ध्यान से देखें तो राहुल गांधी जी बहुत दिनों से इस बात को उठाते आ रहे हैं कि चुनाव जिस तरीके से कराया जा रहा है इस देश में उसमें गड़बड़ियां हैं। उन्होंने एक जो शब्द है चुनाव चोरी उस का भी प्रयोग किया है और वो लगातार इस बात को उठाते आ रहे हैं। आपने देखा कि महाराष्ट्र में उन्होंने कुछ वहां के जो असेंबली सेगमेंट्स हैं उसको लिया। कर्नाटक में जो कुछ एक दो जो असेंबली सेगमेंट्स है उनको लिया और उन्होंने ये कहने की कोशिश की किस तरीके से इलेक्टोरल रोल का जो है वो एक तरीके से उसको बदला जा रहा है। कुछ ना कुछ इस तरह के चीजें बदलाव लाए जा रहे हैं। जिससे जो है अ जो विपक्ष है उनके लोग या कुछ समुदाय के लोग या कुछ जाति के लोग उन लोगों को हटाया जा रहा है और उनको उनके वोटों से वंचित किया जा रहा है। देखिए इस बात पे विपक्ष के बाकी पार्टियों ने भी और कई समाज के लोगों ने भी कई लोगों ने खास ध्यान नहीं दिया। उनको लगा कि राहुल गांधी जो हैं क्योंकि दूसरी तरफ बीजेपी का बहुत तगड़ा प्रोपेगेंडा था कि राहुल लगातार चुनाव हार रहे हैं। 100 से ज्यादा चुनाव हार चुके हैं। उनको कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तो वो अपना पूरा का पूरा हार का जो ठीकरा है वो सरकार के सिर पे फोड़ रहे हैं। और ये जो कह रहे हैं सब असत्य है। इसी बात को बीजेपी कहती आ रही है।


मगर जब से अह इंडियन एक्सप्रेस का वह जो आपने देखा और उसमें जो खबर छपी कि दो चुनाव आयोग के दो बड़े अधिकारी वहां पर चुनाव आयोग चीफ इलेक्शन कमिश्नर उसके अलावा दो कमिश्नर्स के साथ बनके तीन मेंबर का एक टीम है और तीनों बराबरी का उनका वो है। अह उनका स्थान जो है तीनों का बराबरी का है। मगर उसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर उनमें पहले नंबर पर आते हैं। तो उनके खिलाफ उन लोगों ने 14 चिट्ठियां लिखी 10 दिन में कहा कि कई जो चीजें हो रही हैं इलेक्शन कमीशन के जो अंदरूनी जो कारवाई हो रही है वो सब ठीक नहीं है और इसको इसमें उनको आपत्ति है। कई तो डिसिशन उनका यह कहना है कि हमें पता भी नहीं कि कैसे लिया गया है और कई ऐसे जो बहुत ही मुख्य और महत्वपूर्ण निर्णय हैं उसमें उनका कोई रोल ही नहीं था। जबकि चुनाव आयोग में तीनों अधिकारी मिलके कॉन्स्टिट्यूशन बॉडी है। मगर यह है कि तीनों मिलके कोई बड़ा कोई भी कोई निर्णय होगा साथ लेंगे। वो भी नहीं हो रहा था। तो ये सब बातें आने के बाद लोग इस बात को समझने लगे हैं कि कहीं ना कहीं कुछ गड़बड़ी है और उसके बाद आपने देखा है कि क्या हुआ। उसके पहले बंगाल में जो एसआर का जो पूरा का पूरा जो खेल हुआ और फिर वहां पर ट्राइबनल बिठाए गए 37 लाख लोगों के नाम उसमें से नहीं है और भी सुनवाई हो रही है एक के बाद एक इन सब चीजों को लेके अब जो है मामला जो है दूसरी तरीके से अब तूल पकड़ रहा है और आपने पूछा है कि राहुल गांधी जी राहुल गांधी का ये किस तरीके का एक रोज एक नया जो है आंदोलन खड़ा कर रहे हैं। कभी जो है किसी रेस्टोर में चाय पी रहे हैं तो कहीं खाना खा रहे हैं तो कहीं पर सीजेआई के दफ्तर के बाहर दस्तखत दे रहे हैं। कहीं ऑल इंडिया रेडियो के भवन में घुस रहे हैं। कहीं कुछ कर रहे हैं। तो वो सरकार को एक तरीके से चकमा दे रहे हैं। रोज एक नई-नई युक्तियां अपना रहे हैं। उनको यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके उनको उनके समझ में आने के पहले अगले दिन कोई एक नया काम कर रहे हैं। तो एक नई तरह का पॉलिटिक्स संजो रहे हैं। विपक्ष की एक नए तरह का एक राजनीति है जिसमें वह युवाओं को या फिर जैसे आयशा की जो लीडर हैं नेहा बोरा हैं। या फिर जैसे आयशा की जो लीडर हैं नेहा बोरा हैं। उनको साथ लेके उसके अलावा विपक्ष के सभी लोगों का सबको लामबंद करके वो एक तरीके से एक नया एक सरकार के प्रति एक विरोध का एक नया एक जो है सूरत पेश कर रहे हैं। तो सर क्या ज्ञानेश कुमार क्योंकि पूरे केंद्र में ज्ञानेश कुमार है। स्टूडेंट्स जो प्रोटेस्ट कर रहे हैं वो ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। पॉलिटिकल पार्टियां ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।


