सुप्रीम कोर्ट में भारी हंगामा, याचिकाकर्ता ने पेपर उछाले और सीजेआई को दी गाली
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सुप्रीम कोर्ट में भारी हंगामा, याचिकाकर्ता ने पेपर उछाले और सीजेआई को दी गाली

जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच के सामने इन-पर्सन पेश हुए शख्स ने की अभद्रता, कोर्ट ने कहा- हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे, सिर्फ सहानुभूति है।


Supreme Court: देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में शुक्रवार को उस समय बेहद हैरान करने वाला और हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, जब एक याचिकाकर्ता ने अदालत कक्ष के भीतर ही भारी हंगामा खड़ा कर दिया। खुद अपनी पैरवी कर रहे इस शख्स ने सुनवाई के दौरान पीठ के सामने खड़े होकर न सिर्फ हवा में पेपर उछाले, बल्कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए अभद्र और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल भी किया। अचानक हुई इस घटना से कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोग सन्न रह गए, जिसके तुरंत बाद वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने हस्तक्षेप कर हंगामा कर रहे शख्स को अदालत कक्ष से बाहर निकाला।


'मैं संप्रभु हूं, पुलिस अधिकारी पर करो FIR'
यह पूरा वाकया जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ के सामने सुबह करीब 11 बजे घटित हुआ। कोर्ट में अपनी याचिका पर खुद जिरह करने आए शख्स की पहचान प्रबल प्रताप के रूप में की गई है। अदालत कक्ष में पेश होते ही उसने पीठ के सामने खुद को 'संप्रभु' बताया और न्यायाधीशों को 'न्यायिक सेवक' कहकर संबोधित किया। उसने बेहद आक्रामक लहजे में कहा, "हे न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि साइबर अपराध में सिंडिकेट चलाने के लिए एएसपी (लखनऊ) के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें।"

अदालत कक्ष में उछाले पेपर, सुरक्षाकर्मियों ने दबोचा
याचिकाकर्ता के इस तरह आदेश देने वाले लहजे को सुनकर जस्टिस केवी विश्वनाथन ने अचरज में उससे पूछा, "आप मुझे आदेश दे रहे हैं? आप हमें आदेश दे रहे हैं?" इसके बाद बिना किसी उकसावे या सवाल पूछे, याचिकाकर्ता अचानक उग्र हो गया और उसने अपने हाथ में मौजूद दस्तावेजों और पेपर के बंडल को हवा में उछाल दिया, जिससे पूरे कोर्ट रूम में कागज बिखर गए। इसके साथ ही उसने सीजेआई के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक गाली का इस्तेमाल किया। सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उसे काबू में लिया और कोर्ट रूम से बाहर ले जाकर कुछ देर के लिए डीएसपी कार्यालय में हिरासत में रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई से किया इनकार
अदालत की कार्यवाही में इस कदर बाधा डालने और जजों के प्रति अभद्र व्यवहार करने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक या अवमानना (Contempt) की कार्रवाई शुरू न करने का एक बड़ा और मानवीय फैसला लिया। अपना आदेश सुनाते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा, "हम उसके खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई करने का प्रस्ताव नहीं रखते हैं। जहां तक ​​इस मामले के गुण-दोष का सवाल है, हमने रिकॉर्ड का अच्छे से अध्ययन किया है और हमें हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला है।"

कोर्ट बोला- हमें उस व्यक्ति से केवल सहानुभूति है
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले को पूरी तरह से खारिज करते हुए इस एसएलपी (स्पेशल लीव पिटीशन) को खारिज कर दिया। सुनवाई समाप्त होने के बाद जस्टिस विश्वनाथन ने मानवीय संवेदना दिखाते हुए टिप्पणी की और कहा, "वह व्यक्ति मानसिक रूप से बेहद परेशान और हताश है। यह सब केवल उसकी भारी निराशा का नतीजा है। हमारे मन में उसके लिए केवल सहानुभूति है।" अदालत के इस नरम रुख की वहां मौजूद वरिष्ठ वकीलों ने भी सराहना की।

जानिए क्या था पूरा कानूनी मामला?
दरअसल, याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने लखनऊ के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीमा शुल्क) के आदेश के खिलाफ दायर उसकी रिट याचिका को खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के बजाय उसकी अर्जी को एक निजी शिकायत के रूप में मानने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता के पास निचली अदालत के आदेश के खिलाफ एक प्रभावी वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के इस कानूनी तर्क को सही माना और याचिका को पूरी तरह बंद कर दिया।


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