
ममता बनर्जी ने संभाली TMC की कमान, क्या छिन जाएगा पार्टी का चुनाव चिह्न?
पार्टी में टूट और करीबियों के इस्तीफे के बाद ममता बनर्जी ने खुद टीएमसी की कमान संभाल ली है। उन्होंने संकेत दिया है कि अगर पार्टी का चुनाव चिह्न छिन भी गया, तो वे जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगी।
Mamata Banerjee TMC: पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर से तूफ़ान की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को विभाजित हो चुकी अपनी पार्टी का सीधा नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथों में ले लिया है। एक के बाद एक कई करीबी सहयोगियों के दलबदल के बीच 71 वर्षीय तेजतर्रार नेता ने साफ कर दिया है कि वह पार्टी के अस्तित्व, संगठन और पहचान को बचाने के लिए एक लंबी और आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हैं।
फेसबुक लाइव पर दिए गए एक बेहद आक्रामक और भावुक संबोधन में ममता बनर्जी ने घोषणा की कि वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे के बाद अब वह खुद पश्चिम बंगाल प्रदेश टीएमसी अध्यक्ष का पद संभालेंगी। इसके साथ ही उन्होंने कुणाल घोष और मदन मित्रा को प्रदेश महासचिव नियुक्त कर संगठन में बड़ा फेरबदल किया है।
1998 के बाद सबसे बड़े संकट में टीएमसी
यह संगठनात्मक फेरबदल तब हुआ जब ममता की पुरानी वफादार चंद्रिमा भट्टाचार्य ने अंतरिम प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट से जाकर मुलाकात कर ली। 4 मई को आए बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में अविभाजित टीएमसी की सीटें गिरकर केवल 80 रह गई थीं, जिसके बाद से पार्टी 1998 में अपने गठन के बाद के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है।
ऋतब्रत गुट का दावा: बागी ऋतब्रत बनर्जी का गुट खुद को "असली टीएमसी" बता रहा है और चुनाव आयोग (EC) से आधिकारिक मान्यता की मांग कर रहा है।
चिह्न और दफ्तर पर जंग: यह कानूनी और सियासी विवाद अब विधायिका से आगे बढ़कर पार्टी के कार्यालयों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से इसके चुनाव चिह्न "जोड़ा घास फूल" तक फैल गया है। हाल ही में कोलकाता स्थित पार्टी दफ्तर पर भी बागी गुट ने नियंत्रण कर ताला जड़ दिया था, जिसे लेकर दोनों खेमों में तीखी झड़प हुई थी।
ममता बनर्जी ने अपने संबोधन में बागियों को सीधे "गद्दार" करार दिया और दावा किया कि वे सभी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के इशारे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर टीएमसी को तोड़ना चाहती है।
'अगर चुनाव चिह्न चला भी गया, तो उसे गले में लटकाकर जनता के बीच जाऊंगी'
इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक विश्लेषकों को ममता बनर्जी की रणनीति में एक बड़ा और सूक्ष्म बदलाव देखने को मिल रहा है। कानूनी लड़ाई जीतने का दावा करने के बजाय ममता अब अपने कार्यकर्ताओं को एक कड़े जमीनी संघर्ष के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रही हैं।
ममता बनर्जी का बड़ा बयान:
"वे हमारा आधिकारिक चुनाव चिह्न हमसे छीन सकते हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असली चुनाव चिह्न वही है जिसे बंगाल की जनता और टीएमसी के जमीनी कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं। अगर जरूरत पड़ी, तो मैं नए चुनाव चिह्न को अपने गले में लटकाकर जनता की अदालत में जाऊंगी, लेकिन सिर नहीं झुकाऊंगी।"
राजनीतिक विश्लेषक देबाशीष चक्रवर्ती का मानना है कि ममता का चुनाव चिह्न खोने की संभावना का बार-बार जिक्र करना यह दर्शाता है कि वह चुनाव आयोग से आने वाले किसी भी प्रतिकूल फैसले के लिए अपने काडर को तैयार कर रही हैं, ताकि किसी भी कानूनी झटके को पार्टी के अंत के रूप में नहीं, बल्कि नए सिरे से पुनर्निर्माण के रूप में पेश किया जा सके।
'मां, माटी, मानुष' बनाम विधायकों की संख्या बल
दलबदलुओं पर तंज कसते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि बागियों के पास आज अकूत संपत्ति, परिवार और धन-दौलत हो सकती है, लेकिन उनका गुट आज भी टीएमसी के मूल नारे "मां, माटी, मानुष" के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, "मेरी असली संपत्ति ये स्वार्थी नेता नहीं, बल्कि धूप और बारिश में खड़े रहने वाले मेरे वफादार कार्यकर्ता हैं।"
इसके साथ ही ममता बनर्जी ने साफ कर दिया है कि पार्टी अपनी पारंपरिक 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली को हर हाल में आयोजित करेगी। बता दें कि कोलकाता पुलिस ने मध्य कोलकाता और उसके आसपास भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 (निषेधाज्ञा) लागू कर रखी है। टीएमसी समर्थकों का दावा है कि सूबे की वर्तमान भाजपा सरकार जानबूझकर उनके इस ऐतिहासिक और सबसे बड़े वार्षिक कार्यक्रम को रोकने का प्रयास कर रही है, लेकिन वे इस दमन के आगे झुकने वाले नहीं हैं।
फिलहाल, टीएमसी पर वर्चस्व की यह लड़ाई चुनाव आयोग और अदालतों के गलियारों में टिकी है, लेकिन ममता बनर्जी के तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की धरती पर एक बहुत बड़ा राजनीतिक 'धर्मयुद्ध' शुरू हो चुका है।
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