
UP SIR में सबसे ज्यादा पिसे कमजोर तबके? महिलाएं, प्रवासी और बेघर वोटरों की मुश्किल कहानी
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान दस्तावेज़, पलायन और पते से जुड़ी दिक्कतें कई लोगों के लिए चुनौती बनी हैं।
'द फ़ेडरल' ने पहले बताया था (पहला भाग यहाँ पढ़ें) कि उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) की प्रक्रिया में मतदाताओं की ऐसी लंबी लिस्टें सामने आईं जिनमें "लॉजिकल गड़बड़ियों" (बिना किसी साफ़ लॉजिक के) का ज़िक्र था; और यह सब ड्राफ़्ट रोल जारी होने से एक हफ़्ते से भी कम समय पहले हुआ। इसके अलावा, वेरिफिकेशन की अस्पष्ट प्रक्रिया ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्यों में से एक में इस पूरी प्रक्रिया को अनिश्चितता के घेरे में डाल दिया, जबकि वहाँ एक साल बाद चुनाव होने हैं। दो हिस्सों वाली इस सीरीज़ के आख़िरी भाग में यह पता लगाया जाएगा कि नागरिकों की किन श्रेणियों को "लॉजिकल गड़बड़ियों" और "अनमैप्ड वोटर्स" के इस एल्गोरिदम-आधारित हमले से सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा।
पिछले साल दिसंबर में जब UP में SIR एक्सरसाइज़ (मतदाता सूची के सत्यापन का अभियान) चलाई गई, तो इसके सॉफ़्टवेयर ने समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों – जिनमें महिलाएं और प्रवासी शामिल थे – को अपनी चपेट में ले लिया।
'द फ़ेडरल' से बात करते हुए, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और NGO ने – जो इन मतदाताओं के नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं – आरोप लगाया कि लाखों महिलाओं, प्रवासी मज़दूरों और विस्थापित परिवारों से अचानक उनका वोट देने का अधिकार छीन लिया गया। नागरिक अधिकार समूहों का आरोप है कि दस्तावेज़ों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर देने वाली इस सत्यापन प्रक्रिया ने वोट देने के मौलिक अधिकार को एक ऐसी प्रशासनिक बाधा बना दिया जो लोगों को सज़ा देने जैसी थी; इसमें वे महिलाएं भी शामिल थीं जो दशकों पुराने माता-पिता के रिकॉर्ड खोजने के लिए संघर्ष कर रही थीं, और वे झुग्गी-बस्ती में रहने वाले लोग भी जिनके घर बुलडोज़र चलाकर गिरा दिए गए थे।
इंडियन पीपल्स फ़्रंट के अध्यक्ष शेखर दीक्षित ने कहा, "यह पूरा अभियान असंवैधानिक था और समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों के ख़िलाफ़ था। हम वोटर लिस्ट में सुधार के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से इसे किया गया, उसने गंभीर सवाल खड़े किए हैं जिनका जवाब चुनाव आयोग (EC) को देना चाहिए।"
हमेशा की तरह, महिलाओं को ही सबसे ज़्यादा परेशानी हुई
सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि "लॉजिकल विसंगतियों" (logical discrepancies) की वजह से महिलाओं के पास अपनी वंशावली या नागरिकता साबित करने का बहुत कम या कोई मौका नहीं बचा। राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 1.55 करोड़ महिलाओं के नाम हटा दिए गए, जबकि पुरुषों की संख्या 1.34 करोड़ थी। इस कटौती से राज्य का लिंगानुपात 877 से घटकर 824 हो गया। सुधार के बाद, फाइनल वोटर लिस्ट में लगभग 42,00,778 महिला वोटर और जुड़ीं, जिससे लिंगानुपात सुधरकर 834 हो गया, लेकिन यह अभी भी शुरुआती 877 के आंकड़े से काफी कम था।
"हमेशा की तरह, महिलाओं पर ही सबसे बुरा असर पड़ा। कई महिलाएं जो अपने माता-पिता के वोटर आईडी कार्ड का EPIC नंबर नहीं दे पाईं, उनसे BLA ने ससुराल वालों के नाम देने को कहा। जब लिस्ट जारी हुई, तो उसी जानकारी की वजह से उन्हें 'संदिग्ध वोटर' (dubious voters) करार दिया गया। ग्रामीण इलाकों में लोगों ने देखा कि पिछली वोटर लिस्ट में उनके माता-पिता की उम्र गलत दर्ज थी और उम्र के गलत अंतर की वजह से उनके नाम लिस्ट से हटा दिए गए," इलाहाबाद के मानवाधिकार कार्यकर्ता और 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' (PUCL) के महासचिव चित्तजीत मित्रा ने कहा।
डॉक्यूमेंट से जुड़ी समस्या
नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और BLOs ने डॉक्यूमेंट से जुड़ी उन अहम दिक्कतों की ओर भी इशारा किया, जिनकी वजह से शुरू में बड़े पैमाने पर वोटरों के वोट देने के अधिकार से वंचित रह जाने की चिंता पैदा हो गई थी। जब कई वोटर राशन कार्ड और वोटर ID कार्ड लेकर आए, तो अधिकारियों ने उन्हें वापस भेज दिया और कहा कि वे उन 11 डॉक्यूमेंट्स में से कोई दो डॉक्यूमेंट लेकर आएं, जिन्हें EC ने वेरिफिकेशन के लिए ज़रूरी बताया था।
इन डॉक्यूमेंट्स में जन्म प्रमाण पत्र, शिक्षा प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और राज्य व स्थानीय अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए परिवार रजिस्टर वगैरह शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर आधार को भी एक सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर शामिल किया गया था, हालांकि इसे अकेले मान्य डॉक्यूमेंट नहीं माना गया। ऊपर बताए गए BLO ने कहा, "फिर हमने उन वोटरों को वेरिफाई करने और शामिल करने के लिए आधार का इस्तेमाल किया, जिन्हें शुरू में छोड़ दिया गया था।"
घर से बेघर, वोटर लिस्ट से भी बाहर
यह समस्या उन झुग्गी-बस्ती में रहने वाले लोगों के लिए गंभीर हो गई, जिन्हें हाल के वर्षों में प्रशासन के उस अभियान के तहत दूसरी जगह बसाया गया था, जिसमें "अवैध" मानी जाने वाली बस्तियों को ढहा दिया गया था।
नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ता अरुंधति धुरू ने 'द फेडरल' को बताया, "लखनऊ के अकबरपुर इलाके में, जहां बुलडोजर कार्रवाई के बाद 15,000 से ज़्यादा परिवारों को विस्थापित किया गया था, उनमें से लगभग सभी के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। जिस नई जगह पर उन्हें बसाया गया था, उसे किसी भी चुनाव क्षेत्र के तहत घोषित नहीं किया गया था और उनके पुराने घर, जिनका उनके पास सबूत था, अब मौजूद नहीं थे। हमने उनका मामला उठाया और अदालत गए; अदालत के निर्देशों के बाद, उन्हें 'फॉर्म 6' का इस्तेमाल करके नए वोटर के तौर पर शामिल किया गया।"
EC का बचाव
हालांकि, EC ने इस बदलाव का बचाव किया और इसे एक ज़रूरी प्रशासनिक कदम बताया। इसका मकसद वोटर लिस्ट को साफ़-सुथरा बनाना था, जिसमें डुप्लीकेट, मृत या स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोगों के नाम हटाकर लिस्ट को सही करना शामिल था। राजनीतिक हंगामे के बाद, EC ने सुनवाई की प्रक्रिया के लिए वोटर के खुद मौजूद रहने की शर्त में भी ढील दी। हालांकि, इस ढील के साथ एक शर्त भी थी। अगर कोई वोटर रजिस्ट्रेशन अधिकारियों के सामने वेरिफिकेशन की सुनवाई में खुद शामिल नहीं हो पाता है, तो वह अपनी जगह किसी परिवार के सदस्य या प्रतिनिधि को शामिल होने के लिए अधिकृत कर सकता है। जानकारों का मानना है कि इन ढील से शुरुआती ड्राफ़्ट लिस्ट की कुछ बड़ी कमियों को ठीक करने में मदद मिली। हालांकि, उनका यह भी कहना है कि कई सही वोटर अभी भी इस प्रक्रिया से बाहर रह गए हैं और उनकी स्थिति अनिश्चित बनी हुई है।
पूरे राज्य में अभियान
धुरू ने आगे कहा, “कुछ सुधारात्मक उपाय इसलिए घोषित किए गए क्योंकि शुरुआती ड्राफ्ट रोल में बीजेपी के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा भी छूट गया था। जब फील्ड वर्करों और पार्टी नेताओं ने इन चिंताओं को उठाया, तो सुधारात्मक उपायों की घोषणा की गई। लेकिन छूटे हुए नामों को शामिल करने में ये उपाय कितने असरदार रहे, यह बहस का विषय है और अभी भी इस पर रिसर्च की ज़रूरत है।” दीक्षित और उनका संगठन 'इंडियन पीपल्स फ्रंट' पूरे ग्रामीण उत्तर प्रदेश में एक अभियान शुरू करने की योजना बना रहे हैं ताकि SIR के दौरान वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए वोटरों की पहचान की जा सके। दीक्षित ने आगे कहा, “हमारा मकसद एक ऐसा आंदोलन खड़ा करना है जिसमें उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल करने की मांग की जाए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो हम SIR को पूरी तरह रद्द करने की मांग करेंगे। विरोध प्रदर्शन का पहला दौर 2 अक्टूबर को सीतापुर में शुरू होगा।”

