
'सतलुज' हटाने का फैसला सही या गलत? पूर्व अफसर और अकाली दल आमने-सामने
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' हटाए जाने के बाद सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कानूनी व राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' को लेकर विवाद एक बार फिर सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में ले आया है। फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर कुछ समय के लिए उपलब्ध होने के बाद हटा दी गई, लेकिन पाइरेसी और निजी स्क्रीनिंग के जरिए यह लगातार लोगों तक पहुंच रही है।
'एआई विद संकेत' कार्यक्रम में द फेडरल ने पंजाब के पूर्व विशेष मुख्य सचिव और अमृतसर के पूर्व डिप्टी कमिश्नर करणबीर सिंह सिद्धू तथा शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के प्रधान सलाहकार एच.एस. बैंस से बातचीत कर इस विवाद से जुड़े कानूनी, राजनीतिक और संवैधानिक पहलुओं पर चर्चा की।
सेंट्रल बोर्ड की लंबी जांच
करणबीर सिंह सिद्धू ने बताया कि फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की मंजूरी पाने में करीब साढ़े तीन साल लगे। इस दौरान बोर्ड ने कथित तौर पर 120 से अधिक कट लगाने के सुझाव दिए थे।उनके अनुसार, निर्माताओं ने प्रमाणन प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को चुनौती दी, लेकिन अंततः सुझाए गए सभी बदलाव किए बिना ही फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया।
सिद्धू ने कहा कि रिलीज के लगभग 48 घंटे के भीतर फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया, लेकिन इसके पीछे की वजह पर अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। उनके मुताबिक, यह स्पष्ट नहीं है कि फिल्म हटाने का फैसला ओटीटी प्लेटफॉर्म, निर्माताओं या सरकार के किसी निर्देश के तहत लिया गया। आधिकारिक स्पष्टीकरण के अभाव में इस फैसले को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
पंजाब के उग्रवाद का ऐतिहासिक संदर्भ
सिद्धू ने कहा कि 1980 और 1990 के शुरुआती वर्षों में पंजाब लंबे समय तक उग्रवाद से जूझता रहा, जिसमें आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों और उग्रवादियों—सभी की बड़ी संख्या में मौतें हुईं।उन्होंने कहा कि उस दौर पर आधारित किसी भी फिल्म या चर्चा में केवल एक पक्ष नहीं, बल्कि पूरे सुरक्षा परिदृश्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि उग्रवाद के दौरान हजारों नागरिक और सुरक्षा बलों के जवान मारे गए थे। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद से निपटने में लगी थीं, इसलिए उस समय की परिस्थितियों को समझना किसी भी सिनेमाई प्रस्तुति का मूल्यांकन करने के लिए जरूरी है।
जसवंत सिंह खालड़ा मामले की जांच
सिद्धू ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सितंबर 1995 में जब जसवंत सिंह खालड़ा लापता हुए, तब वे अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर थे।उन्होंने कहा कि खालड़ा के परिवार ने प्रशासन को बताया था कि कुछ अज्ञात लोग, जिनके पुलिसकर्मी होने का संदेह था, उन्हें अपने साथ ले गए हैं। इसके बाद उन्होंने तत्काल अमृतसर और तरनतारन पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन दोनों ने खालड़ा को हिरासत में लेने से इनकार कर दिया।सिद्धू के अनुसार, उन्होंने तुरंत मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खालड़ा के परिवार की ओर से भेजे गए पत्राचार को हेबियस कॉर्पस याचिका मानते हुए मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फिल्म
फिल्मों में रचनात्मक स्वतंत्रता के सवाल पर सिद्धू ने कहा कि वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्मों में कुछ हद तक रचनात्मक व्याख्या स्वाभाविक होती है।हालांकि, उनका मानना है कि 'सतलुज' अन्य विवादित फिल्मों से अलग है क्योंकि इसमें भारतीय राज्य और सुरक्षा बलों को उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान व्यवस्थित हिंसा के लिए जिम्मेदार के रूप में दिखाया गया है।
सिद्धू ने कहा कि ऐसे चित्रण के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं क्योंकि इसमें गैर-राज्य तत्वों के बजाय सरकारी संस्थाओं को केंद्र में रखा गया है। उन्होंने माना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन भारतीय संविधान कुछ परिस्थितियों में उस पर उचित प्रतिबंध लगाने की भी अनुमति देता है।
क्या फिल्म हटाने का फैसला उल्टा पड़ गया?
सिद्धू का मानना है कि फिल्म को हटाने का निर्णय अपने उद्देश्य में सफल नहीं दिखता।उन्होंने कहा कि फिल्म पाइरेसी, व्हाट्सऐप और निजी स्क्रीनिंग के जरिए बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच गई है। संभव है कि प्रतिबंध न लगाया जाता तो इतनी व्यापक पहुंच नहीं बनती। उन्होंने सुझाव दिया कि नीति-निर्माताओं को यह समीक्षा करनी चाहिए कि क्या इस फैसले से वांछित परिणाम मिले और क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म के मौजूदा नियामक ढांचे में बदलाव की जरूरत है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस
सिद्धू ने कहा कि "राष्ट्रीय सुरक्षा" का तर्क तब तक बहुत व्यापक और अस्पष्ट रहता है, जब तक सरकार यह स्पष्ट न करे कि उसकी वास्तविक चिंताएं क्या हैं।हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि सरकार यह तर्क दे सकती है कि इस तरह की सामग्री समाज के संवेदनशील वर्गों, विशेषकर पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को प्रभावित कर सकती है, जहां सीमा पार आतंकवाद और नार्को-टेररिज्म जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि अदालतें आम तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सरकार को पर्याप्त विवेकाधिकार देती हैं, लेकिन यह मुद्दा आगे चलकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर व्यापक बहस का विषय बन सकता है।
शिरोमणि अकाली दल ने किया समर्थन
शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सलाहकार एच.एस. बैंस ने फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग के समर्थन का बचाव किया।उन्होंने कहा कि फिल्म पंजाब के उग्रवाद काल की घटनाओं को ईमानदारी से प्रस्तुत करती है और इसलिए इसे देशभर के लोगों को देखने का अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार, लोगों को यह जानने का अधिकार है कि पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान क्या हुआ था।
दोहरे मानदंडों पर सवाल
बैंस ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील फिल्मों के मामले में अलग-अलग मानदंड अपनाए जाने पर भी सवाल उठाए।उन्होंने कहा कि कई अन्य विवादित फिल्मों को रिलीज की अनुमति दी गई, जबकि 'सतलुज' को बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ा, जबकि उनके अनुसार यह फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा मामले से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और न्यायिक कार्यवाही पर आधारित है।उन्होंने तर्क दिया कि यदि अन्य राजनीतिक विषयों पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन संभव है, तो न्यायिक रिकॉर्ड पर आधारित फिल्म के प्रदर्शन पर भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा
सरकार की ओर से कथित राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए बैंस ने कहा कि फिल्म अदालत के रिकॉर्ड पर आधारित है, इसलिए इसे राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता।उन्होंने कहा कि फिल्म भारत की संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास को मजबूत करती है क्योंकि इसमें न्यायिक प्रक्रिया के जरिए अंततः न्याय मिलता हुआ दिखाया गया है।बैंस का कहना है कि ऐसी फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक कृतियों के लिए समान मानदंड जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़े होते हैं।

