यूपी चुनाव: 143 सीटों के बहाने सीट शेयरिंग पर सपा को घेर रही कांग्रेस
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यूपी चुनाव: 143 सीटों के बहाने सीट शेयरिंग पर सपा को घेर रही कांग्रेस

यूपी चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस में सीट शेयरिंग पर खींचतान। 70 सीटों पर 30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी; यूपी चुनाव में सम्मानजनक सीटों के लिए कांग्रेस का दबाव।


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UP Elections 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण तय करने में जुट गए हैं। सूबे की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन खुद लखनऊ का दौरा कर चुके हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार जमीनी स्तर पर ताबड़तोड़ दौरे कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी खेमे में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों की दावेदारी को लेकर अभी से खींचतान शुरू हो गई है। कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और कद्दावर सांसद इमरान मसूद लगातार फ्रंट फुट पर बैटिंग कर रहे हैं। इमरान मसूद ने तो यहाँ तक कह दिया है कि साल 2024 के चुनाव में कांग्रेस के साथ आने से ही सपा 37 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब हो पाई थी। उनके मुताबिक, इस बड़े गठबंधन की असली जरूरत कांग्रेस से कहीं ज्यादा खुद समाजवादी पार्टी को थी।


143 सीटों का सियासी गणित: मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस की सीधी नजर
सपा को दिखाए जा रहे कांग्रेस के इस सख्त तेवर की सबसे बड़ी वजह सूबे की वे 143 विधानसभा सीटें मानी जा रही हैं, जहां मुस्लिम वोट बैंक बेहद निर्णायक भूमिका में है।

पुराना वोट बैंक: उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का एक बहुत बड़ा तबका पारंपरिक रूप से लंबे समय तक कांग्रेस के साथ ही रहा है।

नेताओं की फौज: पिछले कुछ सालों में कांग्रेस ने इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे मुखर नेताओं के दम पर अल्पसंख्यकों के बीच अपनी खोई जमीन वापस पाई है।

सपा की कमजोरी: सपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खां फिलहाल जेल में हैं, जिससे जमीन पर सपा का यह समीकरण थोड़ा कमजोर दिखाई दे रहा है।

MY समीकरण पर असर: विश्लेषकों के मुताबिक, अखिलेश यादव के पारंपरिक 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण का 'M' अब काफी हद तक कांग्रेस से प्रभावित नजर आ रहा है।

70 सीटों पर 30% आबादी, 36 सीटों पर सीधे जीत का दम
यूपी का जनसांख्यिकीय आंकड़ा साफ गवाही देता है कि विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए दोनों ही दलों का साथ रहना बेहद जरूरी है।

20 से 30 फीसदी आबादी: सूबे की करीब 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है।

30 फीसदी से ज्यादा: इसके अलावा 43 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर्स की तादाद 30 फीसदी के आंकड़े को भी पार कर जाती है।

अपने दम पर जीत: पूरे उत्तर प्रदेश में 36 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम प्रत्याशी अपने राजनीतिक प्रभाव के बूते सीधे जीत हासिल कर सकते हैं।

हार-जीत तय करने वाली सीटें: करीब 107 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटर किसी भी दल की हार या जीत तय करने की पूरी क्षमता रखते हैं।

क्या साल 2024 का करिश्मा दोहरा पाएंगे अखिलेश यादव?
अखिलेश यादव इस समय यादवों के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और सवर्णों को भी अपने पाले में लाने की बड़ी जुगत में लगे हैं।

एकतरफा वोट की उम्मीद: अगर इस सोशल इंजीनियरिंग के साथ उन्हें मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन मिल जाता है, तो वे बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

सीटों की भारी कीमत: अखिलेश यादव हर हाल में साल 2024 के लोकसभा नतीजों को दोहराना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस इस बार मुफ्त में साथ देने के मूड में नहीं है।

कांग्रेस का दबाव: कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक से ज्यादा सीटें लेकर अपने इस जमीनी समर्थन की पूरी कीमत वसूलना चाहती है।

विपक्ष के भीतर चल रही सीटों की यह आंतरिक रार आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई को और भी ज्यादा दिलचस्प बनाने वाली है।


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