
850 सांसदों वाली लोकसभा पर शशि थरूर की चेतावनी, लोकतंत्र होगा कमजोर!
लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 824-850 करने की चर्चा के बीच शशि थरूर ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संसद में बहस और जवाबदेही कमजोर हो जाएगी।
देश में प्रस्तावित नए परिसीमन (Delimitation) को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 824 से 850 करने की तैयारी में बताई जा रही है। इसके लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने की भी चर्चा है। इस बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा है कि संसद का इतना बड़ा विस्तार भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
'सिर्फ गणित नहीं, लोकतंत्र का सवाल'
एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित अपने लेख में शशि थरूर ने लिखा कि सरकार का तर्क है कि 1972 के बाद भारत की आबादी दोगुनी से अधिक हो चुकी है, इसलिए लोकसभा सीटें बढ़ाना स्वाभाविक है। लेकिन उनके मुताबिक यह सिर्फ जनसंख्या का गणित नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गुणवत्ता का भी सवाल है।थरूर का कहना है कि पहली नजर में यह फैसला लोकतांत्रिक प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके पीछे गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां छिपी हुई हैं।
'850 सदस्यों की लोकसभा बहस नहीं कर पाएगी'
थरूर के अनुसार दुनिया का कोई भी परिपक्व लोकतंत्र अपनी संसद को इतना बड़ा नहीं बनाता कि सार्थक बहस ही मुश्किल हो जाए।उन्होंने कहा कि यदि लोकसभा में 850 सदस्य होंगे, तो सदन बहस का मंच कम और एक विशाल समूह अधिक बन जाएगा, जहां कुछ चुनिंदा सांसद ही अपनी बात रख पाएंगे जबकि अधिकांश सदस्य केवल मतदान तक सीमित रह जाएंगे।उनका मानना है कि संसद का उद्देश्य सिर्फ संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रभावी कानून निर्माण और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
अमेरिका का उदाहरण दिया
शशि थरूर ने अमेरिका की प्रतिनिधि सभा का उदाहरण देते हुए लिखा कि वर्ष 1929 में अमेरिका की आबादी लगभग 12 करोड़ थी और उसी समय प्रतिनिधि सभा की सदस्य संख्या 435 तय कर दी गई थी।आज अमेरिका की आबादी तीन गुना से अधिक होकर लगभग 33.5 करोड़ हो चुकी है, लेकिन वहां प्रतिनिधि सभा की सीटों की संख्या अब भी 435 ही है।थरूर के मुताबिक अमेरिका ने सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय उनके लिए बेहतर शोध सहायता, आधुनिक तकनीक और मजबूत समिति प्रणाली विकसित की।
'छोटे दलों और बैकबेंच सांसदों की आवाज दब जाएगी'
थरूर ने आशंका जताई कि यदि लोकसभा में 850 सांसद होंगे तो पांच साल के कार्यकाल में बड़ी संख्या में सांसदों को बहस में बोलने का अवसर ही नहीं मिलेगा।उन्होंने कहा कि चार घंटे की सामान्य बहस में मुश्किल से 15 से 20 सांसद ही अपनी बात रख पाएंगे। इससे विशेष रूप से छोटे दलों और बैकबेंच सांसदों की भूमिका कमजोर हो जाएगी।उनके अनुसार ऐसी व्यवस्था सरकार की जवाबदेही कम और कार्यपालिका की शक्ति अधिक बढ़ा सकती है।
'दिखावटी लोकतंत्र का खतरा'
थरूर ने अपने लेख में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अत्यधिक बड़ी लोकसभा कहीं चीन की पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस या उत्तर कोरिया की सुप्रीम पीपुल्स असेंबली जैसी प्रतीकात्मक संस्था न बन जाए, जहां वास्तविक बहस के बजाय केवल औपचारिक सहमति दिखाई देती है।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती सांसदों की संख्या से नहीं, बल्कि संसद में होने वाली सार्थक बहस और जवाबदेही से तय होती है।
उत्तर-दक्षिण संतुलन पर भी उठाए सवाल
शशि थरूर ने परिसीमन के राजनीतिक प्रभाव पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो दक्षिण भारतीय राज्यों को उनकी सफल जनसंख्या नियंत्रण नीतियों का नुकसान उठाना पड़ सकता है।वहीं अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों को ज्यादा सीटें मिलने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है।
'सांसद नहीं, विधायकों की संख्या बढ़ाइए'
थरूर ने सांसद और विधायक की भूमिकाओं में अंतर बताते हुए कहा कि सांसदों का काम राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाना, विदेश नीति, आर्थिक नीतियों पर चर्चा करना और केंद्र सरकार से जवाब मांगना है।जबकि स्थानीय समस्याओं—जैसे सड़क, पानी और नागरिक सुविधाओं—का समाधान राज्यों और स्थानीय निकायों के माध्यम से होना चाहिए।उन्होंने सुझाव दिया कि यदि बढ़ती आबादी के कारण प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत है, तो सांसदों के बजाय राज्यों में विधायकों की संख्या बढ़ाने पर विचार होना चाहिए।
अतिरिक्त खर्च पर भी सवाल
शशि थरूर ने यह भी कहा कि यदि 300 अतिरिक्त सांसद बनाए जाते हैं, तो उनके वेतन, भत्तों, आवास और पेंशन पर भारी सरकारी खर्च होगा।उनके अनुसार इस अतिरिक्त खर्च की बजाय मौजूदा 543 सांसदों के लिए संसद के पास आधुनिक शोध, नीति विश्लेषण और प्रशासनिक सहायता वाला मजबूत संस्थागत ढांचा तैयार करना अधिक उपयोगी और दूरदर्शी कदम होगा।
बहस अब सिर्फ सीटों की नहीं
परिसीमन को लेकर शुरू हुई यह बहस अब केवल लोकसभा सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रह गई है। सवाल यह भी है कि क्या संसद में प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना लोकतंत्र को और मजबूत करेगा, या फिर संसदीय बहस, जवाबदेही और प्रभावी कानून निर्माण को कमजोर कर देगा। शशि थरूर का लेख इसी व्यापक संवैधानिक और लोकतांत्रिक बहस को नई दिशा देने की कोशिश करता है।

