
तहसीन पूनावाला का E20 फ्यूल नीति पर हमला, उठाए गंभीर सवाल
E20 फ्यूल नीति पर तहसीन पूनावाला ने उठाए सवाल, पारदर्शिता की मांग करते हुए वाहन सुरक्षा और कम माइलेज के मुद्दों पर सरकार को घेरा।
E20 Fuel: जब भी कोई मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन में खून-पसीने की कमाई जोड़कर कोई नया वाहन खरीदता है, तो वह पल उसके लिए किसी बड़े उत्सव या खुशी के अवसर जैसा होता है। लेकिन अगर वही गाड़ी आगे चलकर रोजमर्रा के तनाव, बार-बार की खराबी और भारी-भरकम रिपेयरिंग बिलों का स्रोत बन जाए, तो यह स्थिति जीवन के हर दूसरे पहलू को प्रभावित करने लगती है। एथनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल यानी E20 नीति को लेकर आज देश भर के वाहन चालकों के मन में कुछ ऐसा ही गहरा असंतोष, अफ़सोस और गुस्सा देखने को मिल रहा है। 'टीम भारत' के प्रमुख और मुखर राजनीतिक टिप्पणीकार तहसीन पूनावाला का मानना है कि यह नीति पूरी तरह से "बिना आम सहमति" और बिना किसी लोक-परामर्श के नागरिकों पर थोप दी गई है।
सरकार रिपोर्ट सार्वजनिक करने से क्यों डरती है?
तहसीन पूनावाला से जब यह पूछा गया कि इस विवाद के केंद्र में असल मुद्दा क्या है, तो उनका सबसे कड़ा और सीधा सवाल यही था कि अगर E20 नीति सचमुच राष्ट्रहित में है और इससे देश या आम जनता का कोई भला हो रहा है, तो इससे जुड़ी मुख्य सरकारी रिपोर्टों और आधिकारिक दस्तावेजों को आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? उनका गंभीर आरोप है कि सरकार इस पूरे मामले में सूचनाओं को छिपा रही है और पारदर्शिता के बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रख रही है। जनता के सामने आईआईटी कानपुर और एआरएआई (ARAI) के कुछ चुनिंदा और सामान्य अध्ययन तो लाए गए हैं, लेकिन वह सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील रिपोर्ट अब तक जनता की नजरों से दूर रखी गई है, जिसमें कथित तौर पर रबर के कलपुर्जों (rubber components) को होने वाले नुकसान और विभिन्न प्रकार के वाहनों की वास्तविक ईंधन अनुकूलता (compatibility) का विस्तार से जिक्र किया गया है।
क्या हैं इस आंदोलन की मुख्य मांगें?
सरकार के इस कथित अपारदर्शी रवैये, तानाशाही कार्यप्रणाली और नीतिगत विफलताओं के खिलाफ मुखर होते हुए 'टीम भारत' ने आगामी 31 जुलाई को दिल्ली में 'गाड़ी मार्च, गांधी मार्च' नाम से एक बड़े, अनुशासित और शांतिपूर्ण वाहन आंदोलन का ऐलान किया है। इस विरोध प्रदर्शन के जरिए सरकार के समक्ष कुल पांच सूत्रीय और बेहद स्पष्ट मांगें रखी गई हैं:
शुद्ध पेट्रोल (E0) की कीमतें घटाई जाएं: वर्तमान में देश के चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले बिना एथनॉल वाले शुद्ध पेट्रोल की कीमत आसमान छूते हुए करीब ₹165 से ₹170 प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है। इस मनमाने दाम को कम करके तुरंत लगभग ₹90 प्रति लीटर के स्तर पर लाया जाए।
E10 वाहनों के लिए सुनिश्चित हो E10 ईंधन: आज भी भारतीय सड़कों पर दौड़ने वाले 80 से 90 प्रतिशत वाहन केवल E10 ईंधन के अनुकूल डिजाइन किए गए हैं। इसलिए उनके तकनीकी विनिर्देशों और डिजाइन के मुताबिक उन्हें केवल E10 ईंधन ही मिलना चाहिए, जबकि E20 को पूरी तरह से एक वैकल्पिक और किफायती मूल्य वाले विकल्प के रूप में बाजार में छोड़ा जाना चाहिए।
नीति से जुड़े सभी दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हों: E20 नीति के निर्माण, परीक्षण और उसके प्रभावों से जुड़े तमाम सरकारी दस्तावेज, फाइलें और रिपोर्ट्स बिना किसी देरी के सार्वजनिक पटल पर रखे जाएं।