तो क्या ज्ञानेश कुमार ने इस समय मोदी सरकार को मुश्किलों में डाल दिया है?

श्रीनिवासन : हां जी ठीक कहा आपने। ज्ञानेश कुमार पूरा का पूरा जो सरकार के खिलौ खिलाफ जो विद्रोह है उसका एक केंद्र बिंदु बन गए हैं। देखिए अह ये इसलिए हुआ कि आप थोड़ा सा पीछे जाए तो जुलाई 20 तारीख को जो घटना हुई जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी ने यह दिखाया कि यदि सब लोग मिलके यदि जोर लगाते हैं तो किसी एक मंत्री को हटाया जा सकता है। उस दिन जो बहुत बड़ा वहां पर एक विरोध हुआ उसके कारण धर्मेंद्र प्रधान जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उसके पहले यदि आप याद करें तो सरकार ने यह कहा था कि हमारे यहां जैसे आपने सुना होगा उनके जो वरिष्ठ मंत्री हैं डिफेंस मिनिस्टर उन्होंने ये कहा राजनाथ सिंह जी ने ये कहा था कि देखिए हमारे यहां ये व्यवस्था नहीं है और ना ही ये कोई यहां का हमारे कार्यशैली में इस तरह से कोई जो है रेग्नेशन नहीं देते हैं कैबिनेट मिनिस्टर मगर उनको देना पड़ा धर्मेंद्र प्रधान जी को जाना पड़ा। उसके बाद से शायद लोगों को थोड़ी हिम्मत आई और उनको यह समझ में आया कि देखिए अभी तक जितने विरोध हो रहे थे उन विरोधों का कोई जवाब नहीं मिल रहा था। देखिए कोई भी बात हो उसको जो है केस एक तरीके से अह वो जो है आगे मामला बढ़ता ही नहीं था कि कहीं कहीं ना कहीं जाके सब जो मामले जो है बंद हो जाते थे। तो लोगों ने सोचा कि शायद यह मामला भी वैसे ही हो जाएगा। मगर राहुल जो है उसके विपरीत इस मामले को एक प्रकार से जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए आप रोज एक नए-नए तरीके के विरोध आप देख रहे हैं। तो सर मुख्य सवाल यह उठता है कि वो ज्ञानेश कुमार पे तो अटैक कर रहे हैं। लेकिन वो साथ में यह भी कह रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार अप्रूवर बन जाए क्योंकि उनको पता है कि वो कह रहे हैं कि यह फैसला ज्ञानेश कुमार नहीं है। ज्ञानेश कुमार तो केवल मात्र इंप्लीमेंटर है। इसको इस निर्णय को लेने वाला कोई और है। उसमें मोदी अमित शाह का नाम वो बिल्कुल बेझिझक वो ले रहे हैं। तो क्या वो कह रहे हैं कि अप्रूवर बन जाए। ये ये उनकी क्या रणनीति है? वो कह रहे हैं कि अगर अप्रूवर बन जाए तो हम उनको माफ भी कर सकते हैं। हालांकि उन्होंने जो गलती की वो माफी के लायक नहीं है। लेकिन क्या ज्ञानेश कुमार के जरिए प्रधानमंत्री मोदी पे को घेरने की कोशिश है इस सरकार को के जो हाईएस्ट जो ऊपर बैठे लोग हैं उनको घेरने की कोशिश है? अब बिना बिना किसी शक के वही कोशिश हो रही है। जैसे आपने पहले पूछा तो आपका यही सवाल था ज्ञानेंद्र कुमार क्यों एक बिंदु बन गए हैं इसके वो एक मुख्य बिंदु बन गए हैं। जैसे उन्होंने धर्मेंद्र प्रसाद प्रधान जी को हटा हटवाया। इसी तरीके से अब लोग कह रहे हैं कि हम जो है ज्ञानेश कुमार जी को हटाएंगे।

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