बिहार में बेरोजगारी नहीं, बंगला बना मुद्दा! 10 सर्कुलर रोड विवाद पर बड़ी बहस

1 Jun 2026 4:06 PM IST

बिहार की राजनीति में एक बार फिर 10 सर्कुलर रोड चर्चा के केंद्र में है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक सरकारी बंगला है या फिर राजनीतिक विरासत और सत्ता का प्रतीक?

10 सर्कुलर रोड से लालू यादव परिवार को इतना लगाव क्यों है। क्या 10 सर्कुलर रोड बचाने की लड़ाई, जंगलराज की छवि से बाहर निकलने की लड़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है? बिहार की जनता को बंगले का संदेश ज्यादा दिख रहा है या सुशासन और नई राजनीति का विजन? क्या लालू परिवार को सरकारी आवास बचाने की जगह उस राजनीति पर जवाब नहीं देना चाहिए जिसे विरोधी आज भी जंगलराज कहकर निशाना बनाते हैं? क्या छवि बदलने की चुनौती बंगला बचाने से बड़ी नहीं है। क्या जनता यह मान ले कि गरीबों की राजनीति का केंद्र एक सरकारी बंगला है, या फिर वह पूछे कि बिहार को जंगलराज के आरोपों से मुक्त करने के लिए नई सोच और नया एजेंडा कहां है?

बिहार में चुनाव आते हैं। नारों के जरिए वादे किए जाते हैं। गरीबों की बात होती है। सामाजिक न्याय की बात होती है। पिछड़ों की बात होती है। दलितों की बात होती है। वंचितों की बात होती है। लेकिन अचानक राजनीतिक बहस एक बंगले पर आकर टिक जाता है। पता है 10 सर्कुलर रोड। वह बंगला जो वर्षों तक बिहार की सत्ता का केंद्र रहा। वह बंगला जो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की राजनीति का प्रतीक माना जाता है। और वही बंगला जो आज फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है।लेकिन यहां सवाल बंगले का नहीं है।

सवाल राजनीति की प्राथमिकताओं का है। सवाल यह है कि जिस राज्य में लाखों युवा नौकरी के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हों, वहां सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा आखिर एक सरकारी बंगला कैसे बन जाता है? आखिर 10 सर्कुलर रोड में ऐसा क्या है? क्या यह सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढांचा है? अगर हां, तो विवाद क्यों? अगर नहीं, तो फिर आखिर इसमें ऐसा क्या है जो इसे छोड़ना इतना मुश्किल बना देता है कहा जा सकता है कि यह एक भावनात्मक रिश्ता है।

क्या सरकारी संपत्ति किसी राजनीतिक परिवार की निजी विरासत बन सकती है? लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती।सरकारी बंगले भी स्थायी नहीं होने चाहिए।वे किसी व्यक्ति या परिवार के नहीं, राज्य के होते हैं तो फिर इस बंगले के प्रति इतना असाधारण लगाव क्यों? आरजेडी की राजनीति का मूल आधार रहा है गरीब, पिछड़ा, दलित, वंचित, शोषित दशकों से यही राजनीतिक नैरेटिव बनाया गया। लेकिन आम नागरिक पूछता है कि गरीब की राजनीति और वीआईपी बंगले का रिश्ता क्या है? क्या गरीब की लड़ाई लड़ने के लिए विशाल सरकारी आवास जरूरी है? क्या सामाजिक न्याय का आंदोलन किसी विशेष पते से संचालित होता है? क्या अगर पता बदल जाए तो विचारधारा भी बदल जाएगी? अगर नहीं, तो फिर संघर्ष किस बात का है?

बिहार के एक बेरोजगार युवक की कल्पना कीजिए। वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। भर्ती परीक्षा का इंतजार कर रहा है। नौकरी नहीं मिल रही। भविष्य अनिश्चित है। उसे क्या फर्क पड़ता है कि कौन 10 सर्कुलर रोड में रहेगा?

एक किसान के लिए क्या यह सबसे बड़ा मुद्दा है? एक छात्र के लिए? एक प्रवासी मजदूर के लिए? शायद नहीं। उनके लिए मुद्दे अलग हैं। लेकिन राजनीति उन्हें बार-बार बंगले की बहस में खींच लाती है।क्या यह सहानुभूति पैदा करने की कोशिश है? राजनीति में प्रतीक बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कई बार एक मकान भी राजनीतिक हथियार बन जाता है। कई बार कोई नोटिस भी आंदोलन का मुद्दा बन जाता है। कई बार कोई प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में पेश की जाती है।यहीं से सहानुभूति की राजनीति शुरू होती है।

क्या 10 सर्कुलर रोड भी उसी राजनीति का हिस्सा है? क्या यह संदेश देने की कोशिश है कि देखिए, हमें परेशान किया जा रहा है, क्या यह समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की रणनीति है संभव है। लेकिन दूसरी तरफ जनता यह भी पूछ सकती है अगर यह राजनीतिक प्रतिशोध है तो प्रमाण क्या है? और अगर यह सिर्फ नियमों का पालन है तो विरोध क्यों? बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष 39 हार्डिंग रोड भी है। अगर वैकल्पिक सरकारी आवास उपलब्ध है तो विवाद किस बात का है? क्या मुद्दा रहने का है? या फिर मुद्दा उस खास पते का है जो दशकों तक राजनीतिक ताकत का प्रतीक रहा?

अगर दूसरा विकल्प मौजूद है, तो फिर संघर्ष सुविधा का नहीं, प्रतीक का दिखाई देता है। और राजनीति में प्रतीक हमेशा वोट में नहीं बदलते। भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प प्रवृत्ति है। नेता अक्सर कहते हैं कि वे जनता के सेवक हैं। लेकिन सत्ता से जुड़े प्रतीकों को छोड़ने में कठिनाई होती है। सरकारी बंगले, सरकारी गाड़ियां, सरकारी सुरक्षा, सरकारी सुविधाएं। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल सत्ता से ज्यादा सत्ता के प्रतीकों से प्रेम करते हैं।

10 सर्कुलर रोड का विवाद केवल एक मकान का विवाद नहीं है। यह बिहार की राजनीति का आईना है। यह दिखाता है कि हमारे राजनीतिक दल किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं और किन मुद्दों को पीछे छोड़ रहे हैं। आखिरकार जनता यह तय करेगी कि वह इस विवाद को कैसे देखती है।क्या यह अन्याय के खिलाफ लड़ाई है? क्या यह राजनीतिक प्रतिशोध का मामला है? या फिर यह सत्ता से जुड़े विशेषाधिकारों को बचाने की जंग है क्योंकि चुनाव बंगले नहीं जनता जिताती है। और जनता का पता 10 सर्कुलर रोड नहीं, बिहार के गांव, कस्बे और शहर हैं।