क्षतिग्रस्त वाहनों के लिए मजबूत मुआवजा और समाधान तंत्र: जिन मध्यमवर्गीय और आम वाहन चालकों की गाड़ियों को इस E20 ईंधन की वजह से गंभीर तकनीकी नुकसान या इंजन की खराबी का सामना करना पड़ा है, सरकार उनके लिए एक उचित रिज़ॉल्यूशन या वित्तीय मुआवजा तंत्र की स्थापना करे।
जिम्मेदार मंत्रियों की जवाबदेही तय हो: इस पूरी नीति की स्पष्ट विफलता और जनता को हो रहे आर्थिक नुकसान के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और हरदीप सिंह पुरी जैसे जिम्मेदार मंत्रियों की सीधी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
माइलेज, मेंटेनेंस और वॉटर कंटामिनेशन का चौतरफा संकट
आम उपभोक्ताओं और वाहन मालिकों के सामने आज के समय में सबसे बड़ी और प्रत्यक्ष चिंता उनके वाहनों की लगातार घटती माइलेज यानी ईंधन दक्षता (Fuel Efficiency) और आसमान छूते मेंटेनेंस खर्च को लेकर है। इसके अलावा, एक नई और बेहद खतरनाक तकनीकी समस्या यह सामने आ रही है कि एथनॉल प्रकृति से ही नमी (moisture) को बहुत तेजी से और आसानी से सोखता है, और जब मानसून या बरसात के दिन आते हैं, तो यह प्रवृत्ति और भी गंभीर हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, पेट्रोल पंपों और वाहनों के अपने टैंकों के अंदर पानी मिल जाने (water contamination) की शिकायतें बड़े पैमाने पर आ रही हैं।
कार निर्माता कंपनियों का इस बारे में बहुत स्पष्ट तकनीकी रुख रहा है कि उनके इंजन शुद्ध पेट्रोल के लिए डिजाइन किए गए हैं, न कि पानी या अत्यधिक नमी के मिश्रण को झेलने के लिए। जब इस मोर्चे पर संकट गहराता है, तो तेल विपणन कंपनियां (OMCs) अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए सारा ठीकरा सीधे पेट्रोल पंप संचालकों के सिर पर फोड़ देती हैं। दूसरी ओर, पंप डीलरों का तर्क है कि हर टैंक की दिन में तीन-तीन बार मैन्युअल जांच करना व्यावहारिक रूप से किसी भी स्थिति में संभव नहीं है। नतीजा यह भुगतना पड़ता है कि उपभोक्ता अपनी मेहनत की गाड़ी में तेल डलवाकर खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
मंत्रियों पर सीधा निशाना और 'हितों के टकराव' के गंभीर आरोप
इस पूरे नीतिगत घटनाक्रम पर बात करते हुए तहसीन पूनावाला ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को विशेष रूप से अपने तीखे हमलों के केंद्र में रखा है। उनका यह सीधा और बुनियादी सवाल है कि जब नितिन गडकरी देश के पेट्रोलियम मंत्री हैं ही नहीं, तो वे किस अधिकार या हैसियत से देश भर में 100 प्रतिशत एथनॉल के इस्तेमाल और भविष्य में ₹15 प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिलने जैसे लुभावने व बड़े-बड़े दावे सार्वजनिक मंचों से करते रहे हैं?
यदि वे सरकार के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री के रूप में ऐसे बड़े और नीतिगत दावे कर रहे थे, तो फिर आज जनता को ₹102 या उससे भी अधिक कीमत पर पेट्रोल खरीदने के लिए मजबूर करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को लेनी होगी। इसके साथ ही, पूनावाला ने बहुत कड़े शब्दों में 'हितों के टकराव' (conflict of interest) के मुद्दे को उठाया। उनका आरोप है कि जब कैबिनेट के स्तर पर ऐसी नीतियां बनाई जा रही हों और उसी सेक्टर से जुड़े पारिवारिक व्यापारिक हित या डिस्टिलरियां काम कर रही हों, तो यह सीधे तौर पर शुचिता और राजनीतिक औचित्य पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
2030 के मूल लक्ष्य को जल्दबाजी में समय से पहले क्यों थोपा गया?
