
होर्मुज स्ट्रेट को ट्रम्प ने बताया US का हिस्सा, ईरान बोला- गफलत में न रहें
डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज स्ट्रेट को 'नया अमेरिकी क्षेत्र' बताया। ईरान के उप विदेश मंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर अमेरिका का अधिकार नहीं।
USA Iran War: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के एक ताज़ा सोशल मीडिया पोस्ट ने अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है। ट्रम्प ने 'ट्रुथ सोशल' पर एक विवादित ग्राफिक नक्शा पोस्ट करते हुए होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) और उसके आसपास के समुद्री इलाके को 'नया अमेरिकी क्षेत्र' (New US Territory) करार दे दिया। इस नक्शे में ईरान, ओमान और यूएई (UAE) के तटीय हिस्से भी दिखाए गए थे।
ट्रम्प के इस दावे पर ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिकी इलाका बताना सिर्फ एक राजनीतिक गलतफहमी है और ट्रम्प को बहुत जल्द समझ आ जाएगा कि इस सामरिक समुद्री मार्ग पर अमेरिका का कोई कानूनी या प्रादेशिक अधिकार नहीं है।
क्या ट्रम्प के कहने से होर्मुज स्ट्रेट अमेरिका का हो जाएगा?
सीधा जवाब है बिल्कुल नहीं।
अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की स्थिति: होर्मुज स्ट्रेट एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है, जिसका उत्तरी तट ईरान के नियंत्रण में है और दक्षिणी हिस्सा ओमान के मुसंदम प्रायद्वीप से लगता है।
नेविगेशन का अधिकार: अंतरराष्ट्रीय कानून और 'यूएन कौवेन्शन ऑन द लॉ ऑफ द सी' के तहत सभी देशों के व्यापारिक जहाजों को यहाँ से बिना रोक-टोक गुजरने का अधिकार (Right of Transit Passage) प्राप्त है।
दावे की कोई कानूनी वैधता नहीं: ट्रम्प का पोस्ट महज एक राजनीतिक संदेश या मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश माना जा सकता है, लेकिन इससे अमेरिका को होर्मुज पर कोई प्रादेशिक अधिकार नहीं मिलता।
दुनिया की 20% तेल आपूर्ति का केंद्र: होर्मुज स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व
फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से निकलने वाला कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) इसी मार्ग से होकर अरब सागर और हिंद महासागर की ओर जाता है।
ऊर्जा संकट: वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 20% (करीब 2 करोड़ बैरल प्रतिदिन) इसी रास्ते से होकर गुजरता है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक इस मार्ग पर निर्भर है।
नौसैनिक नाकाबंदी का विवाद: अमेरिका इस रास्ते में अपने युद्धपोत तैनात कर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, जबकि ईरान का रुख साफ है कि जब तक अमेरिका नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता, तब तक वह जहाजों की आवाजाही को सामान्य नहीं होने देगा।
'फारस की खाड़ी' बनाम 'अरब की खाड़ी': 70 साल पुराना नाम का विवाद
ईरानी मंत्री गरीबाबादी ने ट्रम्प को उनके पुराने बयानों की याद दिलाते हुए तंज कसा। कुछ समय पहले ट्रम्प ने 'फारस की खाड़ी' को 'अरब की खाड़ी' कहने का सुझाव दिया था, जिसका ईरान में कड़ा विरोध हुआ था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच की खाड़ी को पिछले 2,500 वर्षों से अधिक समय से 'फारस की खाड़ी' (Persian Gulf) कहा जाता रहा है। यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी और यूरोपीय नक्शों में यही नाम दर्ज है।
1950 में विवाद की शुरुआत: 1950 के दशक में ब्रिटिश सलाहकारों और 1960 में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के दौर में पैन-अरब आंदोलन के तहत अरब देशों ने इसे 'अरबियन गल्फ' कहना शुरू किया।
संयुक्त राष्ट्र (UN) का रुख: 2002 में संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय जल सर्वेक्षण संगठन (IHO) ने स्पष्ट किया था कि 'फारस की खाड़ी' ही आधिकारिक ऐतिहासिक नाम है। जब ट्रम्प ने इस बार अपने पोस्ट में 'फारस की खाड़ी' लिखा, तो ईरान ने कहा कि आखिरकार ट्रम्प ने भूगोल का सही पाठ पढ़ ही लिया।