अगर हम इस पूरी योजना के शुरुआती और मूल खाके को देखें, तो देश के लिए यह तय किया गया था कि हम साल 2030 तक धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से E20 के लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे। इस लंबी अवधि का उद्देश्य यही था कि पुराने वाहनों को बाजार से हटने और नए वाहनों के निर्माण के लिए ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और उपभोक्ताओं को पर्याप्त समय मिल सके। लेकिन इस तर्कसंगत डेडलाइन को पांच साल पहले ही यानी बहुत जल्दबाजी में रातों-रात लागू कर दिया गया।
पूनावाला का कहना है कि सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाते हुए इसे एक बड़ी तकनीकी या हरित उपलब्धि के रूप में प्रचारित करे, लेकिन इस जल्दबाजी की भारी कीमत सीधे तौर पर उस मध्यमवर्गीय उपभोक्ता को चुकानी पड़ रही है, जिसकी गाड़ी अभी पूरी तरह से उपयोगी थी लेकिन इस नीति की भेंट चढ़ गई। उसे अपनी गाड़ी की समय से पहले रीसेल वैल्यू खोनी पड़ रही है या फिर भारी-भरकम रिपेयरिंग का बिल भरना पड़ रहा है।
लोकतांत्रिक सहमति और जवाबदेही की बुनियादी राजनीति
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तहसीन पूनावाला इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि किसी भी सच्चे और स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त 'सहमति' (Consent) होती है। सरकार ने देश के करोड़ों वाहन मालिकों से इस नीति को लागू करने से पहले न तो कोई आधिकारिक राय मांगी और न ही किसी प्रकार की पूर्व सूचना या पारदर्शी जानकारी साझा की।
जब उनसे यह सवाल किया जाता है कि उनके द्वारा उठाए जा रहे इस कदम को राजनीतिक रूप से प्रेरित या किसी खास एजेंडे के तहत क्यों देखा जा रहा है, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के यह स्वीकार करते हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस पार्टी का समर्थन करते हैं और वैचारिक तौर पर खुलकर भाजपा विरोधी हैं। लेकिन साथ ही वे इस बात पर पूरी तरह से स्पष्ट हैं कि यह आगामी विरोध प्रदर्शन या आंदोलन किसी भी एक राजनीतिक दल का झंडा लेकर नहीं चल रहा है, बल्कि यह पूरी तरह से एक शुद्ध नागरिकों का आंदोलन है। इस मंच पर किसी भी राजनीतिक दल के नेता को भाषण देने की अनुमति नहीं होगी, और इसका दायरा केवल और केवल एथनॉल, पेट्रोल की कीमतों और आम उपभोक्ता के अधिकारों तक ही सीमित रहेगा।
डीजल-पेट्रोल की कीमतें और पारदर्शी फॉर्मूला
शुद्ध पेट्रोल की कीमत को सीधे तौर पर ₹90 प्रति लीटर पर लाने की अपनी मांग के समर्थन में पूनावाला ने संसद के पटल पर सरकार द्वारा दिए गए आधिकारिक आंकड़ों का ही हवाला दिया है। सरकार के अपने वित्तीय और प्रोक्योरमेंट आंकड़ों के अनुसार, देश में कच्चे तेल के आयात और उसके रिफाइनिंग के बाद पेट्रोल की मूल लागत उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले केवल ₹55 से ₹56 प्रति लीटर के आसपास बैठती है।
अगर इस मूल लागत में लगभग 30 प्रतिशत तक का तर्कसंगत टैक्स और आपातकालीन मूल्य स्थिरीकरण रिजर्व भी जोड़ दिया जाए, तो भी अंतिम उपभोक्ता के लिए यह कीमत अधिकतम ₹90 प्रति लीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। ऐसे में यह सवाल देश के हर जागरूक नागरिक के जेहन में उठना लाजिमी है कि आज जनता ₹160 से ₹170 प्रति लीटर तक की भारी कीमत चुकाने के लिए क्यों मजबूर है? इसके विपरीत, जब संसद में एक अन्य सवाल के जवाब में यह तथ्य सामने आया कि एथनॉल खुद सरकार को ₹70 से ₹72 प्रति लीटर की दर से पड़ रहा है, जो कि शुद्ध पेट्रोल की वास्तविक मूल लागत से भी काफी महंगा है, तो यह पूरी अर्थनीति पूरी तरह से उलट प्रतीत होती है। एक ऐसे उत्पाद को जो खुद महंगा है, उसे जबरन ईंधन में मिलाकर उपभोक्ताओं पर वित्तीय बोझ बढ़ाना किसी भी एंगल से तार्किक नहीं लगता।
किसानों के नाम पर बिचौलियों और मिल मालिकों का पोषण
सरकार हमेशा से अपने इस नीतिगत बचाव में यह दलील देती आई है कि एथनॉल मिश्रण की यह पूरी व्यवस्था देश के गन्ना किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने और उन्हें उनकी फसल का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए लाई गई है। इस तर्क पर कड़ा प्रहार करते हुए पूनावाला कहते हैं कि यदि वास्तव में किसानों की स्थिति सुधर रही है, तो देश में गन्ने के समर्थन मूल्य (MSP) में उस अनुपात में भारी वृद्धि क्यों नहीं हुई? इसके अलावा, सरकार ने समय-समय पर चीनी के निर्यात पर तरह-तरह के प्रतिबंध क्यों लगा रखे हैं?
वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो इस पूरी व्यवस्था का असली और बड़ा वित्तीय लाभ देश के साधारण किसानों को नहीं मिल रहा है, बल्कि इसका सीधा फायदा बड़ी चीनी मिलों और ताकतवर एथनॉल डिस्टिलरी मालिकों की झोली में जा रहा है। सबसे दिलचस्प और ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन डिस्टिलरियों और चीनी मिलों के स्वामित्व के तार केवल एक पार्टी से नहीं, बल्कि कांग्रेस, भाजपा और देश के अन्य तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों के दिग्गज नेताओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही एक मुख्य कारण है कि इस पूरी नीति के खिलाफ राजनीतिक दलों के गलियारों में कोई भी मुखर या ठोस विरोध देखने को नहीं मिलता।
हर प्रकार की जांच और खुली चुनौती के लिए तैयार रुख
अपने इस सार्वजनिक अभियान के दौरान जब उनके ऊपर विभिन्न प्रकार के राजनीतिक दलों, लॉबी या निहित स्वार्थों के एजेंट होने के आरोप लगाए जाते हैं, तो तहसीन पूनावाला बहुत स्पष्ट शब्दों में यह दो टूक चुनौती देते हैं कि वे अपनी ओर से उठाए गए हर एक कदम, अपने वित्त और सभी सार्वजनिक खातों की किसी भी स्तर पर फॉरेंसिक जांच कराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
वे अपने आंदोलन के एक-एक पाई के खर्च को सार्वजनिक पटल पर रखने के लिए राजी हैं और जरूरत पड़ने पर किसी भी प्रकार के आधिकारिक या तकनीकी झूठ पकड़ने वाले परीक्षण (lie detector test) का सामना करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। हालांकि, इसके साथ ही उनकी यह शर्त भी उतनी ही दृढ़ है कि यदि उनके जैसी व्यक्तिगत स्तर की जांच की जा सकती है, तो देश के नीति-निर्माताओं और मंत्रियों के कामकाज, संपत्तियों और निर्णयों की भी उतनी ही निष्पक्षता और कठोरता के साथ जांच होनी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। अंत में उन्होंने मीडिया के सामने यह भी स्पष्ट किया कि 'ई-20 जनता पार्टी' या इस नाम से चल रहे किसी भी अन्य संगठन से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है, जिन्होंने अनधिकृत रूप से उनके पुराने वीडियो और तस्वीरों का इस्तेमाल अपने प्रचार के लिए किया है।
